स्वामी अग्निवेश का निधन

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के शक्ति में पले-बढ़े बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और जान-माने सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का शुक्रवार को निधन हो गया. 81 साल के अग्निवेश पिछले चार दिनों से दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थे.

उन्हें सोमवार को लिवर से जुड़ी बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था. जिसके बाद से ही उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई थी.


उनका इलाज कर रही डॉक्टरों की टीम ने बताया है कि ‘लिवर सिरोसिस से पीड़ित स्वामी अग्निवेश के कई प्रमुख अंगों ने काम करना बंद कर दिया था जिसकी वजह से उन्हें अंतिम वक़्त में वेंटिलेटर पर भी रखना पड़ा, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.’

स्वामी अग्निवेश सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते थे. बंधुआ मज़दूरों के लिए लंबी लड़ाई लड़नेवाले और नोबेल जैसा सम्मानित समझे जाने वाला ‘राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड’ पा चुके स्वामी अग्निवेश ने शिक्षक की भूमिका भी निभाई और वकालत भी की.

शिक्षक, वकील, मंत्री भी रहे

श्याम कुमार राव ने चार साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था. उनका पालन-पोषण उनके नाना द्वारा किया गया था, जो छत्तीसगढ़ में शक्ति रियासत के दीवान थे. सक्ती के राजा निलांभर सिंह के दीवान एम दासरथी राव के यहां रह कर ही उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की. ढ़ने-लिखने में बेहद तेज-तर्रार श्याम कुमार राव ने मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षा में पूरे राज्य में पहला स्थान प्राप्त किया था.

अग्निवेश ने लॉ एंड कॉमर्स में डिग्री प्राप्त की, कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट ज़ेवियर कॉलेज में प्रबंधन के लेक्चरर बने और कुछ समय के लिए सब्यसाची मुखर्जी के जूनियर के रूप में कानून की प्रैक्टिस की, जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने.

1968 में, वह आर्य समाज के एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए और दो साल बाद, संन्यास ग्रहण किया, सांसारिक संपत्ति और संबंधों को त्याग दिया और इस प्रक्रिया में उनका नाम स्वामी अग्निवेश रखा गया.

अपने संन्यास के दिनों में ही उन्होंने आर्य सभा के स्वामी इंद्रवेश के साथ एक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की, ताकि वे राजनीतिक व्यवस्था के लिए काम कर सकें. इस पार्टी की स्थापना आर्य समाज सिद्धांतों पर की गई थी, जैसा कि उन्होंने अपनी 1974 की पुस्तक वैदिक समाजवाद में लिखा है.

स्वामी अग्निवेश का राजनीतिक जीवन हरियाणा के उचित हिस्से के लिए संघर्ष के साथ शुरू हुआ क्योंकि यह पंजाब से अलग एक राज्य के रूप में उभर रहा था. स्वामी इंद्रवेश के साथ, उन्होंने हरियाणा में कुल प्रतिबंध के लिए संघर्ष किया और किसानों की उपज के लिए पर्याप्त कीमत की लड़ाई लड़ी.

जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा की तो अग्निवेश को भूमिगत हो जाना पड़ा. बाद में, वह अपने कुछ सहयोगियों के साथ उन्हें गिरफ्तार किया गया था और वे 14 महीनों तक जेल में रहे. 1977 के चुनावों में स्वामी अग्निवेश ने हरियाणा में विधानसभा चुनाव लड़ा और चुनाव जीतने के बाद भजनलाल के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री बने.

हालांकि सत्ता की यह राजनीति उन्हें बहुत नहीं जंची. असल में फरीदाबाद औद्योगिक बस्ती में पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें लगभग 10 मजदूर मारे गए. उन्होंने पहले मंत्रिमंडल में विरोध किया और बाद में सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के खिलाफ न्यायिक जाँच की माँग की. इसके बाद उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा गया. उन्होंने इस्तीफा दे दिया और अपनी सारी ऊर्जा और समय सामाजिक न्याय आंदोलनों में लगाने का फैसला किया.

हरियाणा में मंत्री पद छोड़ने के बाद स्वामी अग्निवेश की अथक सामाजिक सक्रियता उनका मुख्य कार्यक्षेत्र बन गई. उन्होंने शराब विरोधी आंदोलन चलाया. 1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने बंधुआ मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और आंकड़े बताते हैं कि उनके संगठन की पहल पर देश भर में पौने दो लाख बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति संभव हो पाई.

सांप्रदायिकता, सती प्रथा, जातिवाद जैसी कुरीतियों के ख़िलाफ़ वे आजीवन संघर्ष करते रहे.

भारत सरकार के कहने पर उन्होंने माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत के लिये मध्यस्थ होना स्वीकार किया लेकिन यह बातचीत संभव नहीं हो सकी. उन्होंने छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार के कहने पर माओवादियों द्वारा अपह्रत पुलिसकर्मियों को छुड़ाने का काम किया था.

वे अन्ना आंदोलन में भी सक्रिय रहे लेकिन मतभेदों के बाद उन्हें आंदोलन से विदा लेना पड़ा. हिंदु कट्टरपंथियों के निशाने पर रहने वाले स्वामी अग्निवेश पर कई बार हमले हुये. झारखंड में हुये एक हमले के कारण उन्हें यकृत संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा और अंततः यकृत की बीमारी ने ही उनकी जान ले ली.

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