ट्रंप का ‘स्वदेशी आंदोलन’

जेके कर
डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीकी माल खरीदने, अमरीकियों को नौकरी देने कहा है. मंगलवार को अमरीकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुये अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह आव्हान् किया है. इतना ही नहीं उन्होंने अपने इमीग्रेशन नीति पर कहा कि इससे अमरीकियों को नौकरी मिलेगी जिससे बेरोगजारी घटेगी तथा लोगों को बेहतर वेतन मिलेगा. डोनाल्ड ट्रंप अपने चुनावी वादे के अनुसार अमरीका को प्रथम स्थान पर ले जाना चाहते हैं. जिसके लिये अमरीकी नागरिक उनकी प्राथमिकता पर है. इसे डोनाल्ड ट्रंप का स्वदेशी आंदोलन कहा जा सकता है. उन्होंने पहले ही कहा है ऐसा न करने वाले कंपनियों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जायेगा. लेकिन हजार टके का सवाल है कि क्या अमरीकी उद्योगपतियों को उनका यह प्रस्ताव मंजूर होगा. जिनके बल पर अमरीका का हर राष्ट्रपति व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में घुसता है.

बता दें कि अमरीकी महाकाय कंपनी वॉलमार्ट के कारण जनरल इलेक्ट्रकल्स तथा लेवी स्ट्रास को अपना उत्पादन अमरीका में बंद करके अपना रुख दूसरे देशों की तरफ करना पड़ा था. इस कारण कई हज़ार अमरीकी कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी क्योंकि वॉलमार्ट को सस्ते में माल चाहिये था. इसलिये जनरल इलेक्ट्रानिक्स तथा लेवी स्ट्रास को ऐसे देशों में जाना पड़ा, जहां सस्ते में श्रम उपलब्ध है.


यह केवल वॉलमार्ट की फितरत नहीं है सभी व्यापारी चाहते हैं कि उन्हें सस्ता श्रम मिले. अर्थात् कम वेतन पर काम करने के लिये कर्मचारी मिल जाये तथा उत्पादन वहां से कराया जाये जहां कामगार को कम वेतन देना पड़ता है. इससे मुनाफा बढ़ता है. वैसे कौन सा व्यापारी ऐसी मूर्खता करना चाहेगा कि कामगार को ज्यादा वेतन दिया जाये तथा अपने मुनाफे में कटौती किया जाये.

आज निवेश का जमाना है. सभी देश अपने-अपने सेन्ट्रल बैंक पर ब्याज की दर को कम करने के लिये दबाव डालते हैं जिससे निवेश आ सके. महाकाय कंपनियां वहीं निवेश करती हैं जहां ब्याज की दर कम हो तथा सस्ता श्रम उपलब्ध हो. यही कारण है कि विदेशी कंपनियां भारत, चीन जैसे देशों के कामगारों से बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग के तहत काम लेती रहती हैं. इस कारण से ही काल सेंटर अस्तित्व में आये हैं.

यदि अमरीकी कंपनियां, अमरीका में ही उत्पादन करवाने लगे तो उनके यहां बने माल इतने महंगे हो जायेंगे कि उसे कोई खरीददार नहीं मिलेगा. क्या डोनाल्ड ट्रंप अमरीकियों को महंगा माल खरीदने के लिये मजबूर कर सकते हैं. इसके लिये उन्हें चीन से होने वाले आयात को रोकना पड़ेगा. जो विश्व व्यापार संगठन के नियमों के खिलाफ है. गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन खुद अमरीकी महाकाय कंपनियों जैसे फाइजर, मोनसांटों तथा वहां के सेवा क्षेत्र की कंपनियों के कारण अस्तित्व में आया है. साल 1995 में इस संगठन के बनने के पहले तक दो देशों के बीच किसी भी मुद्दे पर समझौता होता रहता था.

दो देश, किसी भी विषय पर आपस में समझौता कर सकते थे. लेकिन अमरीकी कंपनियों ने विदेशी बाजार पर कब्जा जमाने के लिये इस संगठन का गठन कराया था. इस संगठन के अस्तित्व में आने के बाद इसके सदस्य देशों को पेटेंट, सेवा, कृषि के क्षेत्र में भी मजबूरन समझौता करना पड़ा था. ज्यादातर देश इस बहुपक्षीय मंच के खिलाफ थे लेकिन सोवियत संघ के ध्वस्त होने जाने के बाद बढ़ी अमरीकी दादागिरी तथा वर्ल्ड बैंक एवं आईएमएफ के कर्ज के बोझ के तले देशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिये. इसका पूरा लाभ अमरीका सहित विकसित देशों ने उठाया.

विकासशील देशों को अपने पेटेंट कानूनों में बदलाव करने के लिये मजबूर किया गया. जिससे विकसित देशों को दवा, खाद, बीज तथा कीटनाशकों का बाजार मिल गया. दुनियाभर के समाजवादियों ने इसका विरोध किया परन्तु चीन ने इसे अपना लिया. इसका कारण यह था कि चीन को मालूम था कि इससे उसके उत्पाद दुनियाभर में छा जायेंगे. और, आज वही हो रहा है. चीन में बने माल अमरीकी बाजारों में छा गये हैं. चीन के सस्ते मालों के सामने अमरीका में बने महंगे माल बाजार में नहीं टिक पाये. यहां तक की संचार क्रांति के अगुवा कंम्प्यूटर तथा मोबाइल फोन बनवाने वाली कंपनियों ने भी चीन तथा ताइवान का रुख कर लिया.

दूसरी तरफ, दुनियाभर की अर्थव्यवस्था संकट में है. संपदा कुछ मुठ्ठीभर लोगों के हाथों में में सिमट कर रह गई है. इस कारण से दुनिया की अधिसंख्य जनसंख्या की खरीदने की ताकत मंद पड़ती जा रही है. बाजार की मंदी से बचने के लिये धनकुबेर प्राकृतिक संसाधन जंगल, जमीन, पानी, नदी, जमीन के नीचे सुरक्षित खनिज पर कब्जा करने में मशगूल हैं. जिस व्यवस्था को मानव समाज के प्रगति के इतिहास की सर्वोत्तम अवस्था होने का दावा किया जा रहा था उसके टूट पड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है. दुनिया के स्वंयभू दरोगा अणरीका खुद संकट का सामना कर रहा है.

इन सब के बीच में डोनाल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं. राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप ने ट्रांस-पैसीफिक पार्टनरशिप ट्रेड डील को खत्म कर दिया है. उनका मानना है कि यह अमरीका के लिये हानिकारक है. अमरीका को संकट से निकालने के लिये डोनाल्ड ट्रंप को अभी कई जुगते भिड़ानी है. इस बीच अमरीकी धनकुबेरों, जो मनमाफिक न होने पर विदेशी सरकारों तक को गिरा देती थी को भी मुनाफा कमाने का पूरा मौका देना है. डोनाल्ड ट्रंप की तमाम कलाबाजियां इसी उदेश्य को पूरा करने के लिये हैं.

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