पुलिस सुधार की ज़रुरत

भारत में ये पहली बार हुआ कि पिछले महीने केरल में हिरासत में मौत के एक मामले में दो पुलिसवालों को मौत की सजा सुनाई गई और तीन को जेल. साल 2005 में उदयकुमार नाम के एक युवक को यातना दी गई और मार डाला गया था और इसी मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने पिछले महीने पुलिसवालों को सजा सुनाई.

भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर रिकॉर्ड काफी खराब रहा है. इसे देखते हुए इस मामले का अध्ययन होना चाहिए कि कैसे इस सजा की सुनिश्चितता के लिए 13 सालों में सारे तथ्य कैसे एक साथ आए. अनेकों बार की तरह इस बार भी उजागर होता है कि अपराध के मामलों का सामना करते हुए पुलिस बल ने तय प्रक्रियाओं की अवमानना और गैर-जिम्मेदारी दिखाई है. सर्वोच्च न्यायलय ने 2005 में पुलिस सुधारों को लेकर जो साफ निर्देश दिया था केंद्र और राज्य सरकारों ने भी उसे लेकर पूरी तरह उपेक्षा बरती है.


उदयकुमार के मौजूदा मामले में भी जो हो पाया वो उस पुलिस अधिकारी और डॉक्टर की मेहनत से हो पाया जिन्होंने कानूनी जांच और पोस्ट मॉर्टम किए थे. राज्य सरकार ने भी संबंधित सर्किल इंस्पेक्टर को निलंबित करके अपने हिस्से का काम किया और क्राइम ब्रांच ने उन दो पुलिसवालों की चार्जशीट तैयार की और गिरफ्तार किया जिन्होंने यातनाएं इस्तेमाल की थीं.

जब अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाह अपने बयानों से मुकर गए तो उदयकुमार की मां ने केरल हाई कोर्ट में याचिका डाली और सीबीआई जांच की मांग की. और ये सीबीआई कोर्ट ही थी जिसने मिसाल देने लायक मुकदमे का संचालन किया. लेकिन हिरासत में यातना देने और मार डालने के बहुत अधिक मामलों में मुकदमों का नसीब ऐसी रुकावटों से भरा है जो जानी पहचानी है.

इनमें गवाह मुकर जाते हैं, डॉक्टर दबाव में आकर अपनी पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट में पुलिस को क्लीन चिट दे देते हैं, आरोपी पुलिसवालों के खिलाफ जांच मामले को रफा-दफा करने वाली अधिक होती है और पीड़ित के परिवारवाले इतनी कमजोर स्थिति में होते हैं कि वित्तीय या कानूनी मदद नहीं ले सकते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में जो दिशा-निर्देश दिए थे वो मोटे तौर पर उन्हीं पांच रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों का प्रतिबिंब है जो पिछले कई वर्षों में राष्ट्रीय पुलिस आयोग और कई दूसरे आयोगों व समितियों ने तैयार की थीं जिनकी अध्यक्षता प्रतिष्ठित न्यायविदों और पुलिस अधिकारियों ने की थी. जब न्यायालय का निर्णय आया तो उसे भारत में पुलिस सुधारों की मंथर गति को दूर करने में एक निर्णायक कदम माना गया.

ये उम्मीद तब से चकनाचूर ही हुई है क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों ने इन दिशा-निर्देशों को या तो चुनिंदा रूप से और अपनी सहूलियत से लागू किया है, या फिर उन्होंने इसे पूरी तरह अनदेखा कर दिया है. इन्हें प्रभावी रूप से लागू करने में जो अनिच्छा बरती जा रही है इसकी वजह ये है कि कुछ दिशा-निर्देश पुलिस से जुड़े मामलों में राज्य प्रशासन की शक्तियों को कम करते हैं. अगर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में इन्हें लागू करना भी सुनिश्चित किया होता तो नतीजे शायद अलग होते.

कई आयोगों की रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश विस्तृत सुझाव पेश करते हैं. ये सुझाव हैं कि पुलिस अधिनियम 1861 को बदलकर उसकी जगह नया कानून लाया जाए. कार्यपालिका के दखल से पुलिस को आजाद किया जाए जिसके लिए शीर्ष पुलिस अधिकारियों समेत अन्य की भर्ती, तबादलों और पदोन्नतियों के तरीकों को सुधारा जाए. पुलिस की कानून प्रवर्तन शाखा से जांच शाखा को अलग किया जाए. इसके अलावा पुलिस के खिलाफ आने वाली शिकायतों को देखने के लिए एक तंत्र स्थापित किया जाए.

पुलिस सुधार के अभियान का जोर इस बात पर भी है कि एक संस्थान के तौर पर पुलिस पर लोगों का भरोसा और उनका नजरिया पूरी तरह नहीं टूट जाए. 2018 में आई रिपोर्ट “भारत में पुलिस की स्थिति” में छह प्रमुख क्षेत्रों का अध्ययन था. ये छह क्षेत्र हैं- अपराध की दर, पुलिस व न्यायालय द्वारा मामलों का निपटान, पुलिस बल में विविधता, बुनियादी ढांचा, जेल के आंकड़े और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले.

ये पाया गया कि इन सभी क्षेत्रों में पुलिस का प्रदर्शन कमजोर और अल्पसंख्यक तबकों के खिलाफ ही अच्छा था. इनमें ये जाहिर हुआ कि वर्ग के आधार पर पुलिस का भेदभाव बहुत आम है. उसके बाद लिंग, जाति, धर्म के आधार पर वे भेदभाव करते हैं. देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों में पुलिस का डर बहुत अधिक है.

देश में पुलिस सुधारों को लागू करने की मंथर गति से ये साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना चाहिए ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि 2006 के उनके आदेश का सख्ती से पालन हो और अवज्ञा करने वाले राज्यों को इस अवमानना के लिए सजा दी जा सके.

पूरी दुनिया में ही संस्थागत भेदभाव हर जगह मौजूद है. अमेरिका में शिकागो में भी ऐसा था लेकिन वहां पुलिस सुधार शुरू हुए. 2017 में आई न्याय विभाग की एक रिपोर्ट ने कहा कि शिकागो की पुलिस नस्ल के आधार पर भेदभाव करने की प्रवृत्ति वाली है और अत्यधिक हिंसा का इस्तेमाल करती है और साथ ही वहां अपने कृत्यों पर परदा डालने की संस्कृति भी खूब है.

इसके आने के बाद एक वाइट अधिकारी द्वारा एक ब्लैक लड़के को गोली मारने की घटना हुई. उसके बाद शिकागो की सरकार और पुलिस अधिकारियों ने एक विस्तृत योजना बनाई ताकि पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके. इस योजना को संघीय न्यायालय की निगरानी में लागू किया जाएगा.

उदयकुमार के यातना और हत्या मामले में सजा सुनाते हुए सीबीआई के जज ने कहा कि आरोपियों के जो कृत्य हैं वो पुलिस संस्थान पर बुरा असर डालेंगे. और “अगर इस संस्थान में से लोगों का भरोसा उठ गया तो उसका असर.. समाज की कानून और व्यवस्था पर पड़ेगा जो कि एक खतरनाक स्थिति हो जाएगी.”

सिनेमा में दबंग पुलिसवाले की छवि बहुत लोकप्रिय है जो हालांकि ‘भ्रष्ट’ है लेकिन पड़ोस के गरीबों के लिए मददगार के रूप में दिखाया जाता है. लेकिन हकीकत सिनेमा से बहुत अलग है और पुलिस सुधारों को जल्द से जल्द अपनी रफ्तार पकड़नी होगी.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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