बिहार: भाजपा का सीएम कौन?

पटना | एजेंसी: क्षेत्रीय दलों की भांति भाजपा के लिए चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करना आसान नहीं होता. बिहार का उदाहरण सामने है. यहां एक ही स्तर के अनेक नेता हैं, वहीं यह भी मानना पड़ेगा आठ वर्ष तक नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चलाने का कुछ नुकसान भी हुआ है. नीतीश गठबंधन सरकार ने बहुत अच्छा काम किया. ये बात अलग है कि इसमें भाजपा मंत्रियों का योगदान अधिक था, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर नीतीश को पूरा लाभ मिला.

दूसरा पक्ष यह है कि जदयू में नीतीश के मुकाबले का कोई नेता नहीं है. वह स्वाभाविक और एकमात्र नेता थे, कहीं कोई विवाद नहीं था. यदि राजद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना होता, तो राबड़ी देवी से आगे बात नहीं बढ़ती. लालू यादव सजाफ्याता होने के कारण दावेदार हो नहीं सकते थे. राबड़ी एक वर्ष पहले लोकसभा का चुनाव हारी हैं. इस लिहाज से वह भी मजबूत दावेदार नहीं बनतीं. किसी अन्य नाम पर लालू विचार तक नहीं कर सकते थे, इसीलिए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी में मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं है. इस बात से पार्टी के कई वरिष्ठ नेता नाराज बताए जाते हैं.


नीतीश की उम्मीदवारी का समर्थन कर लालू ने दांव चला है. नीतीश के नाम पर वह राजद प्रत्याशियों को जिताने का अधिक से अधिक प्रयास करेंगे. उनका उद्देश्य नीतीश को मुख्यमंत्री बनाना नहीं, बल्कि राजद के अधिक प्रत्याशियों को जिताना है. यदि राजद के अधिक उम्मीदवार जीते, तो यह तय है कि लालू अपनी तरफ से नीतीश को रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

लालू किसी भी दशा में नीतीश की विरोधी राजनीति को भूल नहीं सकते. सत्रह वर्षों तक दोनों अलग थे, तब तो कहना ही क्या. दोनों ने एक-दूसरे के लिए क्या-क्या नहीं कहा. जब गठबंधन हुआ तब भी नीतीश बाज नहीं आए.

उन्होंने लालू को नीचा दिखाया है. लालू पूरा जोर लगा रहे थे कि मुख्यमंत्री पद की घोषणा चुनाव बाद हो. यदि वह सजाफ्याता न होते तो नीतीश को किसी भी दशा में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार न करते. वह जानते हैं कि उनकी इस स्थिति का ही नीतीश ने फायदा उठाया है.

नीतीश को लगा कि राजद के पास फिलहाल कोई उपयुक्त दावेदार नहीं है, इसलिए वह अपनी दावेदारी स्वीकार करने के लिए लालू को बाध्य कर सके. गठबंधन के बाद भी दोनों की दूरी और अविश्वास बना हुआ है. नीतीश भी जानते हैं कि लालू के अधिक विधायक जीते तो वह दबाव की राजनीति करेंगे. तब उनका प्रयास होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश की जगह किसी अन्य को मिले.

तात्पर्य यह कि राजद व जदयू ने भावी मुख्यमंत्री पद पर सहमति तो दिखा दी, लेकिन इसे अनिश्चितता की समाप्ति नहीं समझना चाहिए. लालू यादव के अलावा राजद के किसी भी प्रमुख नेता ने नीतीश के नाम पर खास उत्साह नहीं दिखाया है. राबड़ी देवी तो आज तक नीतीश की घोर विरोधी है. उन्हें लगता है कि नीतीश ने सत्ता में रहते हुए कई बार उनके साथ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए ही सिपाहियों से उनकी कार की तलाशी कराई गई थी.

राबड़ी यह सब भूलने और माफ करने को तैयार नहीं हैं. वह इसे मजबूरी का गठबंधन मानती हैं. यदि राजद को पर्याप्त विधायक मिले, तो नीतीश से हिसाब बराबर करने में राबड़ी सबसे आगे होंगी. नीतीश भी जानते हैं कि राजद और जदयू के दिल कभी नहीं मिल सकते. इसलिए वह अपनी अलग तैयारी कर रहे हैं.

भाजपा ने तो मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित ही नहीं किया है. दिल्ली का दर्द पार्टी भूली नहीं है. हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद की पहले घोषणा न करने का उसे फायदा मिला था, लेकिन दिल्ली में आखिरी समय में किरण बेदी को प्रत्याशी घोषित करना नुकसान का सौदा रहा. यही दशा बिहार में है.

बिहार भाजपा में नेताओं और दावेदारों की कमी नहीं है. इनमें किसी का स्तर भी दूसरे से कम नहीं. ऐसे में किसी एक नाम की घोषणा शेष सभी को नाराज कर सकती है. बिहार के जातीय समीकरण को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां राजग के लिए सबसे बड़े नेता होंगे. मोदी देश के नेता हैं,जबकि नीतीश केवल बिहार के नेता हैं. ऐसे में नरेंद्र मोदी और नीतीश के बीच कोई मुकाबला नहीं हो सकता. मोदी के प्रचार का भाजपा को फायदा मिलेगा. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव के पहले मोदी ने बिहार में चुनाव प्रचार नहीं किया था. नीतीश की उनसे निजी नाराजगी थी.

लोकसभा चुनाव में पहली बार मोदी ने इतना व्यापक प्रचार किया था. मतदाताओं ने उन पर भरपूर विश्वास व्यक्त किया. लेकिन तब उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की चाहत थी. इस बार मुख्यमंत्री का चुनाव होगा. पार्टी को मोदी का लाभ मिल सकता है, लेकिन प्रांतीय नेताओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं होगी.

पिछली विधानसभा तीन वर्ष तक भाजपा भी सत्ता में थी. उसे अपनी उपलब्धियां बतानी होंगी. वही अपनी एकता का भी प्रदर्शन करना होगा.

राजग के रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. यदि वह राजद, जदयू को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें आपसी मतभेदों को छोड़ना होगा. भाजपा नेताओं को भी चाहिए कि वह मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उतावलापन संयमित रखें.

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