मणिबेली : कल, आज और कल

मेधा पाटकर
नर्मदा किनारे बसा हुआ महाराष्ट्र का मणिबेली गांव. देश की मतदाता सूची में पहला गांव और मणिबेली का वलसंग बिज्या वसावे, दामजा गोमता का पोता, देश का इस लोकसभा चुनाव 2019 की सूची का पहला मतदाता. इस हकीकत को लेकर कुछ पत्रकारों द्वारा वहां पहुंचकर, कुछ मराठी, गुजराती, या अंग्रेजी में लिखी खबरों को पढकर लगा, हमारे सभी देशवासियों तक मणिबेली की पहचान और यादगार पहुंचना जरूरी है, वह भी तत्काल.

मणिबेली महाराष्ट्र का, गुजरात सीमा पर बसा हुआ गांव! मणिबेली का विस्तार पाँच फलियों का, करीबन 1000 हेक्टर्स का! तड़वी और वसावा, दो आदिवासी जमात के करीबन 100 परिवार यहां रहते आये और जंगल, जमीन, नर्मदा और नाले या उपनदियों का पानी तथा मछली पर उन सबकी पिढियाँ जीती रही.


मणिबेली में एकेक पहाड़ और फलियों में बचाया जंगल इस बात का गवाह था कि वहां के आदिवासी न बिना कारण जंगल काटते थे, न ही बेचते. उतार वाली खेती के साथ नदी किनारे की प्याज, लहसून, राई, मकई, सब्जियाँ तक पकाने वाली जमीन उन्हें साल भर खिलाती थी. उन्हें कहीं स्थनांतरित मजदूर बनने, गांव छोड़कर जाना नहीं पड़ता था.

उन्होंने अपनी जरूरत पूर्ति गांव के संसाधनों से करते हुए, बाजार से करीबन पूरी दूरी बना कर रखी थी. अपनी छोटी सी एक पेड़ की लकड़ी की नाव में बैठकर, नदी पार होकर, फिर कुछ 4-6 किलोमीटर चलकर किसी गुजरात के बाजार में पहुंचना या फिर गांव के पीछे कट्टर समर्थक जैसा खड़ा पर्वत चढ़ उतरकर, दो राज्यों के बीच की देवनदी पार करते 7-8 घंटे चलकर महाराष्ट्र के मोलगी गाँव के बाजार में पहुंचना असंभव नहीं था, लेकिन आसान भी नहीं.

अपने आप में स्वयंपूर्ण या कम से कम स्वयं निर्भर था मणिबेली गांव. न बिजली, न सिंचाई; एक दुकान के अलावा न कोई व्यापार की निशानी. इसीलिए मछली तक का व्यापार नहीं होता, लेकिन जंगल की जड़ी बूटी से लेकर हर प्राकृतिक संसाधन का उपयोग, सही अर्थ में निरंतरता के सिद्धान्त पर करने वाले आदिवासियों का यह गांव बिना किसी दिखावे के ‘ग्राम स्वराज्य’ का एक प्रतीक था.

वैसे महाराष्ट्र के सतपुड़ा की कोख में बसे कई आदिवासी गांव, खास करके नर्मदा किनारे के, मणिबेली जैसे ही थे. हर गांव में, फलियावार भी एक या दो बुजुर्ग ‘कारभारी’ का कार्य करते याने कारभार चलाते थे. मणिबेली फिर भी कुछ अलग था, अन्य गांवों से. यहां का दामजा गोमता पूरे जंगल की जड़ी-बूटी, जानने, छानने और हर बीमार व्यक्ति को देने वाला वैदू था.

