दल बदलते जनप्रतिनिधि

देवेंद्र वर्मा | फेसबुक
मध्य प्रदेश विधानसभा में बहुमत का फैसला माननीय उच्चतम न्यायालय में दायर शिवराज सिंह एवं अन्य की याचिका पर फ्लोर टेस्ट के अंतरिम आदेश से 24 मार्च को हो गया और भाजपा के शिवराज सिंह का “छद्म बहुमत” वाले भारतीय जनता पार्टी विधायक दल के नेता और मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी भी हो गई.

जैसा प्रत्याशित था, अंतरिम आदेश के अनुरूप ही उच्चतम न्यायालय का निर्णय भी आ गया, जिसे समाचार पत्रों ने शिवराज की जीत शीर्षक से प्रकाशित किया लेकिन संपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम मे शायद, संसदीय प्रणाली, संसदीय नियमों, एवं परंपराओं की हार किसी ने महसूस नहीं की.


वर्ष 2018 के आम निर्वाचन में प्रदेश की जनता ने भाजपा को विधानसभा में 165 विधानसभा सीट से 109 पर सीमित कर सत्ता से बाहर रहने, वहीँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 58 विधानसभा सीट से 114 विधानसभा सीट पर विजय दिला कर सबसे बड़े दल के रूप में सत्ता की चाबी सोपने की इच्छा व्यक्त की.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी एवं निर्दलीयों के समर्थन से 230 विधानसभा सीट वाली विधानसभा में 121 विधायकों के समर्थन से कमल नाथ के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार गठित हुई.

जुलाई 2019 में जब कर्नाटक में कांग्रेस एवं जेडीयू गठबंधन की सरकार को अपदस्थ करने का “प्रयोग” सफल हुआ तब से ही भाजपा के नेताओं ने बयान देना आरंभ कर दिया था कि कमल नाथ सरकार अपने बोझ से गिर जाएगी, अंततः कमल नाथ सरकार अपने बोझ से तो नहीं लेकिन महाराजा और उनके समर्थक मंत्री एवं विधायकों के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी छोड़ने से हल्की होकर गिर गई.

प्रदेश में जब कोरोना की आहट सुनाई देने लगी थी,तब एक राजनीतिक दल के विधायक महाराजा को नजराना भेंट करने के लिए कभी दिल्ली कभी बैंगलोर की प्रायोजित सैर कर रहे थे,“राजा से महाराजा” बने राजा “महाराजा” बने रहने की जुगत में लगे थे और कमल नाथ राजभवन के साथ अपनी सरकार बचाने के लिए पत्राचार के झमेले में फंसे थे . और भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह एवं अन्य भाजपा नेता संसदीय प्रक्रिया को तिलांजलि देते हुए उच्चतम न्यायालय मैं छद्म बहुमत की सरकार बनाने के लिए याचिका दायर करने की तैयारी में लगे थे.

शिवराज सिंह की याचिका के बिंदुओं की व्याख्या करते हुए ,उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में प्रतिपादित किया कि राज्यपाल फ्लोर टेस्ट के आदेश दे सकते हैं और हॉर्स ट्रेडिंग ना हो इस उद्देश्य से फ्लोर टेस्ट बिना किसी विलंब के करवाना आवश्यक है, न्यायालय ने राज्यपाल के फ्लोर टेस्ट के आदेश की पुष्टि करते हुए फ्लोर टेस्ट दूसरे दिन ही करने का अंतरिम निर्णय दिया.

उच्चतम न्यायालय के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ यहां यह उल्लेख करना है कि 22 रिक्त स्थान होने के पश्चात फ्लोर टेस्ट में “छद्म बहुमत” से भाजपा ने अपनी सरकार का गठन तो किया लेकिन उसके तत्काल पश्चात त्यागपत्र देने वाले 22 पूर्व कांग्रेस सदस्यों को भारतीय जनता पार्टी ने समारोह पूर्वक अपने दल की सदस्यता दिलवाकर और पश्चात प्रारंभिक तौर पर 2 पूर्व सदस्यों को 5 सदस्यों वाले शिवराज मंत्रिमंडल में सम्मिलित कर(अर्थात 50%) उच्चतम न्यायालय के निर्णय की मूल भावना के विपरीत आचरण करते हुए निर्णय के मूल तत्व “हॉर्स ट्रेडिंग ना हो” उच्चतम न्यायालय का अपरोक्ष रूप से असम्मान नहीं किया है ?

अभी “ट्रेडिंग” समाप्त नहीं हुई है, संविधान में असामान्य स्थिति के लिए प्रावधानित आर्टिकल(164/4) का संविधान की मूल भावना के विपरीत प्रयोग करते हुए, अभी मंत्रिमंडल के विस्तार में गैर सदस्यों को मंत्री बनाने के लिए मोल भाव जारी है, यदि मोलभाव हो जाता है तो देश के इतिहास में संभवतः यह पहला उदाहरण होगा जब किसी मंत्रिमंडल में सभा के सदस्य नहीं रहते हुए भी लगभग 50% स्थान पाएंगे.

