सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिये प्रदर्शन

रायपुर | संवाददाता: भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तार सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिये छत्तीसगढ़ के कई शहरों में प्रदर्शन हुये हैं. छत्तीसगढ़ के मज़दूर संगठन और आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय सुधा भारद्वाज की गिरफ़्तारी के दो साल पूरे हो चुके हैं. लेकिन कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही सुधा भारद्वाज को जमानत नहीं मिली है.

हाईकोर्ट की एडवोकेट सुधा भारद्वाज की गिरफ़्तारी के दो साल पूरे होने पर उनकी बेटी ने एक मार्मिक चिट्ठी लिखी है. सुधा भारद्वाज की बेटी मायशा फरीदाबाद में रहती हैं.


सुधा भारद्वाज की 23 साल की बेटी मायशा ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि “आज के दिन दो साल पहले माँ को गिरफ़्तार कर लिया गया था. जब वो हाउस अरेस्ट में थीं, तब स्थितियां अलग थीं. मैं उन्हें देख सकती थी, छू सकती थी, बात कर सकती थी. लेकिन जब से उन्हें जेल ले जाया गया, मुझे लगता है कि मेरे दिल के टुकड़े को छीन लिया गया है. ख़ुद को संभालना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है. उनकी गिरफ्तारी के बाद मैं महीनों तक रोयी हूं.”

मायशा ने अपने पत्र में लिखा है- “जब कोविड-19 महामारी शुरू हुई और क़ैदियों को अपने परिवार वालों से फ़ोन पर बात करने की इजाज़त दी गई, तब मैं हर दिन उनके कॉल का इंतज़ार करती थी. लेकिन उस इंतज़ार का कोई फ़ायदा नहीं हुआ. आख़िरकार 9 जून को मैंने चार महीने बाद उनकी आवाज़ सुनी. तब मैं बहुत ख़ुश भी हुई और भावुक भी.”

अपनी चिट्ठी में मायशा ने लिखा है-“मेरी मां ने भारत में रहने के लिए अपनी अमरीकी नागरिकता छोड़ दी और यहां लोगों की सेवा की. लेकिन सरकार कह रही है कि उन्होंने अपनी नागरिकता इसलिए छोड़ी कि वो ग़रीब लोगों का इस्तेमाल करें और सरकार के ख़िलाफ़ उन्हें बरगलाएं. इसलिए मैं पूछना चाहती हूं कि क्या कोई और ऐसा व्यक्ति है जिसने सिर्फ़ अपने देश के लोगों की सेवा के लिए अमरीका की अपनी आरामदायक और अच्छी ज़िंदगी छोड़ दी हो? और फिर उन्हें देश-विरोधी क़रार दे दिया गया हो? मेरी दादी (कृष्णा भारद्वाज) जो एक जानी-मानी अर्थशास्त्री हैं, वो मेरी मां को अपने जैसा बनाना चाहती थीं. लेकिन मेरी मां ने अपना रास्ता चुना; उन्होंने अपने लोगों की सेवा करना चुना. क्या ये देश-विरोधी है?”

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