जोगी की दूर की कौड़ी

दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद प्रदेश के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की एक वर्ष के लिए राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा दरअसल उनकी कूटनीतिक चाल थी, जो अंतत: सफल रही. वे जानते थे, लोकसभा चुनाव में पार्टी को उनकी जरूरत पड़ेगी. इसलिए उन्होंने राजनीति की शतरंज की बिसात पर अपने मोहरे इस ढंग से आगे बढ़ाए कि बाजी जीती जा सके. ठीक ऐसा ही हुआ.

नवम्बर 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय से खुद को बेहद दुखी एवं मायूस दिखाते हुए उन्होंने एक वर्ष के लिए सक्रिय राजनीति से दूर रहकर भजन-कीर्तन में व्यस्त रहने का एलान किया था. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपने लिए एक पतली सी गली जरूर छोड़ दी ताकि वक्त आने पर उससे बाहर निकला जा सके. संन्यास की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेते रहेंगे.

जाहिर है, राजनीति से उनका यह अर्धसंन्यास था, जिसका वक्त आने पर टूटना तय था. जैसी कि उन्हें उम्मीद थी, यह 4 माह के भीतर ही टूट गया. कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें महासमुंद संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लडऩे का फरमान सुना दिया है. जोगी की शतरंजी चालों का यह कमाल था. महासमुंद से ही वे लडऩा चाहते थे. उनकी मुराद पूरी हुई. उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे और सभी ठिकाने पर लगे.

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अभी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. यह दौर गत दो वर्षों से अधिक तीव्र हुआ है. खासकर भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के लिए नामांकित होने के बाद पार्टी लगातार हाशिये की ओर बढ़ रही है. ऐसे वक्त लोकसभा चुनाव ने मुसीबतें और भी बढ़ा दी हैं. आलाकमान के बड़े नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद गिरता ग्राफ थम नहीं पा रहा है. इस स्थिति में कांग्रेस के लिए लोकसभा की एक-एक सीट कीमती है. इसलिए जीत सकने लायक सीटों एवं उम्मीदवारों को खोने का जोखिम वह कैसे उठा सकती है? जोगी ने इस स्थिति का फायदा उठाया.

छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों पर घोषित उम्मीदवारों की बात करें तो अजीत जोगी अकेले ऐसे प्रत्याशी हैं, जिनकी जीत का शत-प्रतिशत दावा किया जा सकता है, भले ही मुकाबले में भाजपा की ओर से कोई भी क्यों न हो. यानी राज्य की कम से कम एक सीट तो कांग्रेस के लिए सुनिश्चित मानी जा सकती है. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक मात्र सीट कोरबा जीती थी, जहां से केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत विजयी हुए थे. इस बार भी वे कोरबा से ही लड़ रहे हैं. यदि उनकी जीत की संभावना भी शत-प्रतिशत मानें तो इस बार चुनाव में कांग्रेस की सीटों में इजाफा तय है. राज्य की कोरबा और महासमुंद के अलावा और भी सीटें हैं जहां जीत की क्षमता रखने वाले उम्मीदवारों को टिकिट दी गई है. यानी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सीटों का बढऩा तय प्रतीत होता है.

बहरहाल, बात जोगी के सियासी गणित की है. चूंकि वे जानते थे कि पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव बहुत अहंम् है इसलिए वे अपने लिए बेहतर सौदेबाजी कर सकते हैं. संन्यास की घोषणा इसी सौदेबाजी का एक हिस्सा थी. ऐसा करके उन्होंने हाईकमान को झुकने के लिए मजबूर कर दिया.

उन्होंने कहा था कि यदि सोनिया गांधी उन्हें चुनाव लडऩे के लिए कहेंगी तो वे ना नहीं कर पाएंगे. लोकसभा की टिकिट लेकर रायपुर लौटे जोगी ने मीडिया से कहा वे सोनिया गांधी के निर्देश पर चुनाव लड़ रहे हैं. यानी यह जताना चाहते थे कि वे अपने संन्यास के फैसले पर अटल थे लेकिन चूंकि सोनिया गांधी का निर्देश है, इसलिए ‘मजबूरी’ में वे उनकी पेशकश को स्वीकार कर रहे हैं. ऐसा आभास होकर उन्होंने कांग्रेसाध्यक्ष से अपनी नजदीकियों का इजहार तो किया ही, लगे हाथ यह भी साबित कर दिया कि प्रदेश की राजनीति में उनकी अहमियत के क्या मायने हैं और केन्द्रीय स्तर पर उनकी पूछ परख क्यों होती है.

