भुखमरी वाले देश में सड़ते अनाज

देविंदर शर्मा
कई बार किसी वस्तु के बहुतायत में होने के बावजूद बना अजीब सा विरोधाभास व्याख्या से परे होता है. ऐसे समय में जब देश के खाद्यान्न भंडार फटने की हद तक अनाज से अटे पड़े हैं, तब वर्ष 2019 के लिए जारी किए गए ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक सूची’ में भारत को 117 देशों में 102वें स्थान पर रखे जाने पर हैरानी होती है, क्योंकि इस रैंकिंग के मुताबिक यह पायदान गंभीर भुखमरी की श्रेणी में आने वालों का बनता है.

यही काफी नहीं था कि यूनीसेफ की ‘दुनिया भर में बच्चों की स्थिति’ नामक रिपोर्ट में 5 साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में भारत का स्थान सबसे ऊपर बताया गया है. यानी हर साल 8.82 लाख नन्हे बच्चे असामयिक मृत्यु को प्राप्त होते हैं.


एक तरफ ये रिपोर्टें हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय उपभोक्ता मामले और खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में और ज्यादा अनाज रखने की गुंजाइश नहीं है, अतएव फालतू खाद्यान्नों को बतौर मानवीय सहायता एवं दान जरूरतमंद और पात्र देशों तक पहुंचाया जा सकता है.

अब विडंबना देखिए कि ठीक इसी वक्त अपने ही देश में 6 से 8 माह के शिशुओं में लगभग 90 फीसदी कुपोषण के शिकार हैं ! जहां अत्यंत भूख गरीबों पर मार करती है वहीं मौन त्रासदी की भेंट सबसे कीमती मानव स्रोत यानी नौनिहाल चढ़ते हैं और यह तमाम वाकया बेआवाज हो गुजरता है. प्रत्येक एक सेकेंड कोई न कोई एक बच्चा अविकसित या कुपोषित बन जाता है.

रिपोर्टें बताती हैं कि 1 अक्तूबर, 2019 के दिन कुल जनसंख्या के हिसाब से देश को 307.70 लाख टन खाद्यान्न की जरूरत बनती है लेकिन राष्ट्रीय खाद्य निगम के गोदाम उक्त तारीख से एक महीने पहले ही यानी 1 सिंतबर के दिन दोगुणे से अधिक यानी 669.15 लाख टन गेहूं-चावल से अटे पड़े थे. तिस पर मौजूदा खरीफ फसल में धान की आमद पूरे शबाब पर है, लिहाजा आने वाले कुछ हफ्तों में केंद्रीय पूल की खाद्य भंडारण समर्था पर और ज्यादा बोझ पड़ने की पूरी उम्मीद है.

इस स्थिति में और अधिक इजाफा 2018-19 में हुई फलों और सब्जियों की रिकॉर्ड फसल ने कर दिया है, ऊपर से इस अवधि में दूध का उत्पादन अलग से 176 मिलियन टन को छू गया है. खाने-पीने की इतनी बहुतायत के चलते कोई वजह नहीं बनती कि भारत में विश्वभर में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार मौजूद हों. जैसा किसी ने पहले कहा है- ‘यदि भंडारों में पड़े अनाज के बोरों को एक-दूसरे के ऊपर रख दिया जाए तो चांद तक जाकर वापिस आया जा सकता है.’ इस टिप्पणी के बाद भी अतिरिक्त खाद्यान्न के भंडार बढ़ते ही जा रहे हैं.

फालतू अनाज का इतना विशाल भंडार होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत को अपने पड़ोसी मुल्कों से भी नीचे रखा गया है. जबकि चीन इस सूची में गौरवान्वित 25वें स्थान पर है. भारत ‘ब्रिक्स’ देशों से भी कहीं नीचे पायदान पर है, जबकि श्रीलंका (66वें), नेपाल (73वें), बांग्लादेश (88वें) उत्तर कोरिया (92वें), इथियोपिया (93वें) और पाकिस्तान (94वें) ने हमसे बेहतर कारगुजारी दिखाई है.

वर्ष 2006 से शुरू होकर, जब से अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक जारी होने शुरू होने हुए हैं, तब से आई 14 रिपोर्टों में भारत की स्थिति कमोबेश वहीं की वहीं बनी हुई है.

यहां तमाम प्रश्न प्राथमिकताओं का बनता है क्योंकि जहां तमाम जोर आर्थिक विकास की ऊंची दर पाने पर लगा हो, वहां भूख और कुपोषण पर दिए जाने वाले ध्यान को आर्थिक उन्नति की स्वप्निल आभा में बुहारकर एक किनारे कर ही दिया जाता है. लेकिन भूख का कुरूप चेहरा है कि वह आर्थिक सुधारों के लिए बनाई जाने वाली इन तमाम नीतियों को धता बताते हुए इनकी ‘उपलब्धि’ को ढांप लेता है, जबकि इनके नियंता इस धारणा पर यकीन करते हैं कि आर्थिक उन्नति होने से भूख की शिकार जनसंख्या खुद-ब-खुद घट जाएगी.

