सरकारी नीयत पर सुप्रीम फतवा

कनक तिवारी
संसार के सबसे बहुसंख्यक लोकतंत्र के देश के इतिहास की सबसे घातक महामारी में लाखों करोड़ों नागरिकों की जिंदगियों की बरबादी होने पर भी सरकारें अपने मानवीय कर्तव्य में काफी शिथिल दिखाई पड़ी हैं. केन्द्र सरकार ने तो अपने संवैधानिक ज्ञान की अक्खड़ प्रयोगशीलता में सुप्रीम कोर्ट तक में कार्यपालिका की नैतिकता का मनुष्य विरोधी परिचय दिया.

कौन नहीं जानता कोविड-19 की बीमारी एक तरह से लाइलाज हो रही करोड़ों को लील रही है. मनुष्यों की सेहत के साथ शेर-मेमने के रिश्तों की तरह खिलवाड़ करती तबाह करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ रही. महामारी के कारण नौकरियां, रोजगार, व्यवसाय, कला, संस्कृति, प्रशासन, श्रम सहित सभी मानवीय इलाकों में बेकारी, पस्तहिम्मती और महंगाई का आलम पसरता जा रहा है.


कोई कितनी ही झूठी डींग मारे, भारत का सामाजिक जीवन, अर्थव्यवस्था और नागरिकों तक के आपसी इंसानी रिश्ते भी लड़खड़ा गए हैं. दशकों तक उनसे उबर पाने की संभावनाएं फिलहाल तो मृगतृष्णा की ही तरह झिलमिलाती हैं.

दुखद बात है कि संविधान में सरकारों पर देश की जनता के स्वास्थ्य और इलाज के लिए आज्ञाकारी बंदिशें तक नहीं हैं. संविधान-पुरखे मुनासिब बहस तक नहीं कर पाए. वे हिदायत देकर तसल्ली कर गए कि भविष्य की सरकारें जनता की मुनासिब सेवा कर पाएंगी.

देश, प्रदेशों की सरकारों ने आज तक कुछ भी सार्थक नहीं किया, हालांकि कोशिशें होती रहती हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य दो बुनियादी ज़रूरतें हैं. उन पैरों पर खड़ा होकर ही देश आगे बढ़ता है. भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा निरक्षर, एड्स और शक्कर की बीमारियों के मरीज, अंधत्व के शिकार, कुपोषित परिवार और अब कोविड-19 की महामारी के शिकार हो गए हैं.

आजादी के करीब साठ वर्ष बाद संसद ने महसूस किया कि कुदरती आपदाओं से जनता को बचाने के कोई असरकारी कानून है ही नहीं. इसलिए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 संसद में बना. भारतीय अनुभव के साथ यह ज़रूर है कि न केवल संविधान बल्कि बाकी कानूनों में भी उसकी मनुष्य आबादी के अनुपात में ज्यादा से ज्यादा कानून ही कानून बनाए जाते हैं. कानूनों का अमल करना सरकारी फितरत में अमूमन नहीं होता.

ऐसी ही लापरवाह अनदेखी आपदा प्रबंधन अधिनियम की भी होती रही. आपदाएं लाचार जनता, सरकारी मुलाजिम या हुक्म की मानिंद नहीं होतीं. विपदाओं के अंधड़ में भूकम्प, समुद्री तूफान, हिमालय सहित पहाड़ों के भू स्खलन, स्वाइन फ्लू, तपेदिक, मलेरिया आदि बिन बुलाए मेहमानों की तरह आते रहे. वे देशी विदेशी काॅरपोरेटियों की तरह जबरिया नागरिक जीवन में दखलंदाजी करते रहे.

सरकारों की नींद खुलती तो है. देर रात तक सत्ता की मदहोशी के कारण सुबह जब विपदाएं अलार्म बजाती हैं. तब अपनी शाइस्तगी में करवटें ली जाती हैं. मैदानी स्तर के मुलाजिम दत्तचित्त होकर अपनी ज़िंदगियां ख़तरे में डालकर हमवतनों को बचाने की जुगत में लगाए जाते हैं.

साहब, मंत्री, अफसर, हुक्काम ज़्यादातर आदेश देते, मीडिया में अपनी छवि चमकाते, आश्वासनों की बेमौसम बौछार करते इतिहास की खोह में अपनी जगह मुकर्रर करने लग जाते हैं. कोविड महामारी ने लेकिन कलई खोल दी. झूठ के परखचे उखड़े.