भील आदिवासियों की देवेदानी में गाँवदेव, वाघदेव जैसा प्रकृति से जुडाव था. दामजा गोमता गाँव का पुजारी भी था. मणिबेली के तडवी समाज के पटेल की एक कठोरता थी तो भील वसावा समाज के तीन सगे भाई सिंगा, ढेब्र्या और गिंब्याभाई की शांति और समझदारी अनोखी थी. ढेब्र्या अपनी दो बीबीयों और कई बच्चों के साथ कभी जोर दिखाने वाले व्यक्ति रहते थे लेकिन उससे भी अधिक ताकतवर तीन भाई जालमा, जातरया जेरमा और उनका चचेरा भाई भुत्या मिलकर गांव के किसी भी मुद्दे पर पेश आते थे.

नर्मदा किनारे पारंपरिक लकड़ी चक्र याने लकड़ी के आधार पर पानी उठाकर, ठंडी में रबी की फसलों में सब्जी या राई भर-भरकर निकालने वाले पितामह तुल्य गिम्ब्याभाई और थोड़े या अधिक शराबी रहे तो नदी किनारे कड़ी मेहनत करने वाले केसुभाई तड़वी! उन सभी के बच्चे, घर की बहनें, एकाध जमाई मिलकर तड़वी-वसावा की एकता अद्भूत थी.

सरदार सरोवर बांध स्थल से निकलकर नर्मदा के दक्षिण किनारे, गुजरात के 3 गांव पार करके, 4 किमी पैदल चलकर हम मणिबेली पहुंचते थे. अकेले चलते, कभी संघर्ष गीत मन भर उभरता तो कभी रणनीति.

मणिबेली का नाम जगप्रसिद्ध हुआ तो सरदार सरोवर को चुनौती देने वाले संघर्ष से! मणिबेली गांव सहित उस वक्त के धुले जिले के 9 गांवों में जा जाकर गांवस्तरीय समिति और फिर तहसील स्तर की समिति गठित होने के बाद, धुले में कभी तो मुंबई में एकाधबार, महाराष्ट्र के सरदार सरोवर प्रभावित 33 गावों के 33 प्रतिनिधियों का समूह मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव के समक्ष दो या तीन घंटों तक हरेक सवाल उठाता, बहस करता था.

बांध स्थल के पास परियोजना की केवडिया कालोनी में, केन्द्र और चार बांध प्रभावित व लाभार्थी राज्यों के उच्च अधिकारियों के साथ चर्चा चली थी, मई 1988 में छः घंटों तक! उसमें गुजरात के वाहिनी संगठन के कार्यकर्ता भी शामिल हुए थे और घाटी के कुल 300 प्रतिनिधि.

चर्चा के बाद देर रात हम केन्द्र के समाज कल्याण सचिव एस.एस. वर्मा जी से सर्किट हाउस में मिले तो उन्होंने साफ कहा- ‘‘इन राज्यों के पास तो पुनर्वास का नक्शा तक तैयार नहीं है. कहां है जमीन? प्लान ही नही, तो बांध कैसे?’’

हमने उनके हाथ में पत्र रखकर चेतावनी दी कि हमारे सभी सवालों के जवाब और पुनर्वास की पूरी योजना सामने नहीं रखी तो 2 महीने बाद हम सरदार सरोवर बांध का विरोध करेंगे. मणिबेली की ओर से महिलाएँ भी शामिल रहती थीं और गुजराती व भिलारी, दोनों भाषाओं में सवालों की तीक्ष्णता, संगठन की प्रक्रिया, बैठकें, प्रबोधन के चलते बढती जाती थीं. 18 अगस्त 1988 में कुल छः शहरों में, तीनो राज्यों में रैली निकालकर हमने सरदार सरोवर का विरोध प्रकट किया.

1985 से चलकर ‘नर्मदा धरणग्रस्त समिति’ ने महाराष्ट्र में जनशक्ति जुटायी. यह नाम भी तय किया गांव प्रतिनिधियों ने और शासन के हर स्तर पर हमने इसे प्रकट किया. विश्व बैंक का प्रतिनिधि दल एक रोज मणिबेली पहुंचा तब हमारी बैठक काफी ऊंचाई पर वामीपाड़ा में चल रही थी. ‘बहुत सारे लोग नीचे बोट लेकर आये है… उनमें गोरे लोग, अधिकारी और पुलिस भी है’, यह सुनते ही मैं सब लोगों के साथ दौड़ पड़ी.

