यह बंद मुंह का घाव नासूर नहीं बनने पाए!

कनक तिवारी | फेसबुकः
एक घाव धोखा दे गया. लगा वह सूख रहा है. उस पर वक्त की पपड़ी जम रही है. फिर लगा न केवल सूख जाएगा उसका कोई दाग भी नहीं छूटेगा. हकीकत ऐसी नहीं थी. घाव अंदर ही अंदर पक रहा था. परंपरा और अनुशासन के कारण हालांकि वह बंद मुंह का घाव था. उसमें इतनी मवाद पड़ गई कि फूट गया. फिर दुनिया को दिखाई पड़ा. इस घाव का इलाज अब तुरंत नहीं किया गया तो इसके नासूर भी बन जाने की संभावना है. लोकतंत्र के अंग विधायिका ने जनविश्वास पहले ही काफी हद तक खो दिया है.

नेताओं का पांच सालाना आचरण शर्त की दीवार पर सलीब की तरह टंगा है. कार्यपालिका की धींगामस्ती, हेकड़ी और प्रशासनिक दादागिरी से आम जनता कांप रही है. उस पर घूसखोरी, पक्षपात, अत्याचार वगैरह की परतें वर्क की तरह बल्कि मगरमच्छ की कड़ी चमड़ी की तरह चढ़ गई हैं. देश न्यायपालिका के उगते सूरज की ओर मुखातिब हुआ. वह लोकतंत्र की दोपहरी में सूरज बनकर चमका भी. लगता है अब उसका भी अस्ताचल होने का इशारा आसमान की बुलंदियों से गिर रहा है.


सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में काॅलेजियम नामक उपग्रह का आविष्कार किया. वह संविधान की काठी चढ़कर संसद और सरकार के ऊपर आदेश बनकर तैरने लगा. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और सेवा शर्तों का अधिकार उसने खुद गढ़ लिया. वर्षों की मशक्कत के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक कमीशन अधिनियम पारित कर न्यायपालिका और संसद में संतुलन बिठाने की कोशिश की. कई कानूनी खामियों के चलते अधिनियम सुप्रीम कोर्ट ने ही रद्द कर दिया. इसी कशमकश के बीच एक याचिका दायर हुई. सरकार को निर्देश दिए गए कि प्रक्रिया संबंधी प्रारूप बनाए, दिखाए और सलाह मशविरे के बाद लागू करे. वह मामला अधर में लटकता रहा.

अचानक चीफ जस्टिस को न जाने क्या सूझी कि उन्होंने संविधान पीठ के उस आदेश को प्रशासनिक आदेशों के तहत समझते हुए दूसरी बेंच को रेफर कर दिया. पहला आदेश रद्द कर दिया गया.

फिर उत्तरप्रदेश के मेडिकल कॉलेजों के खोलने का विवाद सामने आया. संबंधित मुकदमा जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने सुना जब वह मुख्य न्यायाधीश नहीं थे. अमूमन तय हुआ कि याचिकाकार को जो आदेश मिलेगा उससे संतुष्ट होकर आगे याचिका दायर नहीं करेगा. ठीक उसके बाद और बावजूद याचिकाकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति मिल गई. कई और उद्योगपति यही काम करने अदालतों के चक्कर लगा रहे थे. लगता है उनमें से कुछ ने जरूरी जानकारियां जुटाई होंगी. प्रशांत भूषण, कामिनी जायसवाल और दुष्यंत दवे जैसे वरिष्ठ वकीलों ने मामला उठाया लेकिन याचिकाएं रद्द कर दी गईं. एक याचिकाकार पर 25 लाख रुपए का जुर्माना तक ठोक दिया गया. भरी अदालत में प्रशांत भूषण और साथियों पर वकीलों के ही एक समूह ने कटाक्ष और कटु वचन का इस्तेमाल किया.

यक्ष प्रश्न है कि ऐसी क्या जरूरत थी कि चारों वरिष्ठतम न्यायाधीशों को प्रेस और जनता के सामने आना पड़ा. उनके पास और विकल्प नहीं था? जजों की नियुक्तियों में घपले जो हो रहे हैं. ‘अंधा बांटे रेवड़ी‘ की कहावत को बूझा जा रहा है. जिस हाई कोर्ट में वकालत करते करते जज बनते हैं और अपने रिश्तेदार वकीलों के जरिए भ्रष्टाचार करते हैं. हिम्मत नहीं दिखाते कि उन्हें किसी दूसरे प्रदेश में नियुक्त कर दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट के चेहरे पर खरोंच आ गई हो. उसे चेचक के दाग में तब्दील नहीं होना चाहिए. कॉलेजियम के बाकी चार सदस्यों की भावनाओं को चीफ जस्टिस ने क्यों नहीं समझा? देश अटलबिहारी वाजपेयी को याद रखेगा जिन्होंने दो दर्जन से ज्यादा छोटी बड़ी पार्टियों के जमावड़े को साधकर पांच साल तक सफल सरकार चलाई. न्यायाधीश इसके बरक्स बंद कमरे में बैठकर सहमति पैदा कर सकते थे. चार में तीन जज न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के पहले रिटायर हो जाएंगे और इसी साल न्यायमूर्ति मिश्रा भी.

