दूध का जला

कनक तिवारी | फेसबुक: समाज के रोजमर्रा और अनुभवी बुद्धि के कई मुहावरे मनुष्य के आचरण को जांचने की कसौटियां हैं. मुहावरा रचा ‘दूध का जला छाछ को फूंक कर पीता है.‘ पता नहीं कब, कहां और किसने क्यों रचा? समाज में इसका लक्षण लगातार दिखता है.

नेता राजनीति की कड़ाही में अहंकार के उबलते दूध पर पड़ती सत्ता की मलाई को गड़प करते रहते हैं. लालच की कड़ाही का गर्म दूध भी पीते हैं. लालच से मुंह जल जाता है. फिर मतदाताओं के बीच बची खुची साख को गिरता देखकर छाछ फूंक फूंककर पीने लगते हैं.


कांग्रेस ने सत्ता की मलाई चट करने सबसे ज्यादा जतन किए. विपक्षी पार्टियों को खुरचन देने से भी कतराती रही. फिलहाल कांग्रेस अधिकृत प्रतिपक्ष की खुरचन के लिए तड़प रही है. अहंकार का गर्म दूध सत्ताधारी भाजपा के हलक में छलक रहा है. उसने लोकसभा में अपने दम पर मलाई के स्वाद का चटखारा लिया है. छाछ फूंक फूंककर पीने का अपना प्रतिपक्षी समय भूल रही है.

आडवाणी राममंदिर बनाने सांप्रदायिक कड़ाही में दूध गर्म करते रहे. हवाला के नीबू का रस डालकर वाजपेयी को सत्ता की मलाई मिल गई. शिष्य ने अब आडवाणी को दूध की मक्खी बनाकर छाछ तक पीने के लायक नहीं छोड़ा.

कांग्रेसी पुराने सत्तानशीन अहंकार में देश चलाने से पार्टी चलाना ज्यादा बड़ा मान रहे हैं. राहुल कांग्रेस अध्यक्ष बने रहते तो दूध गर्म करना तो आता जाता. अगले चुनावों तक मलाई की स्थिति राजनीति में बनती रही है. कांग्रेस ने गांधी नेतृत्व में बकरी का दूध और छाछ का महत्व समझा. तब आजादी की मलाई मिली. राजनीति के टापू में एक छोटी पार्टी आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री को सरकार के गर्म दूध पीने का अहंकारी बताया जा रहा है.

कम्युनिस्ट पार्टियां तीन राज्यों में काबिज रहीं. लगा विश्व विजय कर चुके. सत्ता का गर्म दूध एक घूंट में हलक में उतारना चाहा. नतीजतन केरल छोड़कर सियासती छाछ फूंक फूंककर पीने अभिशप्त हैं. बंगाल में कम्युनिस्ट बीसियों साल दूध मलाई चट करते रहे. बिल्ली की चपलता के साथ तृणमूल की ममता बनर्जी सत्ता की मलाई चाट गईं.

अब चिटफंड कम्पनी की कड़ाही का उनके वक्त उबाला दूध भाजपा और भगोड़ों की मलाई की किस्मत न बन जाए. कर्नाटक में दलबदल बिल्लियों को ही सियासी मलाई मिलती है. कांग्रेस, जे.डी. (एस) के गर्म दूध की कड़ाही ही उलट गई है. बिहार में नीतीश को मलाई चाटना अच्छा लगता है. यादव वंश के होकर भी लालू जेल की रोटियां चबा रहे हैं.

उत्तरप्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती तीन बार मुख्यमंत्री बनीं. दसों उंगलियां घी में और सिर दूध की अहंकारी कड़ाही में डूबता रहता. हालत है वहां छाछ भी नसीब नहीं है. समाजवादी अखिलेश यादव और पिता मुलायम सिंह यादव के अहंकारी दुग्ध भंडार को छाछ में तब्दील करने अमरसिंह जैसे सूरजमुखी और आजमखान जैसे मुंहफट नीबू भी रहे हैं.

समाजवादी दूध फाड़ने के लिए कटा नीबू हर वक्त रखते हैं. बीमारू राज्य के मुसलमानों ने नीबू भाजपा के झांसे में आकर दूध की विरोधी कड़ाही में निचोड़ दिया. राजद, सपा, कांग्रेस, कम्युनिस्ट को भाजपा ने छाछ पीने के लायक भी नहीं छोड़ा. तेलंगाना के रामचंद्र राव और आंध्र के जगन रेड्डी बिल्ली बने मौके की ताक में रहे. तेदेपा के चंद्राबाबू नायडू के गर्म दूध की कड़ाही की मलाई चट कर गए. कई छोटी पार्टियों को मलाई चट करने के मौके मिले लेकिन मलाई हजम नहीं हुई. फिर छाछ भी नहीं मिली.

शिवसेना से अलग मनसे नेता राज ठाकरे खुद को महाराष्ट्र का दुग्ध उद्योग समझने लगे. राज ठाकरे को छाछ तक उपलब्ध नहीं है. कभी गर्म तो कभी ठंडा दूध पीने में ओडिसा में बीजद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को महारत है. वे तेल लगाकर कुश्ती लड़ते हैं. केन्द्र के दूध में ओडिशा की मलाई डालकर पीते रहते हैं.

धर्मसुलभ पार्टी भाजपा और संघ परिवार को सूझा. वैचारिक दूध और तल्ख वक्तव्यों के दही के साथ, आश्वासनों की शहद और उद्योगपतियों की काली कमाई की शक्कर मिलाकर उस समय प्रदूषित गंगा का पावन जल मिलाकर सत्ता प्रसाद का पंचामृत तैयार किया जाए. अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी प्रज्ञा, साध्वी निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, उमा भारती, रामदेव जैसों के मुख से निकलते रहे अम्ल को मिलाकर संघ परिवार राज्यतंत्र की कथा का प्रसाद अकेले ही उदरस्थ कर रहा है. यही दूध और छाछ की कथा का सत्ता समीकरण है.

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