‘मानसून ब्रेक’ ? फिर सूखे की आशंका

रायपुर | जेके कर: छत्तीसगढ़ में कम बारिश के कारण में फिर से सूखे की आशंका मंडरा रही है. हालांकि, पूरे छत्तीसगढ़ में 1 जून 2016 से लेकर 1 जुलाई 2016 के बीच 9 फीसदी बारिश ही कम हुई है परन्तु यह बारिश बस्तर संभाग में ज्यादा हुई है तथा अन्य स्थानों पर किसान इसकी बाट जोह रहे हैं. जाहिर है कि केवल बस्तर में हुई बारिश से पूरे छत्तीसगढ़ की आबादी के लिये धान का उत्पादन नहीं किया जा सकता है.

यह कहना गलत न होगा कि बारिश के कम होने से जो संकट कृषि पर आने की संभावना है उसका असर राज्य में खाद्य संकट के रूप में आने वाले दिनों में सामने आ सकता है.

छत्तीसगढ़ में वर्षा की स्थिति
रायपुर स्थित मौसम विज्ञान केन्द्र के अऩुसार बिलासपुर में पिछले साल इस दरम्यान 184.7mm बारिश हुई थी जबकि इस बार यह 100mm ही हुआ है. इस तरह से बिलासपुर में 46 फीसदी वर्षा कम हुई है.

इसी तरह से जांजगीर में 62 फीसदी तथा जशपुर में 42 फीसदी बारिश कम हुई है. वहीं कोरबा में 72 फीसदी तथा कोरिया में 55 फीसदी बारिश कम हुई है.

कवर्धा में इस साल 21 फीसदी, महासमुंद में 38 फीसदी, रायगढ़ में 48 फीसदी तथा राजधानी रायपुर में 31 फीसदी बारिश कम हुई है.

राजनांदगांव में 17 फीसदी तथा सरगुजा में 85 फीसदी बारिश कम हुई है.

छत्तीसगढ़ में 1 जुलाई तक सबसे कम बारिश सरगुजा, कोरबा, जांजगीर तथा कोरिया में हुई है.

बस्तर में बारिश 102 फीसदी, बीजापुर में 52 फीसदी, दंतेवाड़ा में 46 फीसदी, कांकेर में 4 फीसदी तथा दुर्ग में 35 फीसदी एवं धमतरी में 17 फीसदी बारिश ज्यादा हुई है.

बस्तर में पिछले साल 212mm बारिश हुई ती इस साल 429.3mm, दंतेवाड़ा में 188.1mm के स्थान पर 273.9mm तथा कांकेर में 204.1mm के सथान पर 212.8mm बारिश हुई है.

जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में मानसून में ब्रेक जैसे हालात हैं जिससे कई जिलों में धान की बोआई नहीं हो पा रही है.

छत्तीसगढ़ में कहां होते हैं सबसे ज्यादा धान
छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा धान जांजगीर जिले में होता है. साल 2012 में यहां के 248.73 हेक्टेयर भूमि में 710.93 मीट्रिक टन धान हुआ था. कांकेर के 172.36 हेक्टेयर भूमि में 458.56 मीट्रिक टन धान हुआ था.

बिलासपुर के 218.80 हेक्टेयर भूमि में 442.20 मीट्रिक टन, राजनांदगांव के 277.75 हेक्टेयर भूमि में 420.90 मीट्रिक टन तथा रायगढ़ के 228.87 हेक्टेयर भूमि में 290.65 मीट्रिक टन धान हुआ था.

इसी तरह से जशपुर के 180.18 हेक्टेयर भूमि में 273.32 मीट्रिक टन, कोरबा के 109.18 हेक्टेयर भूमि में 156.10 मीट्रिक टन तथा दंतेवाड़ा में 68.15 हेक्टेयर भूमि में 112.03 मीट्रिक टन धान का उत्पादन हुआ था. इनके अलावा अन्य जिलों में भी धान का उत्पादन हुआ. यहां पर छत्तीसगढ़ के किन जिलों में धान का उत्पादन ज्यादा होता है उसे देखने के लिये उपलब्ध ताजा सरकारी आकड़े लिये गये हैं.

कम बारिश की वजह

जानकारों का मानना है कि विकास के नाम पर जंगलों की आख बंद करके कटाई करने से तथा उद्योगों के द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण के कारण राज्य का क्लाइमेट चेंज हो गया है. इसी क्लाइमेट चेंज को पिछले साल छत्तीसगढ़ में कम बारिश होने का प्रमुख कारण माना गया था. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले बरसात में करीब 75 दिन बारिश होती थी जो जब 45-50 दिनों के भीतर सिमट गई है.

राजधानी रायपुर के रविशंकर विश्वविद्यालय के डॉ. शम्स परवेज ने कहा था, “छत्तीसगढ़ समेत सेंट्रल इंडिया में प्रदूषण के कारण हवा में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा दस गुना तक बढ़ गई है, जो सीधे वायुमंडल को गर्म कर रही है. नमी जो बंगाल के खाड़ी या अरब सागर से आ रही है वह बारिश में तब्दील नहीं हो पा रही है. ये नमी दूसरी ओर जा रही है इसके कारण दूर-दराज के इलाके में बारिश हो रही है. स्थानीय स्तर पर खंड वर्षा भी प्रदूषण के कारण ही है.”


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