बहते पानी में दो फलियों को जोड़ने वाला बहता नाला पार करते, सुखदता के साथ चिंता भी मन में बहती रही, जब तक हम वहां नहीं पहुँच गये. वहां गुजरात के अधिकारी गांववालों से विश्व बैंक के दल के सदस्यों से मुलाकात करवा रहे थे. कुछ देर तक उनके सवाल और अनुवाद सुनते मैं हैरान रह गयी और मैंने जब अंग्रेजी में सच्चाई बताना और सही अनुवाद करना शुरू किया तब बैंक के और गुजरात के अधिकारी भी कुछ दंग, कुछ दुखी दिखाई दिये.

आखिर बैंक के साहूकार भी समझ गये कि विस्थापितों के पुनर्वास की कौन कहे, उन्हें जानकारी देना और सहभागी करना भी न्यूनतम स्तर पर है. गुजरात शासन के दावे झूठे साबित करने का और महाराष्ट्र की मूक बधिरता का यह पहला मौका था शायद, लेकिन बाद में कई सारे मिले.
मणिबेली से ही शुरूआत हुई जल सत्याग्रह की. बांध तो बनाते गयी सरकार और डूब चढती गई. जब अंदाजा आया कि 1990 के मानसून में अब मणिबेली की खेती क्या, घर भी डूब सकते हैं तो अप्रेल में ही हम निकल पड़े, मणिबेली सहित महाराष्ट्र से कई सारे गावों के सैकड़ों लोग. रास्ते में धुले, ठाणे सहित कई पड़ाव पर घाटी में डूब के अत्याचार, अन्याय की बात उठाते, मुंबई पहुँचे.

खबर आयी कि मणिबेली का रायण का पेड़ काट दिया है पुलिस वालों ने. जिसके नीचे बैठक करते, रायण के पीले, मीठे फल उठा उठाकर खाते थे हम और हमारे अतिथि, उसके काटे जाने की खबर हम सबके लिये दुख में डूबाने वाला था.

इतने में पुलिस द्वारा केसुभाई का मकान घेरे जाने और उनकी बेटी कुंता द्वारा पुलिस वालों को घंटों तक रोकने की खबर आयी. केसुभाई का घर तोड़ दिया गया था. हमारे प्रयासों के बाद घर तो फिर से बन गया लेकिन उसी वक्त हमने देवराम भाई के साथ उपवास करने का फैसला लिया. उस लम्बे उपवास के बाद मुख्यमंत्री शरद पवार, संवादशील रहते, हेलिकॉप्टर से मृणाल गोरेजी के साथ, बांध स्थल पर पहुंचे थे. 300 कांग्रेस व राज्य शासनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कई सारे निर्णय लिये गये. बिना पुनर्वास के डूब नहीं होने का आश्वासन दिया गया. उन निर्णयों पर अमल के लिए लड़ाई शुरु हुआ और आज भी यह लड़ाई जारी है.

जल सत्याग्रह

मणिबेली हमारे सत्याग्रह का पहला स्थल था. उसके पहले दिसंबर-जनवरी 1990-1991 तक मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से 5000 लोग निकलकर गुजरात की सीमा पर काले फीते से हाथ बांधकर पहुंचे. सीमा पार करने वाले एक एक अहिंसक समूह पर लाठियाँ बरसी, गिरफ्तारियाँ हुईं.

