निराशा के तीन साल

डॉ सुनीलम
केंद्र सरकार ने आज 3 वर्ष पूरे कर लिये हैं. लेकिन देश में कोई भी भारतीय जनता पार्टी या एनडीए की सरकार का मूल्यांकन नहीं कर रहा है. सभी मोदी सरकार का मूल्यांकन कर रहे हैं, क्योंकि केंद्र सरकार एक व्यक्ति में सिमट कर रह गयी है. सभी फैसले एक व्यक्ति की मंशा से लिये जाते हैं तथा प्रधानमंत्री कार्यालय उसे लागू कराता है. कांग्रेस के कार्यकाल में कई मंत्रियों को स्टेम्प मंत्री कहा जाता था अब पूरा का पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल ही नरेंद्र मोदी का स्टेंप बन कर रह गया है.

पार्टी पर भी उनके पुराने विश्वस्त अमित शाह का कब्जा हो गया है. गत 3 वर्षों के सभी चुनाव इसी जोड़ी के नेतृत्व में लड़े गये हैं. इसका अर्थ है कि भारत सरकार केंद्रित व्यवस्था के अंतर्गत कार्य कर रही है जबकि संविधान में 72वें, 73वें संशोधन के बाद ग्रामसभाओं तक को अपने फैसले करने के अधिकार दिये गये थे. अब विकेंद्रीकरण का सिद्धांत कागजों तक सीमित कर दिया गया है.


देश के मतदाताओं ने 31 प्रतिशत वोट देकर जब भारतीय जनता पार्टी और गठबंधन को 282 सीटें दी थीं तब मतदाताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत तथा अच्छे दिन लाने के लिए वोट दिया था. उन्हें लगता था कि महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किसान आत्महत्या, महिला हिंसा,कश्मीर ,पाकिस्तान आदि तमाम समस्याओं का हल हो जाएगा. कम से कम चुनाव घोषणापत्र में किये गये वायदे सरकार पूरा करेगी. लेकिन 3 वर्ष के कार्यकाल में देशवासियों को निराश किया है.सबसे ज्यादा निराश युवा,किसान और महिलाए हैं.

चुनाव घोषणा पत्र में किसानों से वायदा किया गया था कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाएगा. खेती की लागत से 50 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा तय किया जाएगा. साथ ही 5 वर्षों में किसानों की आय को दुगुना किया जाएगा. इन दोनों घोषणाओं पर अमल होता दिखलाई नहीं पड़ता. किसानों की आत्महत्या निरंतर जारी है. लागत से 50 प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य तय करने का वायदा जुमला साबित हो चुका है. 3 साल में किसानों की आय डेढ़ गुनी तो हो ही जानी थी लेकिन किसानों की वास्तविक आय निरंतर घटती जा रही है. प्रधानमंत्री फसल बीमा का सरकार ने बहुत शोर मचाया था लेकिन आंकड़ों से यह साफ हो चुका है कि फसल बीमा का लाभ किसानों को कम कंपनियों को ज्यादा मिल रहा है. किसान ठगा महसूस कर रहे हैं.

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित कराने के लिए केंद्र सरकार कुछ भी करने को तैयार नहीं है जबकि सर्वोच्च न्यायालय यहां तक कह चुका है कि समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाना चाहिए अर्थात अनुबंध (कांट्रेक्चुअल वर्कर) पर कार्य करने वाले श्रमिकों को स्थाई श्रमिकों के बराबर पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए. केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छंटनी कर अब तक श्रमिकों के लिए बने सभी कानूनों को लगभग समाप्त करने पर आमादा है. सभी श्रम कानूनों को 4 कानूनों में बदल कर कार्पोरेट को लूट की छूट दी जानी केंद्र सरकार की नयी श्रम नीति है.

केंद्र सरकार की सबसे बड़ी असफलता रोजगार सृजन के मोर्चे पर है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़े बतला रहे हैं कि नये रोजगार सृजन की हालत अत्यंत नाजुक है. बड़ी संख्या में बेरोजगारी बढ़ रही है. मोदी सरकार के विकास को रोजगार रहित विकास कहा जाने लगा है. मेक इन इंडिया रिटेल में सीधे विदेशी निवेश के बावजूद रोजगार का ग्राफ नीचे आता दिखलाई पड़ रहा है. हर तरफ छटनी चल रही है. सरकारी भर्तियां पहले से ही बंद हैं.

बढ़ती महंगाई और रोजगार की कमी के चलते गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. नोटबंदी के परिणामस्वरूप भी बाजार में मंदी आयी है तथा छोटे उद्योग बंद हो गये हैं. मोदी जी ने एक करोड़ रोजगार हर साल देने का वायदा किया था लेकिन पिछले एक वर्ष में केवल 2.13 लाख नयी नौकरियां पैदा हुईं. आई टी सेक्टर में अगले तीन वर्षों में 6 लाख नौकरियां कम पैदा होंगी, क्योंकि पिछले 3 वर्षों में निवेश 19 प्रतिशत कम हो गया है.

