माओवादियों से वार्ता की ज़रूरत

दिवाकर मुक्तिबोध
क्या छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादी संगठनों के सफाए की घड़ी नजदीक आ गई है? क्या माओवादी कमांडरों को आंध्रप्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ से भी पलायन करना पडेगा? क्या छत्तीसगढ़ में पुलिस के दबाव की वजह से माओवादी गतिविधियां न्यूनतम स्तर पर आ जाएंगी? क्या माओवाद प्रभावित बस्तर एवं सरगुजा में विकास कार्यों में तेजी आएगी?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो माओवाद मोर्चे पर राज्य सरकार की गंभीरता एवं उसे केन्द्र से मिलने वाली मदद के फलस्वरूप उभरकर सामने आंए हैं. नई दिल्ली में 9 जून को केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री राजनाथ सिंह एवं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बीच इस मुद्दे पर दीर्घ मंत्रणा हुई. राज्य सरकार के अनुरोध पर गृहमंत्री ने 10 अतिरिक्त बटालियनों के साथ दो हेलीकाफ्टर एवं विकास कार्यों में मदद के लिए दो हजार हुनरमंद कर्मचारियों की सेवांए भी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है.

ऐसा पहली बार है जब राज्य को विकास कार्यों की देखरेख के लिए कुशल मानव संसाधन भी उपलब्ध होंगे. मुख्यमंत्री ने अगले दिन 10 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी राज्य के मामलों पर बातचीत की तथा उनसे माओवादी इलाको के लिए विशेष पैकेज के साथ-साथ बस्तर में युनिर्वसिटी एवं सरगुजा में पावर प्लांट की स्वीकृति मांगी.

यानी अब मुख्यमंत्री का पूरा जोर माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने के साथ-साथ माओवादियों का नाश करना है. वे अपने अभियान में कितने सफल हो पाते हैं यह भविष्य की बात है लेकिन अब केन्द्र में भी पार्टी की सरकार होने से उन्हें उम्मीद है कि राज्य को अगले कुछ सालों में माओवादियों से मुक्त कर लेंगे.

दरअसल पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की तरह ही माओवाद-आतंकवाद का उन्मूलन भाजपा सरकार की उच्च प्राथमिकता में है. 9 जून को संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि राज्य सरकारों से परामर्श करके राष्ट्रीय योजना तैयार की जाएगी ताकि वामपंथी चरमपंथ से उत्पन्न चुनौतियों एवं साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सके.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाओं में पार्टी के इस संकल्प को दोहराया है. पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में भी इसका उल्लेख है. यह अच्छी बात है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद गृहमंत्री ने इस दिशा में पहल की तथा अपने विभाग के उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री रमन सिंह से बातचीत की. यद्यपि जैसा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में कहा गया है, माओवