बासमती पर रोक से उठे सवाल

रायपुर | संवाददाता: धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में बासमती धान के उत्पादन पर रोक से तगड़ा झटका लगा है. केंद्र सरकार ने हाल ही में छत्तीसगढ़ समेत 22 राज्यों में बासमती के उत्पादन पर रोक लगा दिया है. पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की हालत तो और भी खराब है, जहां बासमती का उत्पादन 20 फीसदी तक है. लेकिन अब वहां भी बासमती की रोक से किसान सकते में हैं.

हालांकि किसानों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि अगर कोई किसान केवल अपने उपयोग के लिये बासमती चावल का उत्पादन करना चाहता है तो उसे इस तरह बासमती की खेती से रोका जाना न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि यह देश के कृषि क्षेत्र में भी तानाशाही की कोशिश है. इधर किसान सरकार के इस निर्णय से इसलिये भी नाराज हैं क्योंकि सरकार ने ही किसानों को कीटनाशक और रासायनिक खाद के लिये किसानों को प्रोत्साहित किया. अब इसका ही हवाला दे कर इन पर रोक लगाई जा रही है.


यहां तक कि छत्तीसगढ़ सरकार ने आत्मा योजना के तहत खुद ही बासमती चावल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये सामुहिक तौर पर बासमती धान की प्रजाति लगवाई थी. 2014 में धमतरी ज़िले के कुरुद के कई गांवों में किसानों को बासमती उपजाने के लिये प्रोत्साहित किया गया था. इसी तरह बिलासपुर ज़िले के कोटा ब्लॉक में कई किसानों ने बिना खाद और कीटनाशक के ही बासमती उगाने की शुरुआत की थी. लेकिन अब इस पर रोक से किसान मायूस हैं.

हालांकि यह भी दिलचस्प है कि छत्तीसगढ़ में बासमती की खेती न के बराबर होती है. बासमती की तुलना में धान की सुगंधित और सुपाच्य किस्मों की भरमार है. लेकिन राज्य सरकार ने कभी भी इन किस्मों के निर्यात और अधिक कीमत दिये जाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भी नकली बासमती भारी मात्रा में बेचा-खरीदा जाता है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. टी. महापात्रा के अनुसार जिन 22 राज्यों में बासमती पर रोक लगाई गई है, उसका उद्देश्य बासमती की किस्म को और बेहतर बनाना है. माना जा रहा है कि हाल के दिनों में बासमती चावल की कई खेप दूसरे देशों ने अधिक मात्रा में कीटनाशक और रासायन के उपयोग के कारण वापस की थी. इससे भारत के चावल निर्यात को झटका लगा था. लेकिन अधिकाधिक उत्पादन के लोभ में कीटनाशक और रासायनिक खाद के उपयोग को हतोत्साहित करने के बजाये अधिकांश राज्यों में बासमती उत्पादन पर ही रोक लगा दी गई है.

जिन राज्यों में बासमती के उत्पादन पर रोक लगाई गई है, उनमें अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, बिहार, ओडिशा, केरल, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, मेघालय, सिक्किम, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, गोवा और झारखंड शामिल हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर ने केवल उत्‍तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में ही बासमती उगाने की बात कही है.

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण लगभग सौ देशों को बासमती चावल बेचता है. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, नीदरलैंड्स, स्वीडन, इंग्लैंड, डेनमार्क, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन बड़े आयातक देश हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों में यूरोपियन यूनियन ने खाद्य पदार्थों के आयात को लेकर कड़े नियम बनाये हैं.

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि बासमती पर ट्राइसाइक्लाजोल का छिड़काव सबसे बड़ा मुद्दा है. बासमती धान की खेती में अगर 70 दिन के भीतर ट्राइसाइक्लाजोल का छिड़काव किया जाये तो कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन कटाई के 40 दिन पहले तक अगर छिड़काव किया जाये तो इस रसायन के अवशेष चावल में बचे रह जाते हैं. दुनिया के कई देश 1 पीएम ट्राइसाइक्लाजोल की मात्रा वाले चावल को अब तक स्वीकार करते रहे हैं लेकिन उन्होंने इसी साल यह नियम बनाया कि चावल में ट्राइसाक्लाजोल की मात्रा 0.01 पीएम से अधिक होने पर उस बासमती चावल की खरीदी न की जाये. यही कारण है कि बासमती चावल की खेप यूरोपियन देशों ने भारत को वापस कर दिया.

लेकिन यह बात हैरान करने वाली है कि देश में ऐसे चावल खुलेआम बिक रहे हैं और कहीं-कहीं तो इससे घातक रसायन का उपयोग फसलों पर किया जा रहा है लेकिन इसकी बिक्री धड़ल्ले से जारी है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को इस बात की कहीं भी चिंता नहीं है कि अनाज के नाम पर जो जहर देश के लोग खा रहे हैं, उस पर भी कभी आंखें खोले,

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