छत्तीसगढ़ में पेसा किनारे, अडानी के लिये दूसरा कानून

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में अडानी के एमडीओ वाले कोल ब्लॉक के लिये सरकार ने पेसा कानून को ठेंगा दिखा दिया है. सरकार ने इस इलाके में बहुचर्चित पेसा कानून के बजाये कोल बेयरिंग एक्ट के तहज जमीन अधिग्रहण करने का फरमान जारी किया है. दिलचस्प ये है कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में भी साफ है कि किसी भी अधिसूचित इलाके में ग्राम सभा का निर्णय जरुरी होगा.

सरगुजा के हसदेव अरण्य कोल क्षेत्र में परसा कोल ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित है. जिसके माइनिंग का जिम्मा अडानी के पास है.गौरतलब है कि आदिवासी बहुल पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी पेसा कानून लागू होता है, जहां ग्राम सभा की अनुमति के बिना कोई भी काम नहीं किया जा सकता.


छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का आरोप है कि नियमानुसार सरगुजा जिले के उदयपुर का यह इलाका पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र है, जहां इस तरह के किसी भी खनन के लिये ग्राम सभा की सहमति जरुरी है. लेकिन 1996 के ग्राम सभा से संबंधित कानून के बजाये छत्तीसगढ़ सरकार ने नया रास्ता निकाल लिया है और इस इलाके में खनन के लिये कोल बेयरिंग एक्ट के सहारे कानून की अपनी व्याख्या कर रही है.

भूमि अर्जन हेतु कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम 1957 का कानून है. जाहिर है, इस कानून के बाद 1996 में प्रभाव में आया पेसा कानून इस कानून पर भी लागू होगा. हालत ये है कि भू अधिग्रहण कानून 2013 में भी स्पष्ट प्रावधान है कि इस कानून या किसी भी अन्य केंद्रीय कानून के तहत भूमि अर्जन से पूर्व पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की अनिवार्य सहमति ली जाएगी. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने कहा है आदिवासी हितों और कानून की रक्षा का दायित्व राज्य सरकार पर है. लेकिन कोल ब्लॉक के मामले में राज्य की सरकार निजी कंपनियों के साथ जा कर खड़ी हो गई है.

आलोक शुक्ला ने कहा कि इस मामले में कोल नियंत्रक को आपत्ति गई हैं. उन्होंने कहा है कि अगर सरकार ने ग्राम सभा के निर्णय के खिलाफ खनन की कोई कार्रवाई शुरु कराने की कोशिश की तो हम सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे.

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