2013 में 8 प्रमुख सेक्टरों में 4.19 लाख नौकरियां आयी थीं लेकिन 2015 में यह घटकर 1.35 लाख रह गयीं. आईसीडी के सर्वे के अनुसार 15 से 29 साल के 30 प्रतिशत युवाओं के साथ रोजगार नहीं हैं न ही उन्हें रोजगार की ट्रेनिंग दी गयी है. 2016 में जारी इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक 3 वर्षों में ढाई करोड नौकरियों की जरूरत थी लेकिन एक तिहाई नौकरियां भी सृजित नहीं हुईं. लेबर ब्यूरो के अनुसार नये रोजगार पैदा होने में 84 प्रतिशत की कमी आयी है.

2015-2016 में 18.03 लाख लोगों को प्रधानमंत्री कौशल योजना के तहत ट्रेनिंग दी गयी जिनमें से केवल 12.4 प्रतिशत को नौकरी मिल सकी. ईज आफ डुइंग बिजनिस के लिए सरकार ने दस हजार करोड़ रुपये खर्च किये लेकिन नया व्यवसाय शुरू करने को लेकर विश्व बैंक के सूचकांक में भारत आज भी 130वें नंबर पर बना हुआ है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक 1.77 करोड़ लोग बेरोजगार थे.

यह संख्या अगले वर्ष बढ़कर 1.08 करोड़ हो जाएगी. सरकार की प्राथमिकता रोजगार सृजन नहीं निजीकरण है. हाल ही में नीति आयोग की बैठक में तीन वर्ष की जो कार्य योजना प्रस्तुत की गयी उससे इस तथ्य का खुलासा होता है कि सरकार आधार की मदद से हर सरकारी सेवा को निजी क्षेत्र में अथवा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में बदल देना चाहती है जिसका अर्थ है निजी कंपनियों को आम उपभोक्ताओं की खुली लूट में सरकार मददगार के रूप में कार्य रही है.

हाल ही में सरकार ने 60 रेलवे स्टेशनों के निजीकरण का फैसला किया है. पहले से ही रेलवे टिकट लगातार महंगे होते जा रहे हैं. केंद्र सरकार ने देश की बड़ी कार्पोरेट कंपनियों को दस लाख करोड़ की छूट दी है. उन्हें जो कर्जा दिया गया उसे नान परफार्मिंग असेट बता कर माफ कर दिया गया है. उधर आम आदमी पर लगातार कर्जा बढ़ता जा रहा है. 2014 में कर्जा 2.34 लाख करोड़ था जो 2016 में बढ़कर 6.46 लाख करोड़ हो गया. अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह कर्जा 20 लाख करोड़ तक पहुंचने की संभावना है.

मोदी जी के भाषणों में डालर की कीमत की खूब चर्चा होती थी. मई 2016 में 1 डालर में 58.78 रुपये खरीदे जा सकते थे, अब यह 68.87 रुपये तक जा पहुंचा है. यानी रुपये की गिरती कीमत को सरकार नहीं संभाल पायी है. रक्षा क्षेत्र में एफडीआई लाकर सरकार ने देश की संप्रभुता को खतरे में डाल दिया है.

सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना 2015 में धुूमधडाके से शुरू की थी लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा जारी किये गये आंकडों से मालूम होता है कि इस योजना को आवंटित राशि में से 90 प्रतिशत राशि का उपयोग नहीं किया गया है. महिला हिंसा चरम पर है. भाजपा ने महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में 9 मार्च 2010 को पारित कराया था. लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर वह लेप्स हो गया. परंतु सरकार ने बहुमत होने के बावजूद लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पारित नहीं किया है.

कांग्रेस मुक्त भारत अर्थात भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए लोगों ने वोट दिया था परंतु आज तक केंद्र सरकार ने लोकपाल नियुक्त नहीं किया है. ऐसा लगता है कि जिस तरह गुजरात में उन्होंने 10 साल के कार्यकाल में लोकपाल नियुक्त नहीं किया था उसी तरह तमाम दबाव के बावजूद वे लोकपाल की नियुक्ति नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ललित मोदी की तरह विजय माल्या को भी सुनियोजित तौर पर देश से भगाया गया.

यह सर्वविदित है कि दोनों भ्रष्टाचारी पूंजीपति भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के करीबी थे तथा उन्होंने संरक्षण देकर देश से भागने में मदद की. चुनाव के समय काला धन वापस लाने की घोषणा की गयी थी. जब लोगों के जन धन खाते खोले गये तब ऐसा लगा था कि 15 लाख रुपये भिजवाने के लिए खाते खुलवाये जा रहे हैं लेकिन काला धन की वापसी का मुद्दा भी जुमला साबित हो चुका है. सरकार ने नोट बंदी करते समय काले धन के खात्मे की बात कही थी लेकिन 14 लाख करोड़ से अधिक पांच सौ और एक हजार के नोट जमा हो गये, यानी काला धन सफेद हो गया. परंतु सरकार आज भी काला धन से जुडे आंकड़े सार्वजनिक करने में कतरा रही है. खुद प्रधानमंत्री पर सहारा, बिरला डायरी में दर्ज 65 करोड़ की राशि लेने के आरोप लग रहे हैं. हथियारों की खरीद में भी लगातार भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही हैं.

