चिमनी हादसे के 7 साल: दोषी हैं आजाद

कोरबा | अब्दुल असलम: छत्तीसगढ़ के बालको चिमनी हादसे के आज पूरे 7 साल हो गये. इसी साल की जुलाई माह में कोरबा की जिला श्रम न्यायालय ने बालको चिमनी हादसे में इसके पूर्व सीईओ गुंजन गुप्ता तथा इसे बनाने वाली चायनीज कंपनी सेपको के चेयरमैन हाउ जुओजीन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया. सेपको चेयरमैन हाउ जुओजीन पहले ही देश छोड़कर जा चुके हैं तथा पूर्व सीईओ गुंजन गुप्ता बालको की नौकरी छोड़ चुके हैं.

गुंजन गुप्ता तथा चायनीज कंपनी सेपको के चेयरमैन हाउ जुओजीन ने सुप्रीम कोर्ट से भारत से बाहर जाने की अनुमति मांगी थी. गुंजन गुप्ता सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त जमानत दी थी. उनसे तथा सेपको के इंजीनियर ल्यू जॉक्शन एवं वांग क्यूंग से एक-एक करोड़ की बैंक गारंटी जमा करवाई थी. जबकि सेपको के चेयरमैन हाउ जुओजीन के बैंक गारंटी की बात सामने ही नहीं आई है.

गुंजन गुप्ता फिलहाल अमरीका में एस्सार कंपनी में अपनी सेवा दे रहे हैं. उनके देश वापस लौटने पर ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. जबकि सेपको के चेयरमैन चीन में हैं. जानकारों का मानना है कि सेपको के चेयरमैन को वारंट के आधार पर वापस लाना मुश्किल है.

एक समय भोपाल गैस हादसे के लिये जिम्मेदार यूनियन कार्बाइट के प्रमुख वारेन एंडरसन के लिये भी देश में हो हल्ला होता था परन्तु वे आखिर तक भारत वापस नहीं आये तथा उनकी अमरीका में ही मृत्यु हो गई. कहीं बालको की चिमनी बनाने वाली चीनी कंपनी सेपको के चेयरमैन का भी वही हाल न हो.

गौरतलब है कि कोरबा पुलिस ने मामलें की सूचना छत्तीसगढ़ के पुलिस मुख्यालय, रायपुर में दे दी.

उल्लेखनीय है कि देश के हालिया औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना में 40 मजदूरों की मौत चिमनी के ढहने से हुई थी. हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को अब तक न्याय नही मिल पाया है. जस्टिस बक्शी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अब तक कार्यवाही नही हो पायी है. ऐसे में अब न्याय मिलने की आस टूटने लगी है.

23 सितंबर 2009 दिन बुधवार समय 3 बजे ये वो तारीख है जिसे भला कोई कैसे भूल सकता है. आसमान में छाये बादल कहीं-कहीं गरज के साथ बरस रहे थे. इसी दौरान खबर मिली कि वेदांता-बालको पॉवर प्लांट विस्तार परियोजना 1200 मेगावाट की दो चिमनियों में से एक निर्माणधीन चिमनी जमीनदोंज हो गई है. 225 मीटर ऊंची चिमनी उस वक्त गिरी जब चिमनी के ऊपरी भाग में निर्माण कार्य चल रहा था.

बारिश के कारण निर्माण कार्य में लगे सैकडों मजदूर कोई चिमनी की गुमटी में थे कोई आसपास बने शेड में छिपे थे. जैसे ही चिमनी गिरी मजदूरों में अफरा-तफरी का माहौल था. इससे पहले उन बेगुनाह मजदूरों की चीख-पुकार सुन पाता तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 40 से भी ज्यादा मजदूर असमय मौत की नींद में सो चुके थे. चारों तरफ मलबा व खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. जिसने भी इस हृदय विदारक मंजर को देखा उसका दिल दहल उठा.

फिर शुरू हुआ मलबा हटाने और लाश निकालने रेसक्यू ऑॅपरेशन जो दस दिनों से ऊपर चला. इस मामले में कुल 17 आरोपी बनाये गये. जिसमें कोरबा पुलिस द्वारा 12 आरोपियों को गिरफ्तारी हुई है 5 आरोपी अब तक फरार है. वहीं मृतक के परिजनों को इन 7 सालों में मुआवजा तो मिला पर किसी भई बेवा को नौकरी नहीं मिली. हां, उन्हें भी ठेका मजदूर की नौकरी जरूर मिली.

उस समय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित विभिन्न पार्टियों के नेताओं का दौरा हुआ. श्रमिक संगठन हो या युवा कांग्रेस सब ने एक राग से मजदूरों की मौत के मामले में राजनीति रोटी सेंकी. राज्य सरकार ने हादसे की जांच के लिये न्यायिक जांच आयोग का गठन किया. जस्टिस संदीप बख्शी को अध्यक्ष बनाया गया.

