कोल ब्लॉक के ख़िलाफ़ उतरे जन संगठन

रायपुर | संवाददाता: देश भर में कोल ब्लॉक की 18 जून को होने वाली कोल ब्लॉक की नीलामी का देश भर में विरोध शुरु हो गया है. पिछले दो दिनों से ट्वीटर पर भी कोल ब्लॉक की नीलामी के खिलाफ कई ट्रैंट चले हैं.

इस बीच जल जंगल जमीन के संरक्षण और आदिवासी, किसान मजदूरो के अधिकारों पर कार्यरत देश भर के जन आंदोलनों ने एक बयान जारी कर कहा है कि नीलामी की यह प्रक्रिया आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलकर कार्पोरेट मुनाफे के लिए उन्हें विस्थापन के लिए मजबूर करेगी. बयान में कहा गया है कि इन कोल ब्लॉक से देश के समृद्ध वनों का विनाश होगा, जो न सिर्फ पर्यावरण बल्कि लाखों लोगों की टिकाऊ आजीविका को नष्ट करेगा.


ज्ञात हो कि केंद्र सरकार 18 जून से 80 कोल ब्लॉको को व्यावसायिक उपयोग के लिए नीलाम करने जा रही है. यह कोल ब्लॉक की नीलामी की सबसे बड़ी कोशिश कही जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में कोलगेट मामले में अपने निर्णय में कहा था कि कोयला राष्ट्रीय संपदा है, जिसमें सरकार की भूमिका केवल एक “अभिरक्षक” की है, असली मालिक देश की जनता है.

बयान में कहा गया है कि अपनी सारी जिम्मेदारियाँ त्याग कर मोदी सरकार ने राष्ट्र-निर्माण और जन-हित को कॉर्पोरेट मुनाफे के आगे दांव पर लगा दिया है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मंशा के पूर्णत: खिलाफ है.

बयान में कहा गया है कि पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकारों की भूमिका को नगण्य कर दिया गया है. नई कमर्शियल नीति के प्रावधानों और प्राकृतिक संकट के समय में इस नीलामी प्रक्रिया से स्पष्ट है कि यह सिर्फ कुछ चुनिन्दा निजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने की एक साजिश है. इसके सबसे गंभीर दुष्परिणाम सघन वन क्षेत्रों के विनाश, पर्यावरण के अपरिवर्तनीय नुकसान तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर पड़ेगा.

बयान में कहा गया है कि सरकार के विभिन्न दस्तावेज़,कोल इंडिया लिमिटेड vision-2030,CEA के प्लान, इत्यादि पहले ही कह चुके हैं कि देश की कोयला जरूरतों के लिए और किसी खदान के आवंटन की ज़रूरत नहीं है. कोल इंडिया लिमिटेड के अपनी योजना और वर्तमान में आवंटित खदानें, भारत के अगले 10 वर्षों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं. ऐसे में नीलामी की ज़रुरत ही नहीं थी. यह खदाने किसी अंत-उपयोग परियोजना के लिए नहीं बल्कि कमर्शियल उपयोग के लिए दी जा रही हैं, जिसमें कंपनियाँ बिना रोक-टोक मनमानी कर निजी मुनाफा कमाने के लिए स्वतंत्र हैं. यह देश की बहुमूल्य संपदा का बंदरबांट और आने वाली पीढ़ियों के साथ छल है.

इस बयान में कहा गया है कि कोविड के इस संकट में जब विश्व की अर्थव्यवस्था लगभग मृतप्राय हो, कॉर्पोरेट अपने लिय पैकेज कि मांग कर रहे हैं, उस स्थिति में देश की सबसे बहुमूल्य खनिज संपदा की नीलामी थोड़ा चौंका देती है. सफल नीलामी के लिए बोलीदारों की संख्या पहले से ही मात्र 2 कर दी गई है, जिससे वर्तमान नीलामी गैर-प्रतिस्पर्धा और कॉर्पोरेट मिली-भगत के साथ सम्पन्न की जा सकती है.

आंदोलनकारियों ने अपने बयान में कहा है कि जिन इलाकों में कोयला खदाने हैं, वह जंगल पर्यावरण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा शामिल किए गई कोल ब्लॉकों में अधिकांश के पास ना तो पर्यावरणीय या वन-भूमि डायवर्शन स्वीकृति है और ना ही संबन्धित ग्राम सभाओं का सहमति पत्र.

जिन संस्थाओं ने बयान जारी किया है, उनमें छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन समेत देश के कई राज्यों के 32 जन संगठन शामिल हैं.

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