उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन

नई दिल्ली | संवाददाता: हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा का निधन हो गया. 62 साल के शर्मा कैंसर से ग्रस्त थे.

हिंदी के लुगदी उपन्यासों का शहंशाह कहे जाने वाले वेदप्रकाश शर्मा के कई उपन्यासों ने देश में इतिहास गढ़ा.


प्रकाशकों की मानें तो वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ के पहले संस्करण की 15 लाख प्रतियां छापी गई थी और अब तक इस उपन्यास की आठ करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं. मेरठ के रहने वाले शर्मा के दूसरे उपन्यासों का भी रिकार्ड कमज़ोर नहीं है. पिछले 30 सालों में प्रकाशित उनके अधिकांश उपन्यासों की बिक्री का औसत निकालें तो हरेक उपन्यास की 3 लाख से अधिक प्रतियां बिकी हैं. पौने दो सौ से अधिक उपन्यास लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा की लुगदी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित लेखक थे.

वेदप्रकाश शर्मा के अमुसार उपन्यास पढ़ने का शौक तो उन्हें था लेकिन पढ़ना चुपके-चुपके ही होता था. पसंदीदा उपन्यासकार थे वेद प्रकाश कंबोज. 14 साल की उम्र में पहली कहानी लिखी-पेनों की जेल. यह कहानी स्कूल की पत्रिका में छपी. 1971 में हाईस्कूल की परीक्षा के बाद पिता ने वेद प्रकाश शर्मा को गांव भेज दिया. गांव में खाली समय था, सो वेद प्रकाश शर्मा ने अपनी कापियों में उपन्यास लिखना शुरु कर दिया.

वापस मेरठ लौटे तो एक प्रेस में कंपोजिटर का काम करने वाले उनके पिता पंडित मिश्रीलाल शर्मा कापियों को देख कर आग बबूला हो गये-“ अब तक उपन्यास पढ़ता था, अब लिखने भी लगा.” वेद प्रकाश शर्मा की जम कर ठुकाई हुई. फिर अगले दिन पिता को न जाने क्या लगा, उन्होंने वेद की कापियों को पढ़ा और वेद को अपने साथ एक प्रकाशक के यहां ले गये. प्रकाशक थे लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के मालिक जंग बहादुर. उन्होंने उपन्यास पढ़ा और फिर वेद प्रकाश शर्मा को 100 रुपये दिये.

आदेश यह भी कि वो और उपन्यास लिखें और हर उपन्यास पर उन्हें 100 रुपये दिये जायेंगे. लेकिन जब उपन्यास सीक्रेट फाइल नाम से छप कर आया तो उस उपन्यास पर वेद प्रकाश शर्मा का नहीं, तब के मशहूर लुगदी उपन्यासकार वेद प्रकाश कंबोज का नाम था. लेकिन 100 रुपये के चक्कर में वेद प्रकाश शर्मा उपन्यास लिखते गये और सारे उपन्यास फर्जी नाम से छपते रहे. कुल 23 उपन्यास इस तरह छपे. साल भर बाद जा कर 1973 में वेद प्रकाश शर्मा के नाम से पहला उपन्यास लक्ष्मी पॉकेट बुक से ही आया- दहकते शहर. इसके बाद वेद प्रकाश शर्मा ने मुड़कर नहीं देखा. उनका पहला बड़ा उपन्यास था-कैदी नं. 100. इस उपन्यास का पहला संस्करण ढाई लाख प्रतियों का था.

वर्दी वाला गुंडा उनके अपने प्रकाशन संस्थान तुलसी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ, जिसकी स्थापना उन्होंने 1986 में की. वेद प्रकाश शर्मा ने एक पात्र गढ़ा केशव पंडित और आज की तारीख में यह लुगदी साहित्य का सबसे बड़ा नायक माना जाता है और केशव पंडित के नाम से लाखों उपन्यास बिक जाते हैं.

हिंदी में जिसे साहित्य कहा जाता है, उसके बड़े से बड़े साहित्यकार की किताबों के पहले संस्करण की प्रतियों की संख्या बड़ी मुश्किल से हज़ार के आंकड़े को छू पाती हैं. आजादी के बाद हिंदी साहित्य में सबसे अधिक चर्चित माने जाने वाले धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ के सौ से अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन इतने सारे संस्करण के बाद भी यह आंकड़ा वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों की बिक्री के आंकड़े से बहुत-बहुत पीछे है.

हिंदी के सुविख्यात लेखक कृष्ण कुमार का मानना है कि अगर हिंदी में किसी लेखक की 11 सौ प्रतियां बिक जायें तो उसे प्रकाशक बड़ा लेखक मान लेता है. इसके उलट दूसरा आंकड़ा ये है कि सुरेंद्र मोहन पाठक के किसी भी उपन्यास के पहले संस्करण की न्यूनतम 50 हज़ार प्रतियां प्रकाशित होती हैं और वेद प्रकाश शर्मा के हर उपन्यास की शुरुआत डेढ़ लाख प्रतियों से होती थी.

वेद प्रकाश शर्मा कहते थे-मैं उन बड़े साहित्यकारों जैसा नहीं बनना चाहता, जिनकी किताब की हजार प्रतियां छपती हैं और लाइब्रेरी में बंद रह जाती हैं. मैं अपने लाखों पाठकों के बीच रहना और रचना चाहता हूं.

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