इसलिये अमरीका ने बुलाया है

नई दिल्ली | संवाददाता: अमरीकी राष्ट्रपति का निमंत्रण मोदी के लिये महत्वपूर्ण है. इस निमंत्रण की तुलना मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से की जा सकती है. मौजूदा दुनिया में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना उतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता है जितना अमरीकी राष्ट्रपति के बुलावे को माना जाता है.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में जैसी भी नीतियां लागू की हो तथा उसका जो भी परिणाम हुआ हो, मनमोहन, ओबामा के प्रिय थे यह जग जाहिर है. मनमोहन सिंह ने देश में अमरीकी कंपनी वालमार्ट से लेकर वहां के नाभिकीय संयंत्रों के लिये बाजार उपलब्ध करवाने की भरसक कोशिश की थी. जनता के विरोध के कारण मनमोहन सिंह उसमें कुछ हद तक नाकाम रहें थे यह दिगर बात है.


अमरीका की नजर भी मोदी पर रही है क्योंकि इस बात के संकेत पहले से ही मिल रहे थे कि मोदी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रहें हैं. अमरीकी प्रशासन ऐसी बहुमत वाली सरकारों को पसंद करती है यह किसी से छुपा हुआ नहीं है. आखिरकार, अमरीकी धन्ना सेठों के लिये देशी बाजार को खोलने के लिये संसदीय गणतंत्र में बहुमत का अपना महत्व होता है.

संसद में पिछले दिनों पेश किये गये रेल तथा आम बजट से स्पष्ट है कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश के जरिये ही जान फूंकने जा रही है. ऐसे में बाजार और निवेश की खोज में रहने वाले अमरीका की लार टपकना स्वभाविक है. अमरीका की नजर भारत के विशाल खुदरा बाजार पर टिकी हुई है. बराक ओबामा भी चाहते हैं कि मनमोहन सिंह जिन पुनीत कार्यो को पूरा न कर सके थे उन्हें मोदी के रहते किसी तरह से अंजाम तक पहुंचाया जा सके.

ऐसे में अमरीका, भारत के प्रधानमंत्री को निमंत्रण देकर अपनी भलाई की ही सोच रहा है. वैसे भी अमरीकी राष्ट्रपति को अमरीकी हितों का सबसे बड़ा रखवाला माना जाता है. अब देखना यह है कि सितंबर में जब मोदी-ओबामा की बैठक होती है तो उससे क्या निकल कर बाहर आता है.

भारत भी चाहेगा कि अमरीका, पाकिस्तान तथा चीन के साथ विवादों की स्थिति में उसका साथ दे. इसी तरह अमरीका चाहेगा कि उसके कंपनियों को भारत में निवेश के लिये सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाया जाये. इसे कहते हैं अपने हित के लिये निमंत्रण देना. मोदी को शुक्रवार को दिये गये अमरीकी निमंत्रण को इस नजरिये से भी देखा जाना चाहिये.

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