ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग का स्याह पक्ष

विश्व बैंक समूह द्वारा जारी की जाने वाली ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स लोकप्रिय तो है लेकिन यह खोखली भी है. यह एक बार फिर सवालों के घेरे में है. विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पाॅल रोमर ने इस पर सवाल उठाए हैं. पिछले कुछ सालों में रैंकिंग पद्धति में बदलाव की वजह से चिली की रैकिंग में आई गिरावट से वे हैरान हुए. 2006 से चिली की रैकिंग 25 से 57 के बीच रहती थी. सोशलिस्ट पार्टी के मिशेल बैशलेट के कार्यकाल में रैंकिंग खराब हुई और कंजर्वेटिव सेबेस्टियन पेनेरा के कार्यकाल में रैंकिंग सुधरी. रोमर का कहना है कि अगर मानकों को बदला जाएगा तो फिर वर्षवार तुलना मुश्किल हो जाएगी. उन्होंने कहा है कि एक स्थायी पद्धति के जरिए पिछले चार साल की रैंकिंग विश्व बैंक फिर से तैयार करेगी. रोमर के सवालों से अलग भी कई शोधों में रैंकिंग को लेकर कई सवाल खड़े किए गए हैं.

2003 में इस रैंकिंग की शुरुआत हुई थी. इसके तहत कारोबार शुरू करने के लिए जरूरी कानूनी प्रावधानों और इसकी जटिलताओं और सहूलियत का जायजा लिया जाता है. इसके तहत देश के सबसे बड़े कारोबारी शहर में मध्यम आकार के निजी कंपनी के कारोबार पर लगने वाले नियम-कानूनों की समीक्षा की जाती है. 2006 से विश्व बैंक ने इस रैकिंग के लिए मानकों को जोड़ने का काम शुरू किया. विश्व बैंक ने इसका इस्तेमाल कर्ज देने के लिए भी करना शुरू किया. लेकिन भारी विरोध के बीच 2009 में इसे छोड़ना पड़ा. 2013 में विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने इस रैंकिंग के अध्ययन के लिए जो समिति गठित की थी उसने सिफारिश की थी कि इस रैंकिंग को बंद कर दिया जाए. इसमें भी आंकड़ों को एक साथ तुलनात्मक ढंग से रखने की पद्धति की आलोचना की गई थी. इसके बावजूद रैंकिंग जारी है.


अर्थशास्त्र और सांख्यिकी में इस तरह के सूचकांक बनाना मुश्किल काम है. कई बार इसमें तथ्यपरकता की उपेक्षा हो जाती है. इसमें पूर्वाग्रह की भूमिका भी रहती है. ऐसे सूचकांकों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें मुश्किल चीजों को भी तुलनात्मक ढंग से सरलता से दिखा दिया जाता है. हालांकि, हर कोई इस तरह की रैंकिंग को गंभीरता से नहीं लेता लेकिन इनकी जितनी चर्चा होती है उसमें इनकी उपेक्षा भी आसान नहीं होती. इसकी पद्धति से जुड़े सवालों पर चर्चा शायद ही कभी होती है लेकिन इसमें हुए उतार-चढ़ाव की चर्चा काफी ज्यादा होती है.

इसमें सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि रैंकिंग में सुधार के लिए सरकारें अपनी नीतियां बदल रही हैं. भारत सरकार ने अपने वित्तीय लक्ष्यों में एक लक्ष्य यह भी रखा है कि 2017-18 में वह ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स में 90वें स्थान पर और 2020 तक 30वें स्थान पर आना चाहती है. पिछले साल भारत 130वें स्थान पर था और इस साल 100वें स्थान पर है. कर्ज लेने के मामले में भारत का स्थान 29वां है. जबकि सच्चाई यह है कि इस रैंकिंग को तैयार करने के लिए कर्ज और बैंकरप्शी से संबंधित कानूनों का विश्लेषण किया गया है न कि कर्ज लेने में होने वाली सुविधा का. समीक्षा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस रैंकिंग मंे लोगों को भ्रमित करने वाली शब्दावली का इस्तेमाल होता है. रैंकिंग में सुधार के चक्कर में सरकार द्वारा नीतियों में बदलाव से कई बार आम लोगों के हकों और हितों की अनदेखी हो जाती है. इन रैंकिंग से एक गलत सोच यह भी मजबूत हुई है कि इसमें सुधार से विदेशी निवेश बढ़ जाता है.

इस तरह की रैंकिंग में अलग-अलग देशों की विविध परिस्थितियों की अनदेखी हो जाती है. जो देश अपनी जरूरतों की अनदेखी करके रैंकिंग के हिसाब से अपनी नीतियों में बदलाव करते हैं, उनकी रैंकिंग ठीक हो जाती है. यह तो उसी तरह की बात हुई कि फुटबाॅल विश्व कप में अंक सिर्फ समान नियमों के लिए नहीं बल्कि खास तरह की रणनीति के लिए भी मिलने लगे. हालिया विवाद के बाद विश्व बैंक को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स को बंद करके कोई दूसरी व्यवस्था विकसित करने का काम शुरू करना चाहिए.
1966 से प्रकाशित इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल विकली के नये अंक का संपादकीय

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