सुप्रीम कोर्ट में विश्वस्तरीय प्रणम्य न्याय-निर्णय हुए हैं. उच्चतम न्यायालय ने लेकिन घुटने टेकते हुए सबसे मशहूर मुकदमे ए. डी. एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला में आपातकाल का समर्थन किया सिवाय न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना के. बाद में न्यायाधीशों ने आत्मग्लानि के साथ स्वीकार भी किया कि न्यायपालिका आपातकाल में खौफजदा हो गई थी. संविधान अब दरकिनार भी हो रहा है. संसद को धीरे धीरे अप्रासंगिक बनाया जा रहा है. अलबत्ता ऐसी भयावह स्थिति में भी आशा की किरण उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में जनता को दिखाई दे रही थी.

लाखों टन अनाज सड़ रहा हो. सुप्रीम कोर्ट केवल हल्की चेतावनी दे कि उसे गरीबों में मुफ्त बांट देना चाहिए. कारखाने, नदियों, हवा, शहरों और जंगलों में प्रदूषण की मितली उगल रहे हों. कभी कभार किसी समाजचेता व्यक्ति के कहने पर कुछ समझाइशी अदालती निर्देश जारी हों. बाद में कह दिया जाए कि ऐसे व्यक्ति जनहित के बदले अपना प्रचार प्रसार चाहते हैं. अंबानी के पक्ष में फैसला हो. न्यायाधीश का बेटा अंबानी का वकील हो.

प्रदेश का मुख्यमंत्री न्यायाधीश के परिवार को करोड़ों की भूमि कौड़ियों के मोल दे दे. देश के मुख्य न्यायाधीश उस मामले को सुनें जिससे संबंधित पक्षकार कंपनी में उनके शेयर हों. देश के मुख्य न्यायाधीश के सरकारी आवास को उनके डेवलपर बेटे अपनी कंपनी का पंजीकृत मुख्यालय लिखें. न्यायाधीश मनोरंजन के नाम पर सार्वजनिक जगह पर बैठकर नशीली धींगामस्ती करें. हाई कोर्ट के न्यायाधीश अपने गृह राज्य में निजी आवास के लिए सरकारी मदों से खरीदी करें. लाखों रुपयों के सरकारी धन को निजी खाते में रखे. दलाल आलीशान होटलों में रुकें. न्यायाधीश से लगातार बातें करें. रिकार्ड उपलब्ध हो जाने पर समाचार प्रकाशित करने वाली मीडिया को अदालत की अवमानना करने के नोटिस जारी किए जाएं.

न्यायाधीशों के बच्चे और रिश्तेदार उन्हीं हाई कोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे हैं. फिर भी न्यायाधीश पक्षपात के कीचड़ में कमल की तरह समझे जाएं? वेतन, भत्ते और सुविधाएं बढ़ाने को अदालतों की स्वायत्तता मानकर आदेश पारित कर लें. आम जनता से जुड़े उन फौजदारी मामलों में उच्च न्यायालय तक जमानत नहीं देते जिनसे ज्यादा गंभीर मामलों में अंगरेज जज टेनिस खेलते खेलते जमानत दे देते थे. उन पार्टियों में भी न्यायाधीश जाते हैं, जहां संदिग्ध चरित्र के लोग आते हैं. कई न्यायाधीशों की भाषा और कानूनी समझ को लेकर यह प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता कि उनकी नियुक्ति ठीकठाक हुई है. कभी कभार न्यायाधीश सत्तापुरुषों को हड़का भर देते हैं. जनता की स्मृति क्षीण होती है. उसे पता नहीं होता कि बाद में क्या हुआ.

जो हुआ दुखद, अचानक और कई तरह के सवाल उठाता हुआ बवंडर है. उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. कहना मुश्किल है कि पांच उंगलियों से बनी हथेली में मुख्य न्यायाधीश को सबसे बड़ी उंगली या अंगूठे में से इतिहास किस जगह रखेगा.

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