विश्व जल दिवस और हमारा कर्तव्य

अनिस उर रहमान खान
प्रत्येक वर्ष जल दिवस द्वारा मीठे और साफ पानी की महत्वपूर्णता सामने आती है.
इसलिए आवश्यक है कि हम इस दिन का न केवल सम्मान करें बल्कि पानी के अधिक से अधिक सरंक्षण का प्रण भी लें. परंतु प्रश्न यह उठता है कि इस दिन की शुरुआत कब औऱ कैसे हुई.

मालुम हो कि मीठे और स्वच्छ जल संरक्षण की चिंता दुनिया के प्रमुख देशों को हुई तो लोगों को उसकी अहमियत समझाने के लिए विश्व जल दिवस मनाने का फैसला किया गया. परिणामस्वरुप संयुक्त राष्ट्र में वर्ष 1992 को एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें ये अपील की गई कि साल का एक दिन जल दिवस के रूप में मनाया जाए. अंततः संयुक्त राष्ट्र ने पानी के महत्व को स्वीकार करते हुए अपनी महासभा में पहला जल दिवस 22 मार्च 1993 को मनाया और तब से हर साल 22 मार्च को हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा इस दिन जल के संरक्षण का संदेश देश दुनिया को देते आ रहे हैं.


प्रत्येक वर्ष इस दिन के आयोजन के लिए अलग अलग विषय भी चयन किया जाता है. उदाहरणस्वरुप जहां साल 2015 का विषय “पानी और सतत विकास” था, वहीं वर्ष 2016 का विषय “पानी और आर्थिक स्थिति ” को रखा गया था जबकि इस साल का विषय है “गंदा पानी” अर्थात गंदे पानी का मानव जीवन पर कुप्रभाव और आगामी वर्ष का विषय “प्रकृति के आधार पर पानी का समाधान” रखा गया है.

सबसे पहला है कश्मीर के सीमावर्ती जिले कुपवाड़ा में वीडियो वालंटियर कार्यक्रम “इंडिया इन हुड” के लिए काम करने वाले चरखा के लेखक पीर अजहर का अनुभव जो बताते हैं “पानी के विषय पर आपके द्वारा लिखे गए लेख की प्रकाशित कॉपी लेकर मैं कुपवाड़ा के मुख्य शिक्षा अधिकारी फारूक अहमद डार से मिला और उन्हें मिडिल स्कूल गुज़रियाल में पानी और शौचालय की चिंताओं से अवगत कराया तो उन्होंने सभी मुद्दों को हल करने के आश्वासन देने के साथ ही अपने विभाग से दो लाख बीस हजार रुपये भी दिए ताकि पानी प्रबंधन और शौचालय का निर्माण जल्द से जल्द किया जा सके”.

जम्मू के सीमावर्ती जिला पुंछ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और चरखा के ग्रामीण लेखक सैयद बशारत हुसैन शाह ने बताया “मेंढर में रहने वाली विकलांग महिला ज़ुलेखा बी के घर में पीने के पानी की परेशानी थी, तब तीनों भाषाओं में आपके प्रकाशित लेख की कॉपी लेकर स्थानीय अधिकारियों के कार्यालय गया और कुछ राजनीतिक नेताओं से भी मुलाकात की. परिणामस्वरुप क्षेत्र के विधान ने शौचालय निर्माण के लिए बीस हजार 20,000 रुपये दिए जबकि पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभाग से उनके मोहल्ले और घर में भी पानी की पाइप लाईन का कनेक्शन हो चुका है”.

पुंछ ब्लॉक सुरनकोट के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती गांव हिल काका के स्थानीय शिक्षक सिद्दीकी अहमद सिद्दीकी ने कहते है “पुंछ का सीमावर्ती क्षेत्र हिल काका है जहां स्कूल में शिक्षक था, यहां पीने के पानी की बहुत परेशानी थी. स्थिति इतनी बुरी थी कि गड्ढे में जमा होने वाले बरसाती पानी से इंसान और जानवर दोनो अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते थे. परंतु इस मुद्दे को आपके लेख द्वारा प्रकाश मे लाने के बाद सीमा की रखवाली पर तैनात भारतीय सेना ने हिल काका नामक इस गांव में औपचारिक वाटर टैंक बनाकर जनता के घरों तक पानी पहुंचाने का काम किया है”.

ब्लॉक मेंढर की रहने वाली छात्रा सोबिया खानम कहती हैं कि “नक्का मनझीयारी के कश्मीरी मुहल्ला में पानी की बहुत परेशानी थी. पानी न आने का कारण कर्मचारियों की लापरवाही थी. अपने स्तर पर मैंने इस समस्या को जब उजागर किया तो मेंढर के स्थानीय अधिकारियों और इंजीनियरों ने इसे हल्के में लिया, लेकिन मैंने अपनी आवाज को दबाने के बजाय इस मुद्दे को जिला मुख्यालय पुंछ के अधिकारियों तक पहुंचाई. आखिर मेहनत सफल हुई और लोगो को पानी मिल ही गया”.

सीमावर्ती ब्लाक बालाकोट की नाज़िया बताती हैं “हम आभारी हैं उन सैनिकों के जो हमारे बच्चों को न केवल शिक्षा दिला रहे हैं बल्कि सेना की ओर से दिन में एक दो बार पीने का साफ पानी भी मुहैया करा रहे हैं, उनकी गाड़ी आती हैं और गांव वालों के पानी का बर्तन भर जाता है”.

इसमें कोई शक नहीं कि हर नागरिक को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, यही कारण है कि सरकारों ने अपने आप को कई क्षेत्रों में कई विभागों में विभाजित कर रखा है ताकि आम जनता को बेहतर सुविधाएं मिलें. लेकिन एक नागरिक या लोकतांत्रिक देश का निवासी होने के नाते हमारा भी कर्तव्य है कि सरकार के कल्याणकारी कार्यों में हम उसकी मदद करें, तो कहीं पानी बर्बाद हो रहा है या दिन के समय में भी बिजली का बल्ब जल रहा है तो ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपने स्तर पर इन अनमोल धरोहरों को अधिक से अधिक बचाने का हर संभव प्रयास करें. हां ये सच है कि हमें अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए विरोध का पूरा पूरा अधिकार है, लेकिन अब हम आधुनिकता के दौर में जी रहे हैं जहां सड़क जाम के अलावा भी कई विकल्प उपस्थित हैं. बस आवश्यकता है उन विकल्पों को ढ़ुंढ निकालने का.

(लेख एन-एफ-आई द्वारा दी गई मीडिया फैलोशिप के अंतर्गत लिखा गया है.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!