पड़ोस से शुरु करे विदेश नीति!!

बादल सरोज
बिहार के चुनाव, गाय बकरी और शाह रुख़ खान की हिमायत-लानत के सुर्ख़ियों में छाई हुयी हैं. नतीजा यह हुआ कि कल अलग तरीके की एतिहासिक खबर हाशिये पर चली गयी. हुआ यह है कि पहली बार भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इंटरनेशनल फोरम में नेपाल के खिलाफ शिकायत करके उस देश के आतंरिक मामलों को लेकर कठोर भाषा में अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. पिछले कुछ महीनों से नेपाल के साथ धीरे धीरे बिगड़ते रिश्तों का यह अब तक का न्यूनतम स्तर है.

महज 14-15 महीने के अब तक के कार्यकाल में 28 देशों, जिनमे नेपाल और संयुक्त राज्य अमरीका की 2 यात्रायें शामिल हैं, करके प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशी दौरों का एक विश्व रिकॉर्ड सा कायम किया है. अगले सप्ताह जब भारतीय प्रधान मंत्री लन्दन में, विश्व में शायद अपनी तरह का पहला, रोड शो कर रहे होंगे, तब भारत का विदेश मंत्रालय नेपाल की गुत्थी को सुलझाने में व्यस्त होगा. किसी स्वस्थ और जाग्रत लोकतंत्र के लिये जरूरी है कि विदेश नीति सिर्फ तंत्र तक सीमित न रहे, लोक की चिंता में भी आये.


नेपाल का घटना विकास त्वरित पुनरावलोकन की दरकार रखता है. इसलिए कि अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी के शब्दों में “घरेलू नीति हमें सिर्फ हरा भर सकती है, किन्तु विदेश नीति हमें मार भी सकती है.” इसलिये भी कि जिस तरह विदेश की शुरुआत पड़ोस से होती है उसी तरह संबंधों का आरम्भ भी पड़ोस से ही होता है. खासतौर से इसलिए और कि नेपाल हमारा सबसे निकटतम और विश्वसनीय पड़ोसी रहा है.

नेपाल से हमारे सदियों पुराने सम्बन्ध हैं. इन संबंधों का अनूठापन यहाँ तक है कि हमारी सेना के एक हिस्से की बनावट के वे हमेशा से हिस्सा रहे हैं. फील्ड मार्शल मानेकशा ने “मुझे ज्यादा गर्व होता यदि मैं कह सकता कि मैं गोरखा हूँ” कहकर उसकी विशिष्टता रेखांकित की थी .

गौरतलब है कि अपने अस्तित्व की पूरी अवधि में नेपाल कभी भी भारत से हटकर नहीं रहा है. चीन के निकटतम सामीप्य के बावजूद यहाँ तक कि माओवादी प्रचंड के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी नेपाल ने भारत की तुलना में चीन को प्राथमिकता नहीं दी. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि आज दोनों के बीच कलुष उफान पर है? रिश्ते बद से बदतरी की ओर हैं. भारत की जगह चीन भर रहा है.

तीस साल की लंबी लड़ाई और अनगिनत कुर्बानियों के बाद नेपाली जनता ने एक संविधान हासिल किया है. खूब बहस के बाद नेपाल की संविधान सभा ने 95% की रजामंदी के साथ एक ऐसा संविधान मंजूर किया है जो आंशिक सानुपातिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक संस्थाओं में महिलाओं की सुनिश्चित भागीदारी और वंचितों सहित सामुदायिक प्रतिनिधित्व की गारंटी के साथ धर्मनिरपेक्षता का प्रावधान करता है. इस संविधान को लेकर नेपाली जनता के मधेशी समुदाय में कुछ आशंकाएं हैं. उम्मीद है नेपाली संसद इनका भी समाधान ढूंढ लेगी.

दुनिया के हर संविधान में सुधार और बदलावों की मांगे उठती रही हैं, उठती रहेंगी. खुद हमारे, अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से सूत्रबद्द – लिपिबद्द संविधान में 65 वर्षों में 100 से अधिक संशोधन हो चुके है. मगर जिस तरह कोई अन्य राष्ट्र यह नहीं कह सकता कि भारत के संविधान में क्या संशोधन किये जाने चाहिए. यह काम सार्वभौम भारतीय संसद का है. उसी तरह नेपाली संविधान में क्या गलत है क्या सही यह सुझाव, तेल और जीवनोपयोगी सामग्री की नाकाबंदी करके, कोई भी अगर देता है तो इसे एक आत्मघाती कूटनीति के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता. इस काम को नेपाल की सार्वभौम संसद के लिए ही छोड़ा जाना चाहिए.