प्रदेश की 11 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में प्रत्यक्ष रूप से जोगी की कोई भूमिका नहीं रही. अलबत्ता पर्दे के पीछे वे जरूर सक्रिय रहे. उम्मीदवारों का चयन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव, पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं राज्य के वरिष्ठतम नेता मोतीलाल वोरा तथा केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत की सिफारिशों पर आधारित था. लेकिन रायपुर टिकट प्रकरण में जोगी के हस्तक्षेप से इंकार नही किया जा सकता.

पहले छाया वर्मा की उम्मीदवारी की अधिकृत घोषणा और दो दिन के भीतर ही उन्हें हटाकर सत्यनारायण शर्मा के नाम का एलान आकस्मिक नहीं था. दरअसल इस परिवर्तन के पीछे योजनाकार जोगी थे जिसमें उन्हें मोतीलाल वोरा का भी समर्थन मिला. यह अलग बात है कि प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने इस चाल को नाकाम करते हुए छाया वर्मा को पुन: टिकिट दिला दी.

नि:संदेह अजीत जोगी ने हाईकमान से अनुकूल निर्णय करवा लिए. संगठन खेमे की कोशिश थी, जोगी बिलासपुर से चुनाव लड़े किन्तु जोगी महासमुंद या कांकेर अपने लिए अधिक उपयुक्त मानते थे. करूणा शुक्ला का कांग्रेस प्रवेश एवं बिलासपुर से उन्हें टिकिट मिलना सायास था. करूणा शुक्ला की वजह से बिलासपुर से जोगी को छुटटी मिल गई. अब उनका मिशन था महासमुंद से स्व. विद्याचरण शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे की दावेदारी को खत्म करना.

प्रतिभा पांडे जीत की क्षमता रखने वाली उम्मीदवार नहीं थी. केवल विद्याचरण शुक्ल की शहादत से उन्हें इतने सहानुभूति वोट नहीं मिल सकते थे, जो जीत की नींव रख सके. यही तर्क जोगी के काम आया. हाईकमान ने प्रतिभा पांडे के नाम को अंतत: खारिज कर दिया गया. इससे जोगी की राह आसान हो गई.

अजीत जोगी ने सन् 2004 का लोकसभा चुनाव महासमुंद से ही लड़ा था. उन्होंने विद्याचरण शुक्ल को एक लाख अठारह हजार से अधिक वोटों से हराया जो भाजपा की टिकिट पर लड़ रहे थे. भारी भरकम वोटों से जीते गए इस चुनाव ने जोगी को अजेय बना दिया. हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के चंदूलाल साहू ने 1 लाख 8 हजार के अंतर को न केवल पाटा बल्कि कांग्रेस के प्रत्याशी मोतीलाल साहू के खिलाफ 50 हजार से अधिक वोटों से लीड ले ली. अब जोगी के सामने बड़ी चुनौती इस सीट को कांग्रेस की झोली में वोटों के उतने ही बडे अंतर से डालना है जैसा कि सन् 2004 में उन्होंने कर दिखाया था.

अपनी राजनीतिक कलाबाजियों के चलते जोगी ने बहुत सफाई से अपने लिए रास्ता बना लिया है. विधानसभा का चुनाव न लडक़र उन्होंने अपने बेटे अमित की राजनीति में नए रंग भर दिए. उनकी पत्नी विधायक हैं ही और अब वे खुद संसद में पहुंचना चाहते हैं. परिवार को प्रदेश की राजनीति में स्थापित करने का कम से कम एक मकसद तो उनका पूरा हो गया है. अगर वे जीत गए, जिसकी संभावना प्रबल है तो यह उनके लिए अपार संतोष की बात होगी.
*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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