तब 21 दिन का उपवास हुआ था. बाबा आमटेजी भी 1 किमी दूर पर अपनी गाड़ी के साथ डटे थे. देश के कई सारे कार्यकर्त्ता, संगठन, माध्यमकर्ताओं की सहभागिता थी. विश्व बैंक द्वारा उसी दौरान पुनर्विचार आयोग गठित हो चुका था. लेकिन बांध पर कार्य जारी था. 1991 से हर वर्षाकाल में ‘डूबेंगे पर हटेंगे नहीं’ के संकल्प के साथ वहीं डेरा रहा. देश भर के कई सारे नेता, सर्वोदयी से वामपंथियों तक वहां पहुंचते रहें.

संवेदनशील पत्रकारों का समूह हर मुख्य कार्यक्रम में उपस्थित रहता था. शूलपाणेश्वर का मंदिर मणिबेली में चैत्र/जनवरी में हजारों यात्रियों को खींच लाता. वे सब मंदिर के साथ, हमारे कार्यतीर्थ का, मंदिर के बाजू में ही गांव-गांव के संसाधन- बांस की ताटी, साग की लकड़ी, गांव में ही बनाये कवेलू, आदि जुटाकर बनाये 3/4 कमरों के ‘सत्याग्रह स्थल’ का, दर्शन भी जरूर लेने आते. हमने उसका नाम रखा था, ‘नर्मदाई’ याने सुख देनेवाली.
इतना सहज-सुंदर, सौम्य और अहिंसक नाम और शालीन, फिर भी शासन वहां के संघर्ष से थरथर कांपती थी. गुजरात से आये भक्तगण भी गुजरात में हमारे खिलाफ फैलाये दहशतवाद की हकीकत समझते थे. हमारी ‘जायदाद’, जीवन, कार्यप्रणाली देख कर उन्हें माजरा समझने में मुश्किल नहीं हुई.

1993 में मणिबेली में पुलिसवालों का डेरा रहा, जब गांव के 13 मकान डूबने के बाद हमने ‘समर्पित दल’ घोषित करके, परियोजना पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो जल समाधि लेने की खुली चेतावनी देकर हम भूमिगत हो गये थे. 17 जुलाई से हमें ढूंढ न पाने वाली पुलिस ने मणिबेली के खेत-खेत ढूंढे, सब कुछ बरबाद किया, परिवारों को परेशान भी किया.

आखिर पुनर्विचार के लिए केन्द्रीय उच्चाधिकार समिति की घोषणा के बाद ही हमने अपना निर्णय वापस लिया. देश भर के 700 पत्रकार उपस्थित थे ही, लेकिन घाटी के करीबन 800 लोग, जो निमाड़ से और अन्य संगठनों, स्थानों से पधारे थे, बडोदा की जेल में थे. और हमारी समाधि के बाद दूसरा दल भी अरुंधती धुरु जैसी कटिबद्ध कार्यकर्ती के साथ तैयार था. इस स्थिति में ‘जलसमाधि’ से मुश्किल में पड़ी गुजरात शासन ने एक ऐसा शासकीय आदेश घोषित किया था कि हम मणिबेली/केवडिया जाने वाले रास्ते पर नहीं चल सकते थे, न वाहन में सफर कर सकते थे. ऐसे कई प्रतिबंध लगा दिये गये थे.

मणिबेली सत्याग्रह की पहली अत्याचार की घटना भी हमारे लिये बेहद क्षोभकारी थी. सत्याग्रह की झोपड़ी खड़ी करते, मात्र एक 11 लोगों का दल गांव में ही रैली निकालकर पहुंचा तो जबरदस्त लाठी चार्ज, धुले के आज के युवा संपादक निखिल सूर्यवंशी, निमाड़ के बुजुर्ग किसान सीताराम भाई, मुंबई की पर्यावरणवादी मोना पत्राव आदि पर हमला किया गया.

