जोगी होने का मतलब

दिवाकर मुक्तिबोध
(छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर केन्द्रित यह आलेख सन 2009-10 के दरमियान लिखा गया था. लिहाजा उनकी राजनीतिक गैर राजनीतिक कथा यात्रा इसी अवधि तक सीमित है.)
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत प्रमोद कुमार जोगी का क्या स्थान होना चाहिए, यह एक लंबी बहस का विषय है. कांग्रेस की राजनीति में भी उनके संदर्भ में एकबारगी कोई ठोस राय कायम नहीं की जा सकती. इस पर भी काफी मतांतर हो सकता है. दरअसल यह स्थिति इसलिए है क्योंकि जोगी का व्यक्तित्व अजीबोगरीब है.

राजनेताओं में वैसे भी व्यक्तित्व की पारदर्शिता का अभाव रहता है. उसमें सच और झूठ की कई परतें होती हैं लिहाजा उन्हें ठीक-ठीक पढ़ा नहीं जा सकता. पढ़ने की कोशिश करें तो उसमें भी काफी वक्त लगता है और ऐसे में यदि जोगी जैसे गूढ़ व्यक्तित्व आपके सामने हों और उसे पढ़ने की चुनौती आपने स्वीकार कर ली हो तो जाहिर सी बात है, आपको काफी मशक्कत करनी पड़ेगी. उनकी जिंदगी की किताब जिसमें साल दर साल नए-नए पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, इतनी विचित्र और हैरतअंगेज है कि उन्हें पढ़ते-पढ़ते न केवल आप रोमांचित होंगे बल्कि इस नतीजे पर पहुंचेगे कि यह आदमी लाजवाब है, जबर्दस्त है, जीवट है और काफी हद तक तानाशाह भी. राजनीति में ऐसी शख्सियतें कम देखने मिलती है जो उसकी धारा को मनमाफिक ढंग से मोड़ने का सामर्थ्य रखते हों. फिर शारीरिक अपंगता के चलते राजनीति की धुरी बने रहना और भी कठिन. जोगी कुछ ऐसे ही शख्स हैं.


जोगी मेरे कभी करीबी नहीं रहे. दरअसल पत्रकारिता के अपने लंबे करियर में मैंने सभी नेताओं से एक समान दूरी बनाए रखी. किसी के कैम्प में शामिल नहीं हुआ हालांकि तोहमत लगाने वाले तीर चलाते रहे, लेकिन मैंने अपने मन को कभी घायल नहीं होने दिया. दृढ़तापूर्वक अपने पेशे को इमानदारी से जीता रहा जिसका अंतत: नतीजा यह निकला कि यह मान लिया गया कि मैं उनके किसी काम का नहीं. अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए न तो मेरा इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही मुझे भरमाया जा सकता है. जब यह राय धीरे-धीरे पुख्ता हो गई तब किसी ने नजदीक फटकने की कोशिश नहीं की और न ही दूर भागने की. एक निश्चित दूरी बनाएं रखी. हालांकि लोग-बाग अपने-अपने तरीके से रिश्ते को परिभाषित करते रहे और मैं अपना काम करता रहा. यही स्थिति अभी भी कायम है.

ना काहू से दोस्ती…
जैसा कि मैंने बताया, जोगी कभी करीबी नहीं रहे. जिस तरह हर नेता के लिए आम तौर पर यह जरुरी होता है कि वह अपनी नेतागिरी को चमकाने अथवा उसे जिंदा रखने के लिए पत्रकारों व रिपोर्टरों को जाने पहिचाने, उनकी खुशामद करें उसी तरह पत्रकारों के लिए भी यह आवश्यक है कि नेताओं की खोज-खबर लेते रहे, उन पर बारीक निगाह रखें ताकि राजनीति के समुद्र में गोता लगाकर खबरों की सीप हासिल की जा सके. यानी दोनों का चोली-दामन का साथ. दोनों का एक दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता. लिहाजा अजीत जोगी को मैं खूब अच्छी तरह जानता था. जब वे आई.ए.एस. थे और रायपुर में कलेक्टर. तब और जब वे राजनीति में आए तब भी.