यह तब भी होता रहा था जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को एक ‘राष्ट्रीय शर्म’ ठहराया था. उनसे पहले रहे प्रधानमंत्रियों ने भी समय-समय पर भुखमरी से लड़ने का संकल्प दोहराया था, लेकिन भूख और कुपोषण हैं कि सदाबहार कंटीली झाड़ी की तरह कायम हैं.

भुखमरी हटाना वाकई एक जटिल कार्य है. यदि यह दावा ठीक है कि बाल-कुपोषण हटाने में काफी कुछ हासिल किया गया है तो फिर भुखमरी को इतिहास की वस्तु बनाना भी कोई असंभव कार्य नहीं है.

वर्ष 2013 में राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा योजना-2013 लागू की गई थी, इसके लाभार्थियों में लगभग दो-तिहाई लोग बनते थे, जिन्हें सस्ती दरों पर अनाज दिया जाना तय किया गया था, परंतु यहां इस तर्ज पर भूख और कुपोषण को मिटाना स्थूल-आर्थिकी नीतियों (मैक्रो इकॉनोमी पॉलिसीज़) का मूल ध्येय नहीं लगता है.

यहां तक कि जब उपरोक्त वर्णित खाद्य सुरक्षा नीति का खाका तैयार किया जा रहा था तो मुख्यधारा के कई आर्थिक विशेषज्ञों ने इसको लेकर अपनी आशंका जताई थी कि खाद्यान्नों पर सब्सिडी बढ़ाने से देश का सकल वित्तीय घाटा बढ़ेगा.

परंतु यह धारणा ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा द्वारा वर्ष 2003 में लागू किए गए ‘अत्यंत गरीबी उन्मूलन’ के तहत ‘ज़ीरो हंगर कार्यक्रम’ की सफलता के एकदम विपरीत है. उक्त विधि में आपातकालीन सहायता के साथ-साथ कृषि में आधारभूत सुधारों का सम्मिश्रण था. समाचार पत्र ‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 आते-आते देश के लगभग 3.2 करोड़ लोग (कुल आबादी का 16 फीसदी) उक्त कार्यक्रम की वजह से गरीबी रेखा से ऊपर आ चुके थे.

इसके तहत ‘बोसला फैमिलिया’ नामक आय हस्तांतरण कार्यक्रम का समावेश था, जिसके चलते देश की एक-चौथाई से ज्यादा आबादी की पहुंच संयुक्त खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक हो गई थी और स्थानीय क्षेत्र, खासकर ग्रामीण-विकास करने, के उपाय लागू करने से काफी लाभ हुआ था. इसकी बदौलत आज भुखमरी सूचकांक में ब्राजील का स्थान 18वां है, वह सूची में चीन से भी बेहतर पायदान पर है.

ब्राज़ील के ‘ज़ीरो हंगर कार्यक्रम’ ने सफलतापूर्वक खाद्य उत्पादन को भूख मिटाओ ध्येय से जोड़ दिखाया है. हां, बीच में कुछ रिक्त स्थान हो सकता है तथापि समयबद्ध चरणों में इसको प्राप्त किया गया है, इसका अनुसरण किया जा सकता है. भारत में नीतियां ज्यादातर खाद्य उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित होती हैं, परंतु फालतू अनाज को कमी वाले क्षेत्र में बांटना एवं किसानों की भलाई पर तरजीह कहीं दिखाई नहीं देती है.

कृषि क्षेत्र में परोक्ष-अपरोक्ष रूप से लगभग 60 करोड़ श्रमिक जुड़े हैं, कृषि का पुनरुत्थान करना मूल सिद्धांत होना चाहिए. इस ध्येय को सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा किए जाने वाले निवेश को बढ़ाकर किया जा सकता है, जो अन्यथा वर्ष 2011-12 लेकर 2016-17 के बीच कुल सकल उत्पादन का महज 0.4 प्रतिशत रहा है.

पिछले कुछ दशकों से भूख से लड़ने के ज्यादातर नारे-इरादे आधे-अधूरे दिल से किए जाते रहे हैं, परंतु चौंका देने वाले इस आंकड़े के मद्देनजर कि हर दिन 2,400 से ज्यादा शिशु कुपोषण का शिकार होकर दम तोड़ देते हैं, इसे ‘मौत का बोझ’ श्रेणी में रखा जा सकता है. साल-दर-साल खाद्यान्न उत्पादन के स्तर में कोई कमी न आने और आर्थिक नीतियों को नए सिरे से बनाने की हमारी समर्था के चलते जरूरत है तो केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की जो भुखमरी को मिटा सके.

भारत तब तक एक आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना नहीं देख सकता जब तक इसकी आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूखा और कुपोषण का शिकार है.

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