आम निर्वाचन के पश्चात गठित बहुमत प्राप्त सरकार के संबंध में यदि प्रति पक्ष को ऐसा प्रतीत हो कि सरकार को बहुमत प्राप्त नहीं है,अर्थात अल्पमत मैं आ गई है, ऐसी स्थिति में संविधान के अंतर्गत निर्मित “मध्य प्रदेश विधानसभा प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली” में “अविश्वास प्रस्ताव” का प्रावधान है .राजनीतिक दलों को संसदीय प्रक्रिया में विश्वास रखते हुए क्या इसी प्रक्रिया का पालन नहीं करना चाहिए था ?

राजनीतिक दलों के लिए यह महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न इसलिए भी है कि, विधान मंडलों की दिन प्रतिदिन की कार्यवाही में अनावश्यक रूप से राज भवन/न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने का अवसर ना मिले और विधान मंडलों की सार्वभौमिकता सर्वोच्चता तथा गरिमा अक्षुण बनाई रखी जा सके,. जिस की प्राथमिक महती ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों एवं इनके नेताओं की है.

सभा की कार्यवाही के चलते ऐसे अनेक अवसर उपलब्ध रहते हैं जब प्रति पक्ष मतदान के माध्यम से सरकार को अपदस्थ कर सकता है इसके साथ ही “मध्य प्रदेश विधानसभा प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली” में बहुमत अथवा अल्पमत की स्थिति का निर्णय का प्रावधान भी “अविश्वास प्रस्ताव” के माध्यम से उपलब्ध है. नियमों प्रक्रियाओं एवं परंपराओं की स्थिति ज्ञात होने के बावजूद बजट सत्र के चलते रहने के दौरान प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों से परे भारतीय जनता पार्टी के द्वारा राज भवन और उच्चतम न्यायालय के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करना संसदीय प्रक्रियाओं परंपराओं के साथ ही नैतिक मूल्यों के अनुरूप है ?

संविधान में दसवीं अनुसूची के जोड़े जाने के पश्चात और उसमें समय-समय पर हुए संशोधनों से तथा मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या 15% तक सीमित करने के संविधान संशोधन के पश्चात दल बदल पर बहुत हद तक लगाम लग गई थी लेकिन विगत वर्षों में,राज्यों में सदस्यों की संख्या के 2/ 3 सदस्यों को अपने दल में सम्मिलित करने, सदस्यता से त्यागपत्र दिलवा कर छद्म बहुमत से अपनी सरकार बनाने पश्चात त्यागपत्र देने वाले सदस्यों को अपनी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवा कर,त्यागपत्र देने वाले सदस्यों को विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के पूर्व मंत्री नियुक्त कर उन्हें उपकृत करने जैसी कार्यवाही की एकाधिक राज्यों में पुनरावृत्ति होने से क्या इस बात की आवश्यकता महसूस नहीं होने लगी है कि दल बदल कानून को और अधिक सख्त बनाने या संविधान संशोधन करने की आवश्यकता है ?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मणिपुर मैं कांग्रेस विधायक श्री श्याम कुमार सिंह द्वारा जुलाई 2017 में भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित होकर लगभग 3 वर्ष तक मंत्री पद पर बने रहने और अध्यक्ष द्वारा दल बदल के अंतर्गत उन्हें प्राप्त आवेदन पर निर्णय नहीं करने को आधार बनाकर प्रस्तुत याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने गहरी अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए मणिपुर के अध्यक्ष को एक निश्चित समयावधि में दल बदल की अर्जी पर निर्णय करने हेतु निर्देशित किया तब 3 वर्ष के पश्चात मणिपुर के विधानसभा अध्यक्ष ने अध्यक्ष ने भारतीय जनता पार्टी के मंत्री मंडल में सम्मिलित कांग्रेस विधायक को दल बदल कानून के अंतर्गत विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया.

क्या 3 वर्षों तक कांग्रेस विधायक को भाजपा मंत्री मंडल का सदस्य बनाए रखना, राजनीति में शुचिता और नैतिकता के अनुरूप है?अंततः दल बदल कानून के अंतर्गत विचाराधीन याचिका पर अंतरिम निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने भाजपा मंत्रिमंडल से कांग्रेस के सदस्य श्री श्याम कुमार सिंह को पृथक किया.
आशय यह है कि संसदीय प्रक्रियाओं परंपराओं का पालन कर संसदीय प्रणाली को मजबूत बनाने का जो दायित्व राजनीतिक दलों का है उसमें राजनीतिक दल कहीं ना कहीं किसी न किसी कारण से अपने दायित्वों की पूर्ति कर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.फल स्वरूप आए दिन विधान मंडलों की कार्यवाही उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के निर्णयों से संचालित हो रही है.

उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका के न्याय निर्णय में केंद्र सरकार से, दल बदल कानून के अंतर्गत अध्यक्ष को निर्णय का अधिकार दिए जाने के प्रावधान पर भी पुनर्विचार करने एवं अन्य कोई प्रक्रिया लागू करने का सुझाव दिया है.

मूल प्रश्न यह है कि यदि राजनीतिक दल और इनके द्वारा गठित सरकार संविधान, संविधान के अंतर्गत निर्मित सदन के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम संसदीय प्रक्रियाओं का निष्ठा पूर्वक पालन नहीं करते हैं तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि “हमारा संसदीय प्रजातंत्र परिपक्व हो गया है?” यह यक्ष प्रश्न आप सबके विचार मंथन के लिए मैं यही छोड़ता हूं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!