रह गई कसर

दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह द्वारा वर्ष 2014-15 के लिए पेश किए गए बजट में कुछ बेहतर प्रावधानों के अलावा कोई विशेष बात नहीं है. विकास की बातें तो बजट का एक अनिवार्य हिस्सा होती ही हैं लिहाजा इस बजट में भी विकास पर विशेषकर कृषि एवं शिक्षा पर खासी धनराशि की व्यवस्था की गई है.

कई अर्थों में इसे हम विकास-परक बजट कह सकते हैं लेकिन इस बजट में आम आदमी को कोई फौरी राहत नहीं है अलबत्ता किसानों, उद्योगपतियों, व्यवसायियों का अच्छा ध्यान रखा गया है. राज्य की जनता को सिर्फ इतनी राहत है कि उस पर किसी नए कर का बोझ नहीं लादा गया है. लेकिन महंगाई को कम करने के कोई उपाय भी नहीं किए गए हैं.

राज्य सरकार चाहती तो कम से कम रसोई गैस एवं पेट्रोल-डीजल पर वैट को घटाकर उपभोक्ताओं को सीधी राहत पहुंचा सकती थी किंतु ऐसा कुछ नहीं किया गया. अलबत्ता विकास की मूल अवधारणा को ध्यान में रखते हुए जो बजटीय प्रावधान किए गए हैं, उससे उम्मीद बंधती है कि विकास के जिस मॉडल की परिकल्पना की गई है, उस दिशा में राज्य एक कदम निश्चितत: आगे बढ़ेगा.

सरकार ने इस बार कृषि के लिए कोई अलग बजट पेश नहीं किया. कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों के लिए 8459 करोड़ की राशि रखी गई. सरकार ने कृषकों को उस मायने में राहत देने की कोशिश की है, कि उन्हें अब कृषि ऋण पर कोई ब्याज नहीं देना होगा. पहले उन्हें 3 प्रतिशत ब्याज दर का भुगतान करना पड़ता था. यह बड़ी राहत है.

इसी तरह चुनाव घोषणा-पत्र में किए गए वायदे के अनुसार धान पर बोनस 300 रु. प्रति क्विंटल कर दिया गया है जबकि यह राशि 270 रु. थी. जीडीपी में कृषि का योगदान 22 प्रतिशत है पर आश्चर्य की बात है कि कृषि रकबे के विस्तार की कोई सोच नहीं है जबकि राज्य में कृषि का रकबा निरंतर घट रहा है. सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए.

बजट के अनुसार राज्य की वित्तीय स्थिति बेहतर है. यह भी सुखद है कि राज्य सरकार की कोशिशों की वजह से सरकार का वित्तीय प्रबंधन कई राज्यों से बेहतर है. इसमें भी कोई शक नहीं कि राज्य बनने के बाद 12 वर्षों में आधारभूत संरचनाओं के विकास में जबर्दस्त प्रगति हुई है लेकिन उद्योग एवं रोजगार के मामले में स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है.

सरकार ने औद्योगिक प्रगति का ढिंढोरा तो बहुत पीटा, हजारों करोड़ के एमओयू हस्ताक्षरित हुए किंतु प्रगति असंतोषजनक रही. सरकार की नीतियों की वजह से उद्योग भारी संकटों के दौर से गुजर रहा है. इसे ध्यान में रखते हुए इस बार बजट में उद्योगों को खासकर इस्पात उद्योग को विभिन्न तरीकों से राहत प्रदान की गई है. इससे उद्योग सेक्टर में बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है.

छत्तीसगढ़ की 33 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है. आजादी के 65 सालों के बावजूद अभी भी वे जीवन के अंधेरे से जूझ रहे हैं और दारुण स्थिति में हैं. बजट में यद्यपि उनकी शिक्षा सुविधाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है पर वन ग्रामों के विकास की किसी समुन्नत योजना का जिक्र नहीं है.

बजट में राजनांदगांव में खेल विश्वविद्यालय की स्थापना खेलों के विकास के लिए एक जरूरी कदम के रूप में है. लोककला संगीत अकादमी की स्थापना काफी पहले की जानी चाहिए थी. बहरहाल इस बार इसे बजट में जगह मिली है. इससे कला और संस्कृति के क्षेत्र का एक बड़ा अभाव दूर होगा. कुल मिलाकर बजट मिश्रित रूप से सामने आया जो उम्मीदें भी जगाता है किंतु अभावों की टीस भी देता है.

* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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