WTO का इरादा

देविंदर शर्मा
आम चुनाव के इस दौर में जब खेती-किसानी के सवाल भी सामने आ रहे हैं तब इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि विश्व व्यापार संगठन यानी WTO यह चाह रहा है कि गेहूं, चावल, दलहन, कपास और गन्ने के खरीद मूल्यों में कटौती की जाए.

अगर ऐसा हुआ तो किसानों की आफत और बढ़ सकती हैं.


न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी और गन्ने जैसी फसलों के मामले में उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी को घटाने को लेकर WTO तब दबाव डाल रहा है कि जब नीति आयोग ने यह स्वीकार किया है कि बीते दो वर्षों में किसानों की वास्तविक आय में लगभग शून्य बढ़ोतरी हुई है.

चीनी पर भारत की बढ़ती सब्सिडी को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील इस मसले को WTO के विवाद निपटान पैनल में उठा रहे हैं जहां व्यापार संबंधी विवादों का समाधान होता है. उनके अलावा ग्वाटेमाला, यूरोपीय संघ, रूस, कोस्टारिका और थाईलैंड भी इस मामले में पक्ष बनना चाहते हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो इन देशों ने भी भारत में चीनी पर दी जा रही सब्सिडी के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर ली है. एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जहां WTO भारत में चीनी पर दी जा रही भारी सब्सिडी पर सवाल उठा रहा है वहीं गन्ना किसानों की बकाया रकम लगातार बढ़ती जा रही है.

अकेले उत्तर प्रदेश में ही चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया मार्च 2017 के 4,497 करोड़ रुपये से बढ़कर मार्च, 2019 में 12,700 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया. चीनी सब्सिडी पर सात देशों के साथ चर्चा का पहला दौर अप्रैल के पहले सप्ताह में शुरू भी हो गया है.

इससे पहले यूरोपीय संघ, रूस, चीन, जापान, ब्राजील, कनाडा, मिस्न, कजाकिस्तान, कोरिया, थाईलैंड, ताइवान और श्रीलंका जैसे 12 देश भारतीय निर्यात पर दी जाने वाली सब्सिडी को मिली अमेरिकी चुनौती के साथ लामबंद हो गए.

भारत की निर्यात सब्सिडी में वस्तु निर्यात पर दिए जाने वाले इंसेटिव्स यानी प्रोत्साहन भी शामिल हैं. WTO के एग्रीमेंट ऑन सब्सिडीज एंड काउंटरवेलिंग मेजर्स (एसीएसएम) का हवाला देते हुए अमेरिका ने अनुमान लगाया कि भारत निर्यात के एवज में सात अरब डॉलर की सब्सिडी दे रहा है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में भारत निशाने पर रहा है, लेकिन भारत की सब्सिडी पर सवाल उठाने वाले देशों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से चिंताजनक है. इसलिए और भी, क्योंकि WTO के कुछ कदम भारत की दुखती रग को और ज्यादा छेड़ते हैं.

WTO में विभिन्न देशों के रवैये के अतिरिक्त कनाडा अमेरिका के साथ मिलकर भारत से बीते कुछ वर्षों में दलहन के एमएसपी में बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठा रहा है. इस साल 12 फरवरी को अमेरिका ने कनाडा के साथ मिलकर WTO की कृषि समिति में एक समन देकर भारत से पांच किस्म की दालों की कीमतों के रुख को लेकर जवाब तलब किया.

पांच तरह की दालों चना, अरहर, मूंग, उड़द और मसूर को लेकर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उनके समर्थन मूल्य को लेकर भारत ने WTO की परिभाषित सीमा को पार कर लिया है. अमेरिका और कनाडा यह दलील दे रहे हैं कि दालों को लेकर भारत ने अपने समर्थन मूल्य को लेकर सही जानकारी नहीं दी है जो कृषि पर WTO समझौते का उल्लंघन है.

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और कृषि मंत्री ने अपने दावे में भारत पर यह आरोप लगाते हुऐ कहा कि भारत जानबूझकर सब्सिडी पर पर्दा डालकर ऐसे आंकड़े पेश कर रहा है जिनसे तस्वीर साफ नहीं होती.

