सुनील गावस्कर : आज की युवा पीढ़ी के लिए

आलोक वाजपेयी | फेसबुक
जब भी भारत के बल्लेबाजों (तेंदुलकर से लगाकर इधर के रोहित शर्मा ,कोहली) को महान और न जाने कितनी उपाधियों से विभूषित किया जाता है और उन्हें सर्वकालिक महान तक बता दिया जाता है तो हंसी आती है. जिसे भी क्रिकेट की थोड़ी भी समझ होगी वो इन सब बातों का खोखलापन और बाजारवाद का झुंझुनापन जान लेगा.

बात करते हैं गावस्कर की .


कुछ तथ्य बताते चलेंगे बस और बात साफ होती जाएगी कि बंदा क्या चीज था और क्या है.

1971 से भारत के लिए खेलना शुरू किया. शुरू से सलामी बल्लेबाज के लिए. पहली श्रृंखला विदेश वेस्टइंडीज में. उस जमाने मे वेस्टइंडीज के गेंदबाज आग उगलते थे. गावस्कर के पास तेज गेंदबाजी खेलने का कोई अनुभव नही था क्योंकि भारत मे तेज गेंदबाज तो छोड़िए ,ठीक ठाक मीडियम पेसर भी न थे. गावस्कर के सामने कोई पूर्ववर्ती उदाहरण भी उस तरह का न था जो तेज गेंदबाजी की आंधी में टिकने के लिए उनकी मदद करता.

उस अपनी पहली श्रृंखला में गावस्कर ने कमाल कर दिया. शतक लगाये ,दोहरा शतक लगाया. भारत से तेज गेंदबाजी खेलने का यह मुकम्मल बल्लेबाज किस तरह से बन सका ,यह आश्चर्य है.

1970 और1980 का दशक दुनिया मे तेज गेंदबाजी का सर्वोत्कृष्ट काल था और वेस्टइंडीज के बॉलर उनमे सबसे तेज किया भयानक थे. लेकिन गावस्कर ने सबसे ज्यादा वेस्टइंडीज के खिलाफ ही सबसे अच्छा और लगातार अच्छा खेला.

उस समय शरीर की सुरक्षा के लिए कुछ न था. केवल ग्लब्स ,पैड और AD थी. बाद में जब हेलमेट आये तो भी गावस्कर ने चेहरा ढंकना स्वीकार नही किया.

गावस्कर की वेस्टइंडीज के खिलाफ आखिरी इनिंग को कौन भूल सकता है. उस इनिंग में कोई वजह से गावस्कर ओपन करने नही आये और जीरो पर भारत के दो विकेट गिर गए. गावस्कर गार्ड ले रहे थे कि विवियन रिचर्ड्स ने पास आकर मजाक में कहा कि क्या गार्ड ले रहे हो ,अभी आप भी आउट होकर वापस लौट जाओगे. गावस्कर शांत रहे और जम गए. 236 नॉट आउट बनाये. वेस्टइंडीज के खिलाफ 1971 में उन्होंने जो शानदार शुरुआत की थी उसका समापन नॉट आउट रहकर किया.

गावस्कर के बारे में मशहूर था कि वो स्कोर बोर्ड नही देखते थे कि कितने रन बना चुका. उनकी एकाग्रता के किस्से मशहूर थे. कभी तेज गेंदबाजी खेलते हुए उन्हें विचलित या घबराया हुआ नही देखा गया.

गावस्कर खुद को एक गरिमामय भारतीय की तरह रखते थे. वह आक्रामक उग्र राष्ट्रवाद नही था जिसका फूहड़ मुज़ाहिरा आजकल कोहली सरीखे दिखाते हैं. वह उन भारतीयों की तरह थे जो स्वभावतः ही भारत के प्रति आत्मविश्वास युक्त थे और सम्मान प्यार अर्जित करते थे.

बिंदास इतने कि वेस्टइंडीज में स्टेडियम में खेल के दौरान जाकर कभी कभी वहां के folk music में डांस भी कर आते थे.

ऑस्ट्रेलिया में एक कैरी पेकर पूंजीपति हुए. उन्होंने पूरी दुनिया के बड़े खिलाड़ियों को खरीद लिया और अपने यहां क्लब में खिलवाया. गावस्कर ने बिकने से मना कर सिया और कहा कि मुझे अपने देश की तरफ से खेलने में फख्र होता है और बिकने से इनकार कर दिया.

निजी जीवन और सोच में भी गावस्कर एक अनुकरणीय व्यक्ति हैं.

(गावस्कर के नाम जो अनगिनत रिकॉर्ड्स हैं उन्हें आप गूगल कर सकते हैं. )

इसलिए हमारे युवा दस्तों ,आजकल के तमाशबीन क्रिकेटरों की तारीफ करो लेकिन उन्हें सर्वकालिक टाइप न बना दो यार. ये खेल के स्तर ,टेम्परामेंट, तकनीक आदि सबमे क्रिकेट के इतिहास के फलक पर औसत ही हैं.

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