कथित सरकारी विशेषज्ञों को तो अंदाज नहीं था कि शायद चीन की वुहान फैक्टरी से निकला जिन्न दुनिया को भारत सहित अपनी चपेट में ऐसे लेगा कि उसे खत्म करना तो दूर उससे बचना तक असम्भव लगेगा. ले देकर कोविशील्ड और कोवैक्सीन लगाने से जीवन बचेगा का आशंकित आश्वासन सरकारी ऐलान में तैरने लगा.

संवैधानिक पंथनिरपेक्षता को छद्म धर्मनिरपेक्षता का कटाक्ष करने वालों के परिवारों में भी कोविड लाशें पैदा होती इस्लामी-ईसाई तहजीब के अनुसार मजबूरी में हिन्दुओं की पवित्र नदी गंगा किनारे फेंकी या दफनाई गईं. कोविड ने धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा सोच के जेहन की तमीज में आंज दी.

बेहद लाचारी, गरीबी, मुफलिसी, परेशानदिमागी और हताशा के मौजूदा दौर में कुछ युवा वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लगाईं कि आपदा प्रबंधन कानून के तहत पीड़ितों को कम से कम चार लाख रुपए का मुआवजा सरकार से दिलाया जाए. संविधान में राज्य-केन्द्र जिम्मेदारियों के बटवारे के तहत तीसरी अनुसूची में सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 रचा गया.

साफ कह दिया केंद्र ने वह बरबादी झेल चुके परिवारों को भी कोई अनुग्रह राशि देने की हालत में नहीं है. फिर कहा धन तो है लेकिन मरे हुए या लाचार लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने के बदले इलाज, अधोसंरचनाओं और अस्पतालों, वैक्सीनों पर खर्च करना होगा. यह भी कहा कि धन दिलाना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट जानता है कि वह सरकारी धन का मुनीम, खजांची, चार्टड एकाउन्टेन्ट या ऑडिटर नहीं है.

वर्षों के सूखेपन पर मानसूनी मौसम में सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर बौछार की दस्तक लगी. कोर्ट ने कहा मुआवजा देना होगा. कानून की व्याख्या हम करेंगे. सरकार का तर्क खारिज है कि कोविड प्राकृतिक आपदा नहीं है. अन्यथा भी इंसानी कारणों से भी आई आपत्ति को अधिनियम ने आपदा माना है. उसके तहत आपदा से निपटने की तैयारियां भी शामिल हैं, जो फिलवक्त लचरपचर हैं.

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद ही केन्द्र सरकार ने मुफ्त वैक्सीन देने का ऐलान किया है. वरना दो बिल्लियों की इस तरह रोटी किसकी की लड़ाई केन्द्र और राज्यों के बीच चल रही थी. महत्वपूर्ण है राष्ट्रीय आपदा अथाॅरिटी का पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री ही होगा. वे किसी को उपाध्यक्ष नामांकित कर सकते हैं.

हालांकि मालूम नहीं जिम्मेदार उपाध्यक्ष वहां है भी या नहीं. राष्ट्रीय प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि आपदा के खिलाफ प्रभावशाली उत्तर, प्रतिक्रिया, उन्मुक्ति या छुटकारा पीड़ितों को दिलाए. उसमें अनुग्रह राशि देने का अधिकार और कर्तव्य भी शामिल है. यही सुप्रीम कोर्ट का आशय हुआ.

अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट को धारा 12 के तहत अनुग्रह सहायता वगैरह के लिए छह हफ्ते में मार्गदर्शक सिद्धांतों को बनाने की हिदायत देने के बदले यह भी कह सकना था कि धारा 6 के तहत राष्ट्रीय प्राधिकरण को आपदा का प्रभावी मुकाबला सुनिश्चित करने के लिए पहले ही आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और मार्गदर्शक सिद्धांत बनाना था. उसने यह जिम्मेदारी नहीं निभाई. अब वह यह जिम्मेदारी निभाए.

प्राधिकरण मार्गदर्शी सिद्धांत बनाए लेकिन कर्तव्यहीनता के कारण सरकार अपनी जिम्मेदारी का अहसास करे और कर्तव्य निभाए. इन दोनों हिदायतों में फर्क होता. फिर भी अब यह सरकार पर है कि नैतिक ईमानदारी के तहत और अपनी लगातार असफलता से परेशान हुए बिना लोकतंत्र में हर नागरिक को उसकी गरिमा के साथ भागीदार बनाए. संविधान के अनुच्छेद 21 में केवल जी लेना मनुष्य का अधिकार नहीं है. उसे गरिमा के साथ पेट भरने और हर तरह की नागरिक सहूलियत पाने का भी हक है.

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