सीबीआई को कांग्रेस का तोता कहा जाता था. कई लोग उसे कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन तक कहते थे. सीबीआई स्वतंत्र रूप से कार्य करे तथा उसमें सरकार का दखल न हो यह बात बार बार भाजपा द्वारा कही जाती थी. लेकिन विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित करने के लिए सीबीआई सहित विभिन्न एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगवाया जिसे उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया. गोवा, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा ने तिकड़म कर सरकार बनवायी. आरएसएस के कार्यकर्ताओं को राज्यपाल बना दिया गया. उच्चतम न्यायालय के साथ कोलिजियम को लेकर आज भी विवाद जारी है. बार बार यह तथ्य सामने आ रहे हैं कि केंद्र सरकार न्यायपालिका में दखल कर रही है तथा अपनी मर्जी के न्यायाधीशों की नियुक्ति पर अड़ी हुई है.

यह सर्वविदित है कि मोदी सरकार आने के बाद सांप्रदायिक कट्टरता बढ़ी है. अफवाहों के आधार पर तथा मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक निर्दोष नागरिकों का कत्ले आम किया जा रहा है. अखलाक हो या पहलू खान कथाकथित गऊ रक्षक मजहब के आधार पर दिन-दहाड़े हत्यायें कर रहे हैं. उ. प्र. के सहारनपुर में गत एक सप्ताह में 3 बार जातीय हिंसा की घटनाएं सामने आयी हैं. कुछ वर्ष पहले तक जातीय हिंसा की घटनाएं बिहार में सुनने को मिलती थी लेकिन अब योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांप्रदायिक हिंसा के साथ-साथ जातीय हिंसा में बड़ा इजाफा हुआ है. रोहित वेमुला प्रकरण तथा ऊना कांड के चलते पहले ही दलित समूह आक्रोशित हैं.

सरकार राष्ट्रवाद और राष्ट्र भक्ति को लगातार मीडिया के माध्यम से हाईप देती रही है. लेकिन यह सर्वविदित है कि गत 3 सालों में भारत की सीमा पर जितने सैनिक शहीद हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुये. युद्धोन्माद की कीमत देश के सैनिकों को चुकानी पड़ रही है. जो पैसा साफ पीने के पानी का इंतजाम करने से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर् खर्च होना था वह हथियार करने में खर्च किया जा रहा है.

भारतीय जनता पार्टी का हर प्रयास देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का है जिसके परिणामस्वरूप 22 करोड़ मुसलमान असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. लगातार अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं है. उ. प्र. चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट न देकर भाजपा ने साबित किया है कि वह किसी भी मुसलमान पर विश्वास करने को तैयार नहीं है. कश्मीर में लगातार टकराव और हिंसा बढ़ाकर तथा पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद की पस्थिति बना कर केंद्र सरकार ने पूरे देश को अशांत और तनावयुक्त कर दिया है.

सरकार विपक्ष और आंदोलनकारी समूहों के साथ किसी भी स्तर पर संवाद करने को तैयार नहीं है. सरकार सभी फैसले इकतरफा लेकर बिना लोगों के और पार्टियों तथा नागरिक समाज को विश्वास में लेकर अपने तुगलकी फैसले देश पर थोपना चाहती है जबकि वास्तविकता यह है कि किसी भी चुनाव में उसे 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का साथ नहीं मिला है. चुनावी गणित में भले ही भाजपा की 17 राज्यों में सरकार क्यों न बन गयी हो, लेकिन किसी भी राज्य सरकार को 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त नहीं है.

सरकार हर स्तर पर टकराव की दिशा में बढ़ रही है जिसके गंभीर परिणाम आने वाले समय में दिखलाई देना तय है. दिल्ली और बिहार के चुनाव नतीजों ने मोदी सरकार पर दबाव बनाने का काम किया था लेकिन ईवीएम की तिकडम से हाल ही के चुनाव जीतने के बाद मोदी जी को किसी से भी संवाद की आवश्यकता दिखलाई नहीं पड़ती. वे 50 देशों में जाकर विदेशियों के साथ संवाद और समझौते करने में दिलचस्पी रखते हैं लेकिन देश के भीतर विपक्षी पार्टियों और राज्य सरकारों से उन्हें संवाद की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती. वे अपने मन की बात देश के 130 करोड़ नागरिकों तक पहुंचाना चाहते हैं लेकिन जनता, जन संगठन, नागरिक समाज और विपक्षी पार्टियों की मन की बात जानने में उनकी कोई रुचि नहीं है. यही संवादहीनता आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैदा करेगी.

* लेखक पूर्व विधायक और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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