नेतन्याहू के बहाने गांधी का स्मरण

सुदीप ठाकुर | फेसबुक: इन दिनों इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत की यात्रा पर हैं. छह दिन का कार्यक्रम है. हर विदेशी अतिथि की तरह उन्होंने भी राजघाट जाकर महात्मा गांधी की समाधि पर फूल अर्पित किए हैं. मगर लगता है कि उन्होंने गांधी को या तो ठीक से नहीं समझा है या फिर वह उन्हें कुछ कम जानते हैं.

नेतन्याहू ने अपने मित्र और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रायसीना वार्ता में हिस्सा लिया और कहा, ‘आज की तारीख में ताकतवर होना बहुत जरूरी है. कमजोर मिट जाते हैं, शक्तिशाली जिंदा रहते हैं क्योंकि इस दुनिया में कमजोर का बचा रहना मुश्किल है. आप हमेशा ताकतवर के साथ हाथ मिलाते हैं. अगर आपको शांति कायम करनी है तो भी आपको ताकतवर होना पड़ेगा. ‘


गांधी यदि उनकी बात सुन रहे होते तो उन्हें शायद राजघाट से ही समझाइश दे देते कि वह गलत हैं. गांधी ऐसी किसी दुनिया की हिमायत नहीं कर सकते थे, जिसमें कमजोर लोगों के लिए जगह न हो, फिर वह कोई व्यक्ति हो या कोई राष्ट्र. यह कितना त्रासद है कि इस दुनिया में कमजोर लोगों के लिए जगह लगातार सिमटती जा रही है.’

नेतन्याहू और मोदी के एक मित्र ट्रंप भी हैं, वह भी ताकत की ही बात करते हैं और उनका बस चले तो वह उत्तर कोरिया के सिरफिरे किम जोंग को परमाणु बम दबाकर उड़ा दें! एक और ताकतवर हैं शी जिनपिंग जो चीनी युद्धकला के जरिये हिंद महासागर से लेकर मध्य एशिया और अफ्रीका की सरहद तक अपनी ताकत के दम पर विस्तार करना चाहते हैं.

यह कैसा समय है, जब दुनिया में ताकतवर बनने की होड़ मच गई है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दरअसल शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि ताकतवर होने का प्रतीक है और हम भी इस होड़ में शामिल होना चाहते हैं. यह गैरबराबरी की दुनिया है, जिसमें कमजोर और हाशिये पर जा रहे हैं. क्या यह सही वक्त नहीं है, जब कमजोर लोगों की बात की जाए और घातक और परमाणु हथियारों की होड़ बंद की जाए. दरअसल हम सब युद्धरत हैं, निरंतर हम युद्ध लड़ते रहना चाहते हैं.

युद्धोमांद ने हमारी भाषा ही बदल दी है. इसलिए हम दुश्मन को हर बार मुंहतोड़ जवाब देते हैं. जबकि सात दशकों ने दिखा दिया है कि पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते ताकत के दम पर सुधरना होता तो अब तक सुधर गए होते.

यह ताकतवर होने की होड़ दरअसल यह बताती है कि दुनिया भीतर से कितनी कमजोर हो गई है. हर देश एक दसरे से डरा हुआ है. हर आदमी एक दूसरे से डरा हुआ है. हम यह कैसी दुनिया बना रहे हैं!

नेतन्याहू आज साबरमती भी गए थे और वहां उन्होंने गांधी का चरखा भी चलाकर देखा है. लगता नहीं कि वह गांधी को ठीक से समझ पाए हैं. गांधी नुमाइश की चीज नहीं हैं. गांधी की समाधि पर जाने वालों को अब शपथ दिलाई जानी चाहिए कि वह युद्ध और हथियारों की होड़ का त्याग करेंगे, तभी वहां जाने का कोई मतलब है.

तीस जनवरी नजदीक है और इस तरह की शुरुआत के लिए इससे बेहतर कोई अवसर नहीं होगा, क्योंकि इसी दिन पिस्तोलधारी एक ताकतवर ने इस निहत्थे बुजुर्ग को गोली मार दी थी!
*लेखक ‘अमर उजाला’ दिल्ली के संपादक हैं.

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