500 साल पहले निकोलो मैकियावली ने कहा था कि “बड़प्पन और विनम्रता की बजाय अधिकारपूर्वक जीती गयी मित्रतायें न तो विश्वसनीय होती हैं, न मुश्किल वक़्त में काम आने लायक होती है.” बड़प्पन दिखावे में नहीं विनम्रता में होता है. हाल में नेपाल में आये विनाशकारी भूकंप के वक़्त भारतीय जनता और भारत की सरकार ने जिस तरह की मदद की वह सदियों पुराने रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने में निर्णायक साबित हो सकता था. मगर हमारे मीडिया के कवरेज और नेताओं की दिखाऊ-छपाऊ लालसा ने सब किये धरे पर पानी फेर दिया. मदद करते में अहसान दिखाना और पीड़ित को याचक बनाकर प्रस्तुत करना कितना घातक होता है इसका यह आदर्श उदाहरण है. हमें इस मामले में क्यूबा से सबक लेना चाहिये. जिसने पेशावर से पाक अधिकृत कश्मीर तक आये भूकंप में मदद के लिए 3 हवाईजहाज भर कर डॉक्टर्स, नर्स, दवाओं की खेप 72 घंटे में ही पहुंचा दी थी. बिना किसी नेता या मीडिया टीम को भेजे. जबकि पाकिस्तान में क्यूबा का दूतावास तक नहीं है.

पिछले कुछ वर्षों में बाकी पड़ोसियों के साथ संबंधों के मामले में नीतिगत सतर्कता शिथिल हुई लगती है. भारत की विदेशनीति का कुतुबनुमा दूसरी महाशक्तियों के हथियारों के लिए अपने कन्धों को मुहैया न कराने का रहा है. इसी ने हमें दुनिया के 150 देशों का सर्वमान्य नेता बनाया था. इसी बीजक को गहे रखने की जरूरत है. उदाहरण के लिए चीन के साथ रिश्ते भारत की सहूलियत से तय होने चाहिए, अमरीका या जापान की रणनीति के हिसाब से नहीं. क्योंकि वे भी पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते हमारी जरूरत के हिसाब से तय नहीं करते.

फ़िक्र यह नहीं है कि अर्थनीति में अपना मौद्रिक और व्यावसायिक प्रभुत्व कायम करने वाली ताकतें हमारी विदेशनीति को अपने हिसाब से चलाना चाहती हैं, चिंता की बात यह है कि जिन्हें ऐसा नहीं होने देना चाहिए वे ही ऐसा करने पर आमादा हैं.

राष्ट्रपति की हाल की फिलिस्तीन- इजरायल यात्रा से साफ़ हो गया है कि इस बदलाव के नतीजे शर्मसार करने वाले भी निकल रहे हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी अपने साथ भारत की ओर से फिलिस्तीन के विश्वविद्यालय को एक आधुनिक कम्प्यूटर प्रणाली भेंट करने के लिए ले गए थे. सारी शिष्टताओं को ताक पर रखकर इजरायली जांच एजेंसियों ने इन कम्प्यूटरों के सारे सिस्टम और प्रोग्राम निकाल लिए और खाली डब्बे छोड़ दिए. अफ़सोस की बात ये थी कि भारत की सरकार ने इस कूटनीतिक अशिष्टता के विरुध्द औपचारिक आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई. नतीजा यह निकला कि जब हमारे राष्ट्रपति फिलिस्तीनी छात्रों के बीच बोलने गए तो उन्हें नारेबाजी के बीच बिना भाषण दिए लौटना पड़ा. हमारी चलताऊ विदेशनीति ने 60-65 साल पुराने हमारे मित्र फिलिस्तीन की नज़रों में हमें बौना कर दिया.

मैकियावली ने यह भी कहा था कि ” बीमारी जब शुरुआती अवस्था में होती है तो उसका इलाज आसान होता है, मगर उसका पता लगाना-निदान- मुश्किल होता है. बीमारी जब पुरानी हो जाती है तो निदान तो आसान होता है मगर इलाज मुश्किल हो जाता है.”

इसलिए देश के स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा कि बीमारी शुरू में ही पकड़ ली जाए. इस लिहाज से आवश्यक है कि सामराजी पूंजी के साथ, पीएल 480 के गेंहू के साथ आयी गाजर घास की तरह, उनकी धतूराबीजी विदेश नीति का आगमन रोका जाए शुभस्य शीघ्रम्.

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