पत्रकार संतोष के पक्ष में उतरा एमनेस्टी

रायपुर | संवाददाता: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छत्तीसगढ़ के पत्रकार संतोष यादव की रिहाई की मांग की है. बस्तर के पत्रकार संतोष यादव को पुलिस ने माओवादी होने का आरोप लगा कर पिछले महीने गिरफ्तार किया था. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इस तरह की गिरफ्तारियों का विरोध किया जाना चाहिये.

संतोष यादव के वकीलों के हवाले से एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि संतोष को फर्जी तरीके से फंसाया गया है. संतोष उस इलाके में पुलिस की गलत कार्रवाइयों का विरोध करते रहे हैं, इसलिये उन्हें निशाना बनाया गया है. एमनेस्टी ने संतोष की रिहाई के लिये अभियान चलाने का आह्वान किया है और इसके लिये राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह और बस्तर के आईजी को पत्र लिखने की भी अपील की है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के प्रचारक अभीर वीपी ने बताया “छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों और माओवादी सशस्त्र समूहों के बीच संघर्ष वाले क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों का मुंह बंद करने के लिए कठोर कानूनों का प्रयोग किया जा रहा है. मीडिया को धमकाने वाले ये प्रयास बंद होने चाहिए.”

अभीर वीपी ने कहा कि “कहानी के दूसरे पहलू की रिपोर्ट करना पत्रकार का अभिव्यपक्तिह की स्ववतंत्रता का अधिकार है. अभीर वीपी ने कहा कि, छत्तीसगढ़ में हाल ही की गिरफ्तारियां मीडिया की स्व तंत्रता के प्रति राज्य व सरकार की घृणा का एक निराशाजनक संकेत है. गिरफ्तार किए गए ऐसे पत्रकारों को, जो केवल अपना काम कर रहे हैं, तुरंत और बिना किसी शर्त के रिहा किया जाना चाहिए.”

संतोष यादव की वकील ईशा खंडेलवाल ने एमनेस्टीह इंटरनेशनल इंडिया को बताया कि आरोप मनगढ़ंत हैं, और पत्रकार को पुलिस द्वारा आदिवासियों के खिलाफ मानवाधिकारों के दुरुपयोग की रिपोर्टिंग करने के लिए निशाना बनाया गया है.

उन्होंने कहा कि, “संतोष यादव राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों के लिए संपर्क सूत्र थे और संघर्ष-ग्रस्तक आदिवासियों की दुर्दशा पर मीडिया का ध्या न आकर्षित करने में महत्वंपूर्ण भूमिका निभाते थे. उन्होंनने आदिवासियों को कानूनी सहायता दिलाने में भी महत्विपूर्ण भूमिका निभाई है.”

वकील के अनुसार, संतोष यादव पहले भी अधिकारियों की प्रताड़ना का शिकार हुए हैं. उन्होंने कहा कि जून के महीने में राज्यं की पुलिस द्वारा उनके साथ हाथापाई और मारपीट की गई थी.

राजस्थान पत्रिका पत्र समूह के दरभा इलाके के प्रतिनिधि को पुलिस ने माओवादियों के साथ कथित संपर्क के आरोप में टाडा और पोटा से भी ख़तरनाक माने जाने वाले ‘छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा क़ानून’ के तहत गिरफ़्तार किया है.

बस्तर के पुलिस अधीक्षक का दावा है कि संतोष पर लगातार नज़र रखी जा रही थी और पुख़्ता प्रमाण के बाद ही उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.
हालांकि संतोष के परिजन, स्थानीय पत्रकार और मानवाधिकार संगठन इसे ग़लत बता रहे हैं.

शनिवार को ही इस मामले को लेकर राज्य भर के पत्रकारों ने रायपुर में एक बैठक कर पुलिस की इस कार्रवाई का विरोध किया था. अब मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है.

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