उनसे यदा-कदा मुलाकातें हुआ करती थीं. एक प्रशासनिक अधिकारी के रुप में मेरे मन में उनकी कोई छाप नहीं थी लेकिन बाद में एक राजनेता के रुप में और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में मैने उन्हें देखने-समझने की कोशिश की और कई मायनों में वे मुझे अन्य समकालीन राजनेताओं से अलग लगे, प्रभावशाली लगे. उनके व्यक्तित्व को भीतर से झांक न पाने के बावजूद मैं यह राय कायम कर सका कि यदि इस व्यक्ति में कतिपय कमजोरियां न होती तो यह न केवल छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक शासन करता बल्कि कांग्रेस की राजनीति में भी धु्रव तारे की तरह चमकता.

जोगी पर आगे कुछ लिखूं, इसके पूर्व यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उनके व्यक्तित्व का आकलन उनके उन राजनीतिक कार्यों, निर्णयों एवं प्रतिक्रियाओं पर आधारित है जिन्हें मैंने देखा, सुना, पढ़ा एवं महसूस किया है. उनके पूरे प्रशासनिक एवं राजनीतिक करियर का न तो मैं गवाह हूं और न ही मैने उनके साथ कभी कोई समय बिताया है. यह विशुद्ध रुप से उनकी राजनीतिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर एक दृष्टि है जिससे उनके व्यक्तित्व को तौला जा सकता है और किसी निष्कर्ष पर भी पहुंचा जा सकता है.

लिहाजा इसे सकल अध्ययन नहीं माना जाना चाहिए. जो उनके निकटस्थ हैं, वर्षों से उन्हें देखते आ रहे हैं, उनके कामकाज में सहभागी रहे हैं, उन्हें मार्गदर्शन देते रहे हैं, जो उनके दरबारी हैं अथवा ऐसे लोग जो राजनीति में उनके प्रतिद्वंदी हैं, दुश्मन है और उन्हें तानाशाह मानते है, इन सभी की राय उनके (जोगी) बारे में अलग-अलग हो सकती है. इसलिए जरुरी नहीं है कि मेरे लिखे शब्दों पर ऐसे लोग गौर करें अथवा सहमति में सिर हिलाएं. वे मुझे खारिज भी कर सकते हैं, उल्टा-सीधा भी सोच सकते हैं. ऐसा करने के लिए निश्चितत: वे स्वतंत्र हैं.

पहली मुलाकात
जोगी से पहली मुलाकात कब हुई, तिथि ठीक से याद नहीं. अलबत्ता रायपुर के कलेक्टर के रुप में मैं उन्हें जानता था. यह भी जानता था, वे लोकप्रिय प्रशासनिक अधिकारी हैं और खेलों में उनकी गहरी रुचि है. रायपुर में स्टेडियम बनाने धन उगाही के लिए उन्होंने लाटरी चलाई थी किन्तु अन्यान्य कारणों से यह प्रयास सफल नहीं हो सका था. कलेक्टरी के दौरान वे सबसे ज्यादा लोकप्रिय युवाओं, खासकर विश्वविद्यालयीन छात्रों के मध्य थे. वे अच्छे और बुरे दोनों को साथ लेकर चलते थे. यानी बदनामशुदा छात्रों की फौज भी उनके साथ हुआ करती थी. बल्कि यो कहें ऐसे लोगों की तादाद उनके पास ज्यादा थी. कुख्यात बालकृष्ण अग्रवाल उन्हीं का पैदाइश माना जाता है जो छात्र जीवन में उनके साथ जुड़ा और लंबे समय तक उनके साथ बना रहा. जब वे राजनीति में आए तब भी ऐसे लोग उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहे.

राजनीति में यह बात तो समझ में आती है क्योंकि नेताओं को ऐसे लोगों की जरुरत पड़ती ही है किन्तु कलेक्टर को क्यों ऐसे लोगों की जरुरत होनी चाहिए? सोचें तो प्रतीत होता है, ऐसा स्वभावगत है. पक्ष में दलील दी जा सकती है कि आखिरकार भगवान शिवजी की बारात में भी ऐसे ही लोगों की भरमार थी.

बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि जिलाधीश के रुप में अजीत जोगी ने जो लोकप्रियता हासिल की चाहे वह इंदौर हो या रायपुर, वह बेमिसाल है. उनके पूर्व और अब तक रायपुर में ऐसा कोई कलेक्टर नहीं हुआ जिसके अपने कार्यों के जरिए जनता के बीच खास जगह बनाई हो. जोगी की लोकप्रियता इस बात का प्रतीक थी कि वे बहुत जहीन, संवेदनशील एवं कुशल प्रशासक हैं और जिन्हें जनता की नब्ज को पकड़ना खूब अच्छी तरह आता है.
जारी
*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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