उनका दावा है कि दालों के लिए भारत 32 से 85 प्रतिशत तक मूल्य समर्थन दे रहा है. इस पर भारत का कहना है कि सभी किस्म की दालों के लिए उसका कुल सब्सिडी समर्थन 1.8 प्रतिशत के आसपास है और यह WTO की दस प्रतिशत की स्वीकार्य सीमा से काफी कम है.

WTO प्रावधानों के अनुसार किसी भी उत्पाद के लिए समर्थन मूल्य उसके समग्र उत्पादन मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं दिया जा सकता. समर्थन मूल्य को भी इसमें सब्सिडी माना जाता है.

इसे ऐसे समझ सकते हैं कि मान लीजिए कि चने का कुल 500 करोड़ रुपये का उत्पादन हुआ हो तो उसके लिए किसानों को 50 करोड़ रुपये से अधिक समर्थन मूल्य नहीं दिया जा सकता. जहां अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा और अन्य देश शिकायत कर रहे हैं कि सब्सिडी का आकलन करने के लिए भारत WTO की पद्धति से इतर प्रक्रिया का उपयोग कर रहा है.

वहीं भारत की दलील है कि वास्तव में शिकायतकर्ता देश ही गलत पद्धति का इस्तेमाल कर रहे हैं.

ये देश एमएसपी के आंकड़े लेकर उससे बाह्य संदर्भ मूल्य (ईएसपी) को घटा रहे हैं जिसे WTO ने 1986-89 के आंकड़ों पर स्थिर किया हुआ है. फिर इस घटी हुई राशि को वे किसी विशेष फसल के उत्पादन की मात्रा से गुणा कर देते हैं. इससे बहुत ही बढ़े-चढ़े आंकड़े हासिल होते हैं.

हकीकत यह है कि भारत फसल का समूचा उत्पादन ही एमएसपी पर नहीं खरीदता, बल्कि उसका एक हिस्सा ही खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए खरीदता है ताकि समाज के वंचित वर्गों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें. इसका सही तरीका यही होना चाहिए कि कुल उत्पादन से गुणा करने के बजाय उतनी ही फसल की मात्रा को गुणा किया जाए जिसे एमएसपी पर खरीदा गया हो.

गेहूं और चावल के मामले में भी अमेरिका ने कई अवसरों पर भारत के आकलन को चुनौती दी है.

वर्ष 2013-14 के आंकड़ों का हवाला देते हुए उसने कहा कि भारत ने वास्तव में गेहूं की 65 प्रतिशत फसल और धान की 77 प्रतिशत फसल को समर्थन मूल्य दिया, लेकिन उससे कम के आंकड़े दिए.

वहीं भारत ने दावा किया कि इन दोनों फसलों के लिए एमएसपी का आंकड़ा 10 प्रतिशत की स्वीकार्य सीमा से कम ही था. WTO में इस आक्रामक रुख का मकसद यह है कि कृषि एवं डेयरी उत्पादों के लिए और बड़ा बाजार तलाशा जाए.

यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उसी दिन स्पष्ट कर दिया था जब उन्होंने भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम उत्पादों को सामान्य वरीयता तंत्र यानी जीएसपी के तहत मिले फायदों पर विराम लगा दिया था. इसके जवाब में भारत ने अमेरिका के 29 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने का एलान तो किया, लेकिन उसमें भी शिथिलता सरकार की व्यापार नीति में कमजोरी को ही जाहिर करती है.

आयात शुल्क बढ़ाने की मियाद अब दो मई तक इस उम्मीद के साथ बढ़ा दी गई कि शायद अमेरिका का रवैया कुछ नरम पड़ जाए. बहरहाल WTO के मौजूदा विवाद में भारत की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि वह अमेरिका को इसी मंच पर कैसे घेर पाता है जो अपने किसानों को भारी-भरकम सब्सिडी देता है. वास्तव में हम व्यापार कूटनीति में कमजोरी के परिणाम भुगत रहे हैं.

अगर भारत ने घरेलू कृषि के हितों की रक्षा नहीं की तो देश की खाद्य सुरक्षा का दारोमदार उन्हीं किसानों के कंधों पर और बढ़ जाएगा जो पहले से ही मुश्किलों के कारण संकट में फंसे हुए हैं.

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