महापौर ही क्यों !

कनक तिवारी
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में तीन शहरों के महापौर मैदान में हैं. रायपुर, बिलासपुर और कोरबा नगरपालिक निगमों के महापौरों किरणमयी नायक, वाणी राव और जोगेश लांबा को रायपुर दक्षिण, बिलासपुर और कोरबा से विधानसभा का चुनाव लड़ने के टिकट दिए गए हैं. दोनों महिला उम्मीदवार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और लांबा भाजपा के उम्मीदवार हैं.

रायपुर और बिलासपुर के मौज़ूदा विधायक रमन सरकार के शक्तिशाली मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और अमर अग्रवाल हैं. उन्हें परास्त करने के लिए कांग्रेस को ऐसे पुरुष उम्मीदवार नहीं मिले जो किसी लाभ के पद पर नहीं हों.


यही हाल कोरबा के कांग्रेस विधायक जयसिंह अग्रवाल को हराने के नाम पर लांबा की लॉटरी खोलता है. इन नामांकनों को जातिवाद के चश्मे से तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन जीतने की संभावनाओं के अतिरिक्त और भी कई कारण होंगे जो पार्टियों की चुनाव समितियों की दिमागी अंतड़ियों में हो सकते हैं.

सबसे बड़ा सैद्धांतिक सवाल यह है कि कोई दो तीन वर्ष पहले महापौरों को जनता ने प्रत्यक्ष मतदान के ज़रिए पांच वर्षों के लिए चुना है. वे अपनी ज़ि़म्मेदारी को छोड़ने या दोहरा करने के लिए किस तरह न्यायसंगत ठहरते हैं. महापौर का पद राजनीतिक ज्ञानशास्त्र में विधायक के पद से कमतर नहीं है.

महापौर एक प्रशासक होता है जिसे नगरपालिक अधिनियम की धारा 66 तथा 67 के अंतर्गत दिए गए उत्तरदायित्वों के सहित अन्य और कई वैधानिक कृत्य करने होते हैं. नगरपालिक निगमों को संविधान के 74 वें संशोधन के द्वारा संवैधानिक दर्ज़ा भी दे दिया गया. स्वायत्तशासी संस्थाओं के चुनाव छह महीनों की तैयारी के नाम पर लिए गए समय को छोड़कर अधिनियमित समय के अंदर कराना ही होता है.

महापौर विधायन का विशेषज्ञ नहीं समझा जाता. वह क्रियान्वयनकर्ता होता है. इसके विपरीत विधायक को संवैधानिक पद पर रहते हुए विधानसभा में विधेयकों को पारित कराने की ज़िम्मेदारी होती है. बहुमत की पार्टी में विजयी होने पर वह मंत्रिपरिषद में शामिल किया जा सकता है.

भारतीय लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी में अपने अनुभवी और योग्य कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक क्षमता की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. मंत्रिपरिषद के सदस्य अमूमन लॉटरी के इनाम की तरह पद हथियाते हैं. इसी तरह निर्वाचित मुख्यमंत्री विभागों का वितरण योग्यता नहीं बल्कि राजनीतिक जमावट के आधार पर करते हैं.

मिडिल फेल विधायक उच्च शिक्षा मंत्री हो जाते हैं. अभियुक्त गृह मंत्री और शराब ठेकेदार संस्कृति मंत्री. महापौर भी आरक्षण आदि की लॉटरी के खुलते चुनाव जीत जाते हैं जबकि उनकी योग्यता नहीं होती. देश में नौकरशाही इसीलिए राजनेताओं को धता बता रही है. एक युवा कलेक्टर नगरपालिक निगम के प्रतिनिधियों को कभी भी ठेंगा दिखा देता है. उनका निर्वाचित कार्यकाल हर वक्त अनिश्चय के घेरे में होता है.

यदि तीनों महापौर चुनाव जीत गए तो उनके महापौर पद का क्या होगा. वे चाहें तो दोनों पदों पर रहें या महापौर पद से इस्तीफा दें. विधायक के रूप में तो राज्य की सत्ता की नकेल उनके हाथ में होती है. दुर्ग में सरोज पांडे ने महापौर, विधायक और सांसद के तीनों पद कुछ समय के लिए साथ-साथ हथिया लिए थे. यह लोकतंत्र का मज़ाक था और भाजपा के कार्यकर्ताओं का भी. जीतने की संभावना के चलते भाजपा के नेतृत्व ने बाकी कार्यकर्ताओं को उभरने का मौका ही नहीं दिया. यही हाल कांग्रेस का भी है.

निष्कर्ष तो यही है कि अमर अग्रवाल और बृजमोहन अग्रवाल को कांग्रेस के कोई दूसरे उम्मीदवार हरा ही नहीं सकते थे. जयसिंह अग्रवाल भी बाकी भाजपाई उम्मीदवारों के मुकाबले अपराजेय लग रहे होंगे. राजनीति में यदि वंशवाद की आलोचना होती है तो पदों के एकाधिकारवाद की भी आलोचना होनी चाहिए.

तीनों महापौरों के चुनाव के वक्त कई कार्यकर्ताओं को पार्टियों ने आश्वासन दिए होंगे कि विधायकी का टिकट उनको मिलेगा. कई कार्यकर्ता बीसियों बरस से पार्टी की सेवा कर रहे हैं. लेकिन रायपुर और बिलासपुर नगर निगमों के लिए महिलाओं का आरक्षण होने से उनका पत्ता अपने आप कट गया. उनकी उम्मीदें विधायकी की टिकटों पर पूरी तौर पर रही होंगी. उनकेे नाम पैनल में जोड़े भी गए.

यह संभावना भी बनाई गई होगी कि धाकड़ मंत्री अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र में कैसे उलझाकर रखे जाएं. यह भी संभावना रखी गई कि महापौर यदि हार भी जाएंगे तो वे राजनीति के खेल से आउट नहीं होंगे.

‘कौन बनेगा महाकरोड़पति‘ के टीवी शो में अमिताभ बच्चन 6.40 लाख रुपए जीतने वाले प्रतिभागी से कहते हैं कि वह 12.50 लाख रुपए वाले प्रश्न का ज़रूर जवाब दें. उसे गलत उत्तर देने पर भी कोई घाटा नहीं होगा. महापौर पद से विधायक बनने वाले पद की आशा में तीनों उम्मीदवार भी अमिताभ बच्चन वाला 12.50 लाख रुपए का प्रश्न ही तो हल कर रहे हैं.

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