वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे

मुझे पता नहीं था कि वे किस शायर की लिखी कविता हैं पर मैं देखता था, उन्हें गुनगुनाते समय पिताजी बहुत प्रसन्न मुद्रा में रहते थे. चक्करदार सीढ़़ी वाले हालनुमा कमरे में चक्कर लगाते हुए वे इन पंक्तियों को बार-बार दोहराते थे. मैं समझता हूँ संतोष और खुशी के जितने भी लम्हें उनकी जिंदगी में थे, कविताएँ उन्हें ताकत देती थीं. उनकी उम्र कुछ भी नहीं थी, युवा थे, महज 40-42 के लेकिन “अभी तो मैं जवान हूं’ गुनगुना कर वे बढ़ती उम्र के अहसास को शायद कम करने की कोशिश करते थे. संभवत: आशंकाग्रस्त थे. फिर भी इन पंक्तियों को गाकर उनके चेहरे पर जो खुशी झलकती थी, वह उन्हें संतुष्टि देती थी, आशंकाओं से मुक्त करती थी. लेकिन हकीकतन ऐसा हुआ कहाँ? वे अपने जीवन के प्रति कितने आशंकाग्रस्त थे, इसकी झलक 5 फरवरी 1964 (मुक्तिबोध रचनावली खंड-6 – पृष्ठ 368) को श्री श्रीकांत वर्मा को लिखे गए पत्र से मिलती है.

एक स्थान पर उन्होंने लिखा है – “जबलपुर से लौटने पर मैं बहुत बीमार पड़ गया. चलने में, सोने में, यहाँ तक कि लिखने में भी चक्कर आते रहते हैं, खूब चक्कर आते हैं. इस कारण छोटी-मोटी दुर्घटनाओं का भी शिकार होता रहा. अपने स्वास्थ्य के संबंध में भयानक और विकृत सपने आते रहते हैं. बहुत दुभाग्र्यपूर्ण अपने को महसूस करता हूं.’ दुर्भाग्य ने वाकई उनका पीछा नहीं छोड़ा. 47 की उम्र वे इस दुनिया से चले गए. 11 सितंबर 1964. आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, नई दिल्ली. समय रात्रि लगभग 8 बजे.


अपनी याद में पिताजी को बीमार पड़ते मैंने कभी नहीं देखा. बचपन की यादें यानी नागपुर में सन् 1954 -55, राजनांदगांव में 1964, उनकी मृत्यु पर्यन्त तक. जनवरी 1964 में पक्षाघात के बाद वे कभी नहीं उठ पाए. ऊंचे-पूरे, अच्छी पर्सनालिटी के मालिक थे. उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता था कि कोई बीमारी उन्हें तोड़ सकती है. लेकिन हाथ-पैर उनके दर्द देते थे. कॉलेज से लौटने के बाद या निरंतर लेखन से आई शारीरिक शिथिलता दूर करने के लिए वे हमें हाथ-पैर दबाने के लिए कहते थे. यह काम मालिश जैसा नहीं था यानी यहाँ हाथों की उंगलियों का कोई काम नहीं था. वे पेट के बल लेट जाते थे और हमें ऊपर से नीचे तक, पैरों से लेकर गर्दन तक पांव से दबाने कहते थे. हम दीवार के सहारे एक तरह से उनकी पीठ व कमर पर नाचते थे. यह हमारे लिए खेल था किन्तु उन्हें इससे आराम मिलता था. कभी-कभी वे पेट भी इसी तरह हमसे दबाया करते थे. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें कितनी तकलीफ थी पर न तो वे डॉक्टर के पास जाते थे और न दवाई लेते थे. इसलिए उनकी शारीरिक पीड़ाओं का हमें अहसास नहीं था.