लेकिन हमने हार नहीं मानी. हमरा सत्याग्रह जारी रहा. शूलपाणीश्वर मंदिर भी सैकड़ों पुलिसवालों का पड़ाव बना रहा. महाराष्ट्र के साथ निमाड़, मध्यप्रदेश के मैदानी किसान भाई बहन भी सरियां लगाकर सैकड़ों की संख्या में सत्याग्रही बनकर रहते थे. चातुर्मास के चलते काशीमुनि जैसे संत भी आन्दोलन के सहयोगी बन जाते थे. उसी में पुलिसवालों से सेमल्दा गाँव की दो आदिवासी युवतियों के शोषण की घटना का भी हमें प्रतिरोध करना पड़ा था.

हम भूमिगत रहते थे. महेश शर्मा जैसे कार्यकर्ता रोज सुबह आदिवासी बनकर, पैदल चलकर केवडिया पहुंचते थे. उस वक्त माध्यमों की भरमार आज जैसी न होते हुए भी सब तरफ खबर पहुंचती थी. एक दिन कई मीटिंग्स हमारे साथ करके तैयार हो चुकी मणिबेली की महिलाओं- कविताबेन, जड़ीबेन, कागडीबाई, खात्रीडायी… सभी ने मिलकर अहिंसक हल्लाबोल के द्वारा पुलिसवालों का सामान उनके समक्ष मंदिर से बाहर नीचे फेंक कर उन्हें भगा दिया. उस वक्त माणिबेली के 40 पुरूष धुले या तलोदा जेल में थे और गांव की महिलाओं ने अपने संघर्ष को चोटी पर पहुंचा दिया था.

लेकिन इसका परिणाम भी भुगतना पड़ा और सरकारी लोगों ने पूरे मणिबेली में आग लगा दी. उन्हें बस मणिबेली गांव खाली करवाना था. उस समय भी मणिबेली की ये महिलाएँ गांव भर सैर वैर होकर पुलिसवालों का सामना करती रहीं और आखिर पुलिसवालों को पीछे हटना पड़ा.
वामीपाड़ा की भील महिलाएं और काफी संस्कृतायन की प्रक्रिया से निकले, हिंदु धर्म देवता मानने वाले तड़वी समाज की महिलाएँ मिलजुलकर यह अहिंसक युद्व चलाती हुई आज भी हमारी नजर में हैं.

एक बार जीवनशाला के बच्चों ने भी कमाल किया था. महाराष्ट्र गुजरात की सीमा ‘देवनदी’ पार करके घुसते पुलिसवालों को रोकने के संग्राम में मुझे वहीं उपवास पर उतरना पड़ा था. ठंड की कड़ाके की रात में अंगिठी जलाकर मैं नदी पात्र के किनारे सोयी थी, उबड़खाबड़ जमीन पर.

अंधेरी रात में नींद खुली तो देखा, अक्षरश: वानरसेना बनकर 20-50 बच्चें आए थे. उनके नन्हें-नन्हें हाथों से पुलिसवालों द्वारा बनाया मिटटी का रास्ता तोड़कर, रास्ते को लगभग बंद कर दिया था, ताकि पुलिस वाले न आ सकें. उस वक्त आज की तरह सेल्फी अन फोटो… व्हाटसअप के हथियार या माध्यम नही थे वरना आज पेश करते… यादगार जीवित रखते! लेकिन आज माणिबेली तो गवाह है ही!

शासन और पुलिसवालों के दमन के सारे हथकंडे अपनाने के बाद एक दिन चुनी काका वैध जी को माणिबेली में सैकड़ों पुलिस लेकर आयी. उनका कहना था, गाँव के 11 परिवारों ने हमें लिखकर दिया है कि वे परवेरा वसाहट (गुजरात) में स्थानांतरित होना चाहते हैं. हमें अंदाजा था ही.

हमने निर्णय लिया, ‘लोग विरुद्ध लोग’ ऐसी स्थिति पैदा न करने देने का. हम उनके घरों के कवेलू, हमारे दिल के टुकड़े जैसे उतारते देखते रहे. गांववासियों में कुछ मदद की भी, पर मनमुटाव और दर्द के साथ. रमण दला, जो कि कुछ समय तक माणिबेली के, सत्याग्रही युवाओं को प्रोढ़ शिक्षा देते थे क्योंकि कुछ थोड़े, तीसरी-चौंथी तक पढ़े हुए, वे ही एक थे. उनका भी हट जाना दर्दनाक था.

