बरवाडीह रेल लाइन कब ?

रायपुर | समाचार डेस्क:छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से झारखंड के बरवाडीह तक रेल लाइन कब बनेगी? केंद्र सरकार ने शुक्रवार को भले इस रेल लाइन के लिये मंजूरी दे दी हो लेकिन पिछले 70 सालों में ऐसी कई-कई मंजूरी मिली और वे फाइलों में दफन हो कर रह गईं. इस रेल लाइन के बन जाने से मुंबई-हावड़ा मार्ग की दूरी कम से कम 300 किलोमीटर तक कम हो जाने का अनुमान है. लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाती.

गौरतलब है कि शुक्रवार को मुख्यमंत्री रमन सिंह के प्रस्तावों पर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने राज्य के लिए दो नये रेल मार्गों की सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी. इन मार्गों की कुल लम्बाई 492 किलोमीटर होगी.


डॉ. सिंह ने श्री प्रभु के साथ बैठक में रायपुर-बलौदाबाजार-झारसुगुड़ा (ओडिशा) तक 310 किलोमीटर तथा अम्बिकापुर-बरवाडीह (झारखण्ड) तक 182 किलोमीटर रेलमार्गों के निर्माण से संबंधित प्रस्तावों पर विचार-विमर्श किया. रेल मंत्री ने इन प्रस्तावों को अपनी सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी. मुख्यमंत्री ने कहा कि रायपुर से बलौदाबाजार होते हुए झारसुगुड़ा तक रेलमार्ग बनने पर छत्तीसगढ़ में मुम्बई-हावड़ा लाईन पर एक वैकल्पिक रेल मार्ग की सुविधा यात्रियों को मिल सकती है.

डॉ. रमन सिंह ने श्री प्रभु से कहा कि रायपुर से बलौदाबाजार होकर झारसुगुड़ा जाने वाला प्रस्तावित रेल मार्ग राज्य के चार जिलों से होकर गुजरेगा . इससे व्यस्ततम मुम्बई – हावड़ा रेल मार्ग को वैकल्पिक रेलमार्ग मिलने के साथ साथ इस क्षेत्र में कोल परिवहन में भी सहुलियत होगी.

इसी प्रकार अम्बिकापुर से बरवाडीह रेलमार्ग बलरामपुर जिले को जोड़ेगा तथा इस क्षेत्र में स्थित महत्वपूर्ण कोल खदानों के लिए कोल परिवहन में मददगार साबित होगा.

असल में बरवाडीह और अंबिकापुर रेल लाइन अंग्रेजों के जमाने की परियोजना है. आज भी झारखंड के भंडरिया इलाके में कई जगह रेल पटरियों वाली पुल खंडहर रुप में इसकी कहानी कहते दिखाई पड़ जाते हैं. 1942 में शुरु हुई यह परियोजना जाने कब की बन जाती. लेकिन देश की आजादी के साथ ही इस इलाके में रेल लाइन का सपना अंधेरे में डूब गया.

जॉर्ज फर्नांडीज जब रेल मंत्री थे तब भी तत्काल इस रेल लाइन का काम शुरु करने के निर्देश दिये गये थे. ममता बनर्जी और लालू यादव के रेल बजटों में भी यह रेल लाइन हमेशा शामिल रहा है.

यहां तक कि इस रेललाइन का पूरा सर्वे कर के भी केंद्र सरकार को सौंपा जा चुका है. लेकिन संकट ये है कि आज तक बात आगे नहीं बढ़ पाती. ऐसे में सुरेश प्रभु की कथित सैद्धांतिक सहमति से बहुत उम्मीद तो नहीं जगती.

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