सुनवाई 34 महिने में पूरी हुई. आयोग ने सरकार को जांच रिपोर्ट 9 अगस्त 2012 को सौपी. 122 पेज की रिपोट में आयोग ने बालको, चीनी ठेका कंपनी सेपको, ठेका कंपनी जीडीसीएल, नगर पालिका निगम, नगर तथा ग्राम निवेश विभाग, श्रम विभाग के तत्कालीन अधिकारियों की लापरवाही तथा उदासीनता को जिम्मेदार बताया. अब इस मामले को लेकर बालको हाईकोर्ट से स्टे ले लिया हैं और कोई भी फैसले से पहले उनकी बात सुनने की अपील की हैं.

इधर, बालको चिमनी हादसे पर भी खूब सियासत हुई. कांग्रेस नेता और पूर्व केन्दीय मंत्री डॉ चरण दास महंत ने ठेका कंपनी को हत्यारिन कंपनी बताया.

आयोग के जांच रिपोर्ट आने के पहले ही बालको ने नई चिमनी का अवैध रूप से निर्माण कर लिया है. बिजली बनाना शुरू कर दिया है. बालको ने जांच रिपोर्ट का इंतजार करने की बजाय आनन फानन में ध्वस्त चिमनी के स्थान पर अवैध रूप से चिमनी का निर्माण कर लिया है. चिमनी निर्माण के लिए नगर पालिक निगम, टाउन एंड कंट्री प्लांनिंग और वन विभाग से एनओसी नही ली गई है. निगम ने अवैध निर्माण के विरोध में बालको थाने में शिकायत दर्ज कराई है. बालको चिमनी हादसे में मारे गये मजदूरों के परिजनों ने दोषियों को सजा देने की बजाये मामले को दबाने का आरोप लगाया हैं.

इधर, बालको प्रबंधन ने मृतक के परिजनों को मुआवजा बांटकर अपने कर्त्वय की इतिश्री कर ली है. लेकिन बाहर राज्यों के मजदूरों के परिजनों को आज तक नौकरी नही दिया है. बालको कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन हेड बीके श्रीवास्तव की माने तो सभी मृतकों के परिजनों को मुआवजा दे दिया गया और एक मजदूर की पत्नी को नौकरी दे दी गई है. बाहर के मजदूर नौकरी के लिए नही आये. सुरक्षा पर जोर देने के बावजूद हादसे लगातार जारी है,

वहीं, वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल को बालको हादसे में मारे गये 40 मजदूरों की 7 साल बाद याद आई. मीडिया के सवालों से बचने के लिये बिना मीडिया से मिले, कांग्रेस के ‘गो बैक अनिल अग्रवाल’ के काले झण्डे के बीच वे रवाना हो गये.

एक नजर चिमनी हादसे में मारे गये मजदूरो पर
प्रदेश ………………………….जिला ……………………..मृतको कि संख्या

बिहार ………………………..छपरा ………………………….11
बिहार ………………………..सिवान ………………………..07
झारखंड ……………………..सिमडेगा ……………………….11
झारखंड ……………………..गढ़वा …………………………..03
मध्यप्रदेश …………………….उमरिया ………………………..07
छत्तीसगढ़ …………………….कोरबा …………………………02

लगभग 35 माह तक चली सुनवाई में आयोग का कार्यकाल 10 बार बढ़ा. 6 बिन्दुओं पर की गई आयोग की सुनवाई में श्रमिक नेता, तत्कालीन कलेक्टर अशोक अग्रवाल, तत्कालीन सहायक श्रम आयुक्त सत्य प्रकाश वर्मा, सेपको के प्रोजेक्ट मैनेजर वू छूनान, ठेका कंपनी जीडीसीएल के प्रोजेक्ट मैनेजर मनोज शर्मा, तत्कालीन उप संचालक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा रज्जू भोई, बालको के प्रोजेक्ट इंचार्ज जेके मुखर्जी, तत्कालीन एसडीएम रामजी साहू और बालको के तात्कालीकन सीईओ गुंजन गुप्ता बयान दर्ज कराने आयोग के समक्ष उपस्थित हुये.

बख्शी आयोग की सुनवाई लगातार तीन साल चलने के बाद आयोग ने रिपोर्ट को सरकार को सौंप दिया था. रिपोर्ट में आरोपियों के नाम का खुलासा है लेकिन अब तक मामले में सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इधर मजदूरों के परिजनों के न्याय की आस में आंखे बुढ़ी होती जा रही है. नाम के तौर पर बालको ने मृतकों के परिजनों को 13-13 लाख रूपयें मुआवजें की राशि देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है. जबकि मृतकों के परिजनों के मुताबिक उनको 25 लाख रूपयें मुआवजा और नौकरी की बात कहीं गई थी. बालकों ने 40 मृतकों के परिजनों में से एक को नौकरी भी दी है लेकिन वो नौकरी भी सीधे बालको कम्पनी में नहीं बल्कि एक निजी ठेका कंपनी के अधीन दी है जिसमें नौकरी करने वाली मृतक भोला सिंह की पत्नि को बतौर पारश्रमिक दर पांच हजार रूपयें ही मिलते है.

7 साल बीतने के बाद भी हादसें में मरने वाले मजदूरों के परिजन न्याय का इंतजार कर रहे है जबकि दोषी खुली हवा में सांस ले रहे है. देखना होगा न्याय के मंदिर से पीडि़तों को राहत के लिये और कितना इंतजार करना होगा!

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