माणिबेली के उन 11 परिवारों के बाद एक भी परिवार, बिना वैकल्पिक जमीन और पुनर्वास के आज तक नहीं हटा. उस वक्त पुलिस के दबाव के कारण वहां से हटे वे परिवार भी बाद में गुजरात में बसाहटो की समस्याओं को लेकर आज तक हमारे साथ ही जुड़े हैं. महाराष्ट्र सरकार को बारबार दस्तक देकर, गुजरात से हक़ दिलाने के लिए हम मजबूर करते रहे हैं.

मणिबेली की 1993 की पहली बड़ी डूब और उसका सामना उस गांव की अपूर्व ताकत का दर्शन था. 22 दिन की नन्हीं बच्ची को लेकर हिरूबेन, सरपंच रहे नारायण भाई की पत्नी और सभी घर-घर के परिवारजन, घर, मवेशी भी डूबते हुए और पानी चढते हुए भी बैठे रहे.

मणिलाल काका-जडीबेन की भैंसे डूब चुकी, जो उनके बच्चों जैसी थी. नारायण भाई की एकमात्र दुकान डूब गयी. एक माचिस का डब्बा तक वे नहीं उठा पाये. पूरा तड़वी पाडा डूबा तो 13 परिवारों के बूढे, बच्चे, बहनें सभी बेघर हो गये. इस स्थिति में सभी तड़वी परिवारों को सहारा दिया, भील-वसावा परिवारों ने. कुछ दिनों तक, उनके घर खड़े होने तक खाना खिलाया, सुलाया भी. यह जातिवाद और वर्ग भेद तोड़ने का मौका आंदोलन के लिए बड़ा था.

मणिबेली के संसू नुरया याने ढोरचार से शुरू होकर हमारी मांगों में भी ‘पुनर्वास गैरबराबरी कम करने की नीति में ताकत हो’, यह बात सम्मिलित हुई थी. मणिबेली में भूमिहीन यही एक परिवार था. हर गांव में ऐसे दो-चार ढोरचार थे. गांव के ढोर चराने के बदले उन्हें घर-घर से रोटी मिलती थी. घर के इर्दगिर्द में कुछ गुंठा (आर) जमीन पर बीज बोते थे, वही उनकी खेती ! ‘ढोरचार को पहले जमीन दो फिर हमारी बात करो’ इस नारे के साथ मुद्दा जोर पकड़ा और आखिर हर भूमीहीन को भी 1 हेक्टेयर देने का फैसला महाराष्ट्र शासन को करना पड़ा. बल्कि मध्य प्रदेश शासन ने भूमिहीनों को जमीन नहीं दी. मच्छीमारो को सहकारी समितियों द्वारा मत्स्य व्यवसाय का, कुम्हारों को जमीन का, नाविकों को घाट पर पटटे का और मजदूरों को विशेष अनुदान का हक भी हमने 2017 में संघर्ष से ही पाया.

दुनिया के मंच पर मणिबेली

मणिबेली में 1991-92 में, अंतरराष्ट्रीय स्तर की, विश्वबैंक से नियुक्त मोर्स समिति का आना एक विशेष घटना थी. यूएनडीपी जैसी वैश्विक संस्था के उपाध्यक्ष रहे ब्रॅडफोर्ड मोर्स इसके अध्यक्ष थे तो कनाडा के न्यायाधीश थॉमस बर्जर उपाध्यक्ष. समिति के अन्य सदस्य थे, ब्रिटन के अंथ्रपोलोजिस्ट हयू ब्रांडी और अमरीका के पर्यावरणविद गॅम्बलर.

