एक अतिवाद से दूसरे अतिवाद के प्रचारक

नंद कश्यप | फेसबुक
जब आप व्यापक सामाजिक मुद्दों पर खड़े होते हैं तो उसके लिए आपको सेक्युलर होने की जरूरत पड़ती है. तभी आप मनुष्य सहित तमाम प्राणी जगत और प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय और ज्यादती का सही विश्लेषण कर समाज के शांतिपूर्ण विकास और बेहतरी के लिए काम कर सकते हैं.

बेशक इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक संदर्भों के अध्ययन की आवश्यकता है. उसके बिना आप इस या उस में उलझ जाएंगे. अभी लगभग वैसा ही हो रहा है.


मोदी सरकार जबसे आई है, उसने हमेशा अपना एजेंडा थोपा है और उसकी प्रतिक्रिया में पूरा राजनीतिक विपक्ष ही नहीं वरन् विभिन्न संगठनों आंदोलनों के लोग भी सिर्फ प्रतिक्रियाओं तक सीमित हो गए हैं.

सीएए, एनपीआर जैसे मुद्दों को अन्य जरूरी मुद्दों के साथ जोड़कर आम जन तक पहुंचाने की जगह, जिस तरह से केंद्रीकृत आरोप-प्रत्यारोप में लोग मगन हैं, उससे सामाजिक कटुता बढ़ते जा रही है. वास्तव में इस तरह के प्रतिक्रिया वाले आंदोलन समाज के कुलीन हिस्सों के अहंकार को तुष्ट करता है. आम मेहनतकश इनसे दूर होते जाता है.

जब कुछ लोग यहां की खराब हालात के नाम पर इस देश को रहने लायक नहीं मानते तो उनके पास कहीं और बस जाने की सुविधा होती है, लेकिन सेलिब्रिटीज के इस तरह के बयान वायरल हो जाते हैं. सोशल मीडिया में इस वक्त लगभग यही चल रहा है. लोग इसके या उसके बयान विडियो फारवर्ड करके गौरवान्वित हो रहे हैं.

भक्त परंपरा अपने उच्चतम स्तर पर है. आप स्वयं क्या सोच रहे हैं, इन परिस्थितियों में,आप खुद इनसे निकलने क्या कर रहे हैं इनसे आप मुक्त हैं. आरएसएस या कारपोरेट फासीवाद यही तो चाहता है कि आप लगातार प्रतिक्रियाओं में लिप्त रहें और अपने विवेक का उपयोग बंद कर दें.

आप एक अतिवाद से दूसरे अतिवाद के प्रचारक बन जाएं. उन्होंने एक डाक्टर्ड विडियो फारवर्ड किया तो हम भी वैसा ही करेंगे. दिल्ली दंगों पर वही हो रहा है. मरे इंसान हैं, संपत्ति देश और समाज की नष्ट हुई है, उदास और बेबस तमाम नागरिक हैं, यह संदेश बहुत कम दिया जा रहा है.

एक ऐसे समय में जब जनता का बड़ा हिस्सा सड़कों पर है, तब बेहतर दुनिया बनाने के आंदोलन को तेज करने की जरूरत है न कि फासिस्ट एजेंडा की प्रतिक्रिया में पूरा समय व्यर्थ गंवाने का. अब समय है इस ओर ध्यान देने सोचने की.

भाजपा आरएसएस तो चाहेंगे कि पुलिस संरक्षण में शाहीन बाग अनंत काल तक चलता रहे ताकि वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहे. बिहार चुनाव तक तो उसको इसे जारी रखना है क्योंकि एक रणनीति के तहत भाजपा नीत नितीश गठबंधन सरकार ने एनपीआर एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया है.

अब शाहीन बाग उनके पक्ष में प्रचार का माध्यम होगा कि बिहार में सब ठीक ठीक है और विपक्षी दल इसे जबरदस्ती मुद्दा बना रहे हैं. आर्थिक संकट और भयावह बेरोजगारी झेल रहे कुंठित और क्रुद्ध युवा वर्ग को चंद रुपए खर्च कर कोई भी हिंसा में उतार सकता है. इसलिए सचमुच सेक्युलर हैं तो व्यापक सामाजिक मुद्दों को लेकर बड़े आंदोलन की तैयारी करना चाहिए.

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