ब्रिक्स बैंक का सपना साकार होगा

फोर्टालेजा | समाचार डेस्क: वित्तीय वर्चस्ववाद से मुकाबले के लिये ब्रिक्स बैंक की स्थापना की जायेगी. फोर्टालेजा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक में विकसित देशों के प्रभुत्ववादी रवैये के चलते ब्राजील, रशिया, भारत, चीन तथा दक्षिण अफ्रीका मिलकर ब्रिक्स बैंक की स्थापना कर रहें हैं. जिसका मुख्यालय शंघाई में रहेगा तथा भारत से इसका अध्यक्ष 6 सालों के लिये होगा.

इसे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का नये वैश्विक विश्व की स्थापना के लिये करवट कहा जायेगा. ब्रिक्स सम्मेलन में बीमा क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने तथा आपसी बाजार में व्यापार को बढ़ाने के लिये संकल्प लिया गया है. वास्तव में इन सभी निर्णयों से भारत जैसे विकासशील देशों को विकसित देशों के मुकाबले एक वित्तीय मंच मिल गया है.


ब्रिक्स नेताओं ने अपने ‘फोर्टालेजा घोषणा-पत्र’ में कहा, “हम मानते हैं कि ब्रिक्स और दक्षिण अमरीकी देशों के बीच ठोस संवाद, एक अंतरस्वतंत्र और अत्यधिक जटिल, वैश्वीकृत दुनिया में शांति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक प्रगति व सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए बहुपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है.”

ब्रिक्स नेताओं ने 23 सूत्री एक कार्ययोजना को मंजूरी दी, जिसे ‘फोर्टालेजा कार्ययोजना’ नाम दिया गया है. इसमें सामूहिक विकास के लिए आर्थिक, विदेश और सुरक्षा नीति पर संवाद का आयोजन शामिल है.

ब्रिक्स का छठा शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है, जब वैश्विक समुदाय इस बात पर मंथन कर रहा है कि वैश्विक वित्तीय संकट, स्थायी राजनीतिक अस्थिरता और टकराव, गैर पारंपरिक खतरों और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं के बीच मजबूत आर्थिक सुधार की चुनौती से कैसे निपटा जाए.

ब्रिक्स नेताओं ने कहा कि बड़ी आर्थिक कार्ययोजनाओं, सुविनियमित वित्तीय बाजारों और खजानों की मजबूत स्थिति ने ईएमडीसी को आम तौर पर और ब्रिक्स को खासतौर पर पिछले कुछ वर्षो के दौरान चुनौतीपूर्ण आर्थिक हालातों द्वारा प्रस्तुत प्रभावों और जोखिमों से बेहतर तरीके से निपटने की शक्ति प्रदान की है.

नेताओं ने कहा, “इस संदर्भ में हम वित्तीय स्थिरता हासिल करने, सतत, मजबूत और समावेशी वृद्धि का समर्थन करने और गुणवत्तापरक रोजगारों को बढ़ावा देने के लिए आपस में और वैश्विक समुदाय के साथ लगातार काम करने की दृढ़ प्रतिबद्धता दोहराते हैं.”

ब्रिक्स नेताओं ने कहा, “ब्रिक्स, हमारे सामूहिक जीडीपी को, मौजूदा नीतियों द्वारा निर्मित विकास पथ से ऊपर उठाकर आगामी पांच वर्षो के दौरान इसमें दो प्रतिशत से अधिक की वृद्धि करने के जी20 के लक्ष्य में योगदान करने के लिए तैयार है.”

ब्रिक्स और अन्य ईएमडीसी के सामने खड़ी वित्तीय तंगी का जिक्र करते हुए नेताओं ने कहा कि न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना से अधोसंरचना और सतत विकास परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी.

नेताओं ने कहा, “अच्छे बैंकिंग सिद्धांतों पर आधारित एनडीबी हमारे देशों के बीच सहयोग बढ़ाएगा और वैश्विक विकास के लिए बहुपक्षीय व क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों के प्रयासों में मददगार होगा.”

विकास बैंक के पास प्रारंभिक पूंजी 50 अरब डॉलर की होगी, जिसे 100 अरब डॉलर बढ़ाया जाएगा. इसमें प्रत्येक देश की बराबर की सहभागिता होगी.

देशों ने एक आरक्षित कोष की भी स्थापना की. आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था नामक इस कोष में 100 अरब डॉलर की पूंजी होगी. यह कोष वित्तीय अस्थिरता से निपटेगा.

देशों ने ‘ब्रिक्स एक्सपोर्ट क्रेडिट एंड गारंटीज एजेंसीज’ के बीच सहयोग पर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया, जो ब्रिक्स देशों के बीच अधिक कारोबारी अवसरों के अनुकूल वातावरण को बढ़ावा देगा.

नेताओं ने सहयोग के नए क्षितिजों पर कहा कि क्षमताओं के दोहन के लिए ब्रिक्स बीमा और पुनर्बीमा बाजार की पर्याप्त संभावना है. उन्होंने कहा, “हम अपने अधिकारियों को इस संबंध में सहयोग के क्षेत्र तलाशने के निर्देश देते हैं.”

नेताओं ने उभरते देशों के निर्विवाद महत्व को जाहिर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की मतदान हिस्सेदारी में चार आवश्यक बदलावों पर जोर दिया.

ब्रिक्स नेताओं ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में 2010 के सुधारों को न लागू किए जाने पर गंभीर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि यह स्थिति आईएमएफ के औचित्य, विश्वसनीयता और प्रभावकता पर नकारात्मक असर डालती है.

नेताओं ने कहा, “आईएमएफ को एक कोटा आधारित संस्थान होना चाहिए. हम आईएमएफ के सदस्यों से आह्वान करते हैं कि कोटा से संबंधित 14वें आम समीक्षा के क्रियान्वयन का रास्ता अविलंब ढूढ़ा जाए.”

नेताओं ने ‘ब्रिक्स सूचना इनफॉर्मेशन शेयरिंग एंड एक्सचेंज प्लेटफार्म’ की स्थापना का भी स्वागत किया, जो कारोबार और निवेश सहयोग की सुविधा प्रदान करेगा.

ब्रिक्स बैंक की स्थापना हो जाने के बाद इसके सदस्य देशों का अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक पर से निर्भरता कम होगी जो एक नये विश्व व्यवस्था का परिचायक होगा. भारत की ओर से इसमें प्रधानमंत्री मोदी ने शिरकत की.

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