समिति का पहला दौरा था मणिबेली में. वृद्धावस्था में भी अपना गांधीवाद और हमारे जैसे कार्यकर्ताओं के लिए साधुवाद सुरक्षित रखने वाले सिध्दराज जी ढढ्ढा, हमारी वर्षो की जनसहयोगी साथी परवीन बहन, मेरी मां इन्दूताई और कई-कई साथी समर्थक, बरसात में बसों के बंद रहने से या गुजरात शासन द्वारा रोके जाने से, करीबन 10 किसोमीटर चलकर नदी किनारे पहुंचे थे.

नाव से नदी पार करके वे मणिबेली में शामिल हुए थे. लोगों के सवाल जवाब मोर्स समिति को और सारे सहयोगियों को हमारी संगठन और प्रबोधन की ताकत का एहसास निश्चित ही देकर गये थे. मोर्स समिति की रिपोर्ट (1993) तो एक दुनिया के विकास मॉडल और गुजरात मॉडल पर कड़ी समीक्षा और विश्व बैंक पर भी सटीक टिप्पणी है. बडे बांधों की पोलखोल भी. उससे विश्व बैंक ने सरदार सरोवर को एक प्रकार से विनाशकारी और अनियोजित घोषित करते हुए अपनी आर्थिक सहायता आधे पर रोक दी.

मणिबेली के और नर्मदा घाटी के इस संघर्ष की खबर और चर्चा दुनिया में नहीं होती अगर 1998 में विश्व बैंक की 50 साल पूरे होने पर, उनकी साहूकारी से अलग-अलग देशों में हुई घुसपैठ, विस्थापन, विनाश, कानून-नीति में बदलाव आदि मुद्दों को लेकर चेतावनी कार्यक्रम स्पेन के माद्रीद में न हुआ होता. दुनिया के 2000 संगठनों ने मिलकर जो मेमोरेंडम जारी किया, जो एक संकल्प पत्र था. उसका नाम था माणिबेली डिक्लेरेशन.

इसी का आधार लेकर मनमोहन सिंह ने “ हमारे देश के चंद लोग विश्व बैंक का विरोध कर रहे है…., लेकिन हम साथ हैं बैंक के…….” यह बयान दुनिया के हजारों के प्रदर्शन के जवाब में दे रहे थे. तो माणिबेली घोषणा पत्र हाथ में लेकर मुझे अवकाश मिला था, बाहर इकट्ठे हुए दुनिया भर की सशक्त जनशक्ति को संबोधित करने का. यह भी मणिबेली का सम्मान था. देश के नागरिकों को क्या, माणिबेली के गाँववासी आदिवासियों को भी अपनी धरती और आसमान का बराबरी का हक है !

जीवनशाला से निर्माण

मणिबेली का यह लम्बा संघर्ष का दौर रहा, वैसे ही जीवन शाला के रूप में निर्माण का भी. चिमलखेड़ी में शुरू हुई पहली जीवनशाला, वहाँ डूब आयी तब बच्चों ने छत पर चढकर अपना संघर्ष जारी रखा. लेकिन पुलिसवालों ने उन्हें खदेड़कर इस जीवनशाला को बंद करने की कोशिश की. लेकिन बच्चों ने हिम्मत नहीं हारी.

नंदुरबार जिले के अक्कलकुआ तहसील तक दरमजल करते हुए, तहसीलदार कचहरी पर ही पूरे दो महिने अपनी शाला चलायी. आखिर शासन को झुकाया और मणिबेली में शाला बनवाकर ही दम लिया. लेकिन मणिबेली की शाला फिर डूबी… गांव ने फिर खड़े किये कुछ कमरे. बच्चों ने शिक्षकों ने बहुत कुछ सहने के बाद फिर शासन ने बांध दी पत्रे की शाला, जिसे देखकर आज भी हैरान होते हैं कलेक्टर भी… पर कुछ बच्चे, युवा पेंटर्स द्वारा सजायी यह शाला आज भी न केवल 100 से अधिक बच्चों की शिक्षा का, बल्कि इससे 25 सालों में निकल चुके पहली शिक्षित पीढी के सैकड़ों बच्चों की शिक्षा और विकास का केन्द्र बनी हुई है.

