छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ मुठभेड़ के मामलों में क्या सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कर रहा है? कम से कम पुलिस माओवादियों के साथ मुठभेड़ में शामिल जवानों को प्रोत्साहित करने के लिये जो तरीके अपना रही है, उससे तो यही साबित हो रहा है.

बस्तर में पिछले कुछ महीनों में माओवादियों के साथ होने वाली मुठभेड़ के बाद पुलिस के जवानों को न केवल नगदी इनाम दिये जा रहे हैं, बल्कि उन्हें गैलेंट्री अवार्ड और आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी दिया जा रहा है.

पुलिस मुठभेड़ को लेकर 23 सितंबर 2014 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पब्लिक यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ यानी पीयूसीएल की याचिका की सुनवाई के बाद एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया था. लेकिन छत्तीसगढ़ में ये निर्देश केवल फाइलों में क़ैद हो कर रह गये हैं.

ये थे निर्देश

  • हर पुलिस मुठभेड़ की प्राथमिकी (एफ़आईआर) दर्ज़ करना अनिवार्य होगा.
  • हर मुठभेड़ की जांच सीआईडी या अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए.
  • पुलिस मुठभेड़ की जांच की प्रगति रिपोर्ट हर छह माह में संबंधित राज्य मानवाधिकार आयोग या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजनी होगी.
  • जांच खत्म होने तक मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा.
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176 के तहत हर मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट से जांच अनिवार्य होगी.
  • मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट जांच को तेज़ी से पूरा किया जाए और अगर कोई पुलिसकर्मी फ़र्जी मुठभेड़ में शामिल पाया जाए तो उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाए.
  • पुलिसकर्मियों को अपराधियों के बारे में मिली सूचना को रिकॉर्ड कराना होगा.
  • मुठभेड़ के बाद पुलिसकर्मियों को अपने हथियार और गोलियां जमा करनी होंगी.

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