बाबू साहेब को हमने गुस्से में कभी नहीं देखा. दिन-रात व्यस्तता के चलते हमारी पढ़ाई के बारे में पूछताछ करने या हमें पढ़ाने के लिए वक्त निकालना उनके लिए बहुत कठिन था. लेकिन वसंतपुर के मकान में रात्रि में कंदील की रोशनी में जब कभी वे हमें किताब कापी लेकर आने के लिए कहते थे, तो हमारी रूह कांप जाती थी. हालांकि वे हम पर कभी नाराज नहीं होते थे और न ही डांटते-फटकारते थे. हम पढ़ते कम थे पर उन्हें एतराज नहीं था. मैं और मेरी बड़ी बहन उषा नगर पालिका की प्राथमिक शाला के विद्यार्थी थे. पढ़ाई लिखाई में मैं सामान्य था लेकिन उषा से कुछ बेहतर. इसलिए पिताजी के सवालों का टूटा-फूटा सा जवाब मैं दे देता था. इससे उन्हें संतोष हो जाता था किन्तु उषा मूक बनी रहती थी इसलिए वह उनके गुस्से का शिकार बन जाती थी. उनका रौद्र रुप देखकर हम दोनों सहम जाते थे. यद्यपि गुस्सा शांत हो जाने के बाद वे हमें दुलारते भी थे. यह अच्छा था कि पढ़ाई-लिखाई का वह दौर न ज्यादा समय के लिए चलता था और न ज्यादा दिन चलता था. दिग्विजय कॉलेज परिसर वाले मकान में रहने के लिए आने के बाद वह खत्म हो गया. वक्त ने उन्हें वक्त नहीं दिया. वे बीमार पड़ गए.

राजनांदगाँव के दिग्विजय कॉलेज जो अब शासकीय है, में आप जाएं तो उसके सौंदर्य को देखकर आप अभिभूत हो जाएंगे. पिछले सिंह द्वार का हमारा वह मकान, दोनों तरफ बड़े तालाब, रानी सागर, बूढ़ासागर, पिताजी की मृत्यु के बाद उनकी कीर्ति का यशोगान करते हुए नजर आएंगे. इसमें संदेह नहीं कि राज्य सरकार ने उसके सौंदर्य को निखारा है, समूचे परिसर को स्मारक में तब्दील किया है, प्रतिमाएं स्थापित की हैं, परिसर को हरा-भरा कर दिया है, एक नया भवन भी बनाया है, इस सोच के साथ कि देश-प्रदेश के लेखक, विचारक इस भवन में सरकार के मेहमान बनकर रहेंगे और रचनात्मक कार्य करेंगे. सिंह द्वार के ऊपर मंजिल पर जहाँ हम रहते थे, पिताजी की स्मृतियों को संजोया गया है, उनकी लेखन सामग्री, उनकी कुछ किताबें, उनके कुछ वस्त्र, कुछ पांडुलिपियां प्रदर्शित की गई हैं.

दीवारों पर दुलर्भ फोटोग्राफ थे जो उनकी जीवन यात्रा के कुछ पलों के साक्षी थे. किन्तु सीलन आने की वजह से वे निकाल दिए गए. स्मृतियों का यह झरोखा उस हाल तक सीमित हैं जहाँ वे चक्करदार सीढ़ियां हैं जो उनकी प्रख्यात कविता “अंधेरे में’ जीवन की रहस्यात्मकता की प्रतीक बनी है. बगल के दो अन्य कमरों में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी है और डा. बलदेव प्रसाद मिश्र. इसलिए हमारे उस मकान को राज्य सरकार द्वारा त्रिवेणी नाम दिया गया है. कभी खंडहर रहे इस भवन में जिसे कॉलेज के प्राचार्य स्व. किशोरीलाल शुक्ल के निर्देश पर रहने लायक बना दिया गया था, हम रहते थे. बख्शीजी या मिश्रजी नहीं. यह कोई कीर्ति की प्रतिस्पर्धा नहीं थी पर ज्यादा अच्छा होता यदि इस मकान एवं परिसर में सिर्फ पिताजी की स्मृतियों को संजोया जाता. यह अलग बात है कि हिन्दी साहित्य जगत में इस “त्रिवेणी’ को मुक्तिबोध स्मारक के रुप में ही जाना जाता है.

बहरहाल राज्य सरकार ने एक दशक पूर्व परिसर की कायाकल्प करके साहित्य जगत में बड़ी वाहवाही लूट ली थी, बड़ी सराहना मिली थी, किन्तु उसके बाद उसने पलटकर नहीं देखा. साहित्य – सृजन के लिए बना भवन लगभग एक दशक से सृजनात्मकता की बाट जोह रहा है. अब तक उसे एक भी लेखक नहीं मिला जो उसकी उदासी दूर कर सकें. सरकार ने अपने कारणों से जिसे राजनीतिक भी कह सकते हैं और सांस्कृतिक सोच का अभाव भी, इससे पल्ला झाड़ लिया है. राज्य की भाजपा सरकार के साथ ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं. लेकिन इसी सरकार ने वर्ष 2014 में राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का आयोजन करके देशव्यापी सराहना अर्जित की थी. फिर उसे इसकी दुबारा जरुरत नहीं पड़ी. राजनांदगाँव में मुक्तिबोध स्मारक के साथ भी कुछ ऐसा ही है.

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