इस शाला की पहली बैच का विद्यार्थी संघर्ष में शामिल रहा और आज सहकारी समितियों का मत्स्य व्यवसाय कारोबार सम्हालने वाला सियाराम पाडवी आज भी संघर्षरत हैं. दिनेश दामण और नरपत वलसंग वसावे मणिबेली का केज कल्चर का मत्स्य व्यवसाय सम्हाल रहे हैं. आंदोलन के द्वारा पाया यह हक उनकी जमीने डूबने पर नवरोजगार का साधन है.

आज भी जारी है लड़ाई और चुनौती भी!

वलसंग बिज्या के परिवार का सबसे बुजुर्ग याने आदिवासी भाषा में ‘डाया’ व्यक्ति दामजा गोमता वसावे. पूरे बाल चांदी जैसे चमकते हुए दामजाभाई शांति से पेश आने वालों में से एक थे. फिर भी मीटिंग में उनका प्रभाव था जरूर. उनकी बडवा या वैदू की भूमिका भी इसका एक बड़ा कारण था.

बिज्या दामजा उनका बड़ा बेटा, वह भी बुढापे की तरफ झुका हुआ है. बिज्याभाई की पत्नी खात्री बाई सतत संघर्ष के लिए तैयार. गुजरात के नसवाडी में हमने आदिवासी महिला रैली निकाली थी. गुजरात के नर्मदा किनारे के अंत्रास गांव की, अवैध वृक्ष कटाई रोकने वाली महिला बुधीबेन पर पुलिसवालों से किये गये बलात्कार के खिलाफ यह रैली थी.

उसी में घायल होकर खात्रीबाई बेसुध हुई थी. फिर भी बिज्या का परिवार और वलसंग ने भी, आन्दोलन पर कभी कोई सवाल नही उठाया. छोटा भाई नरपत जीवनशाला से निकला और वलसंग खेती, मछली दोनो में लगा रहा है आज तक. बिज्याभाई याने पिता की पात्रता पर 5 एकड़ जमीन मिली लेकिन वलसंग को अभी भी साढ़े तीन एकड़ जमीन आवंटित हुई. डेढ़ एकड़ जमीन अभी भी मिलना बचा हुआ है. नरपत तो आज शादीशुदा होकर भी, कम उम्र के कारण से अघोषित है और रहेगा. उसे बचे हुए गाँव में डटकर खेती, मछली, जंगल पर जीना होगा.

मणिबेली के लोगो में, गुजरात जाने वालों को आज भी गुजरात सरकार की मनमानी सताती है. मालू पुनर्वसाहट में जमीन स्वीकारने वाले 10 परिवारों को सीमांकन करके कब्जा देते देते कई साल चले गये. महाराष्ट्र के जिलाधिकारी भी हमारी तरफ से पूरी जानकारी पाने के बाद गुजरात में बसाये जाने वाले मणिबेली के लोगों की और अन्य वसाहटों की समस्याएँ उठाते रहते हैं. बैठकें हुई पर गुजराती अधिकारी विस्थापितों से चर्चा या सुनवाई के भी खिलाफ हैं.

महाराष्ट्र के विस्थापितों की अनदेखी ही नहीं, राज्य शासन की भी अवमानना और पुनर्वास के लिए नियमानुसार सहायता देने का विरोध करने की हिम्मत गुजरात सरकार के अफसरों में कहां से आती है. केन्द्र शासन और गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में भी एक ही पार्टी, भाजपा के सत्ता में आने से यह ताकत कई गुना बढ़ी है. लेकिन मणिबेली जैसे गांवों ने तो हमेशा एक ही संदेश दिया है- अपने अधिकार के लिये लड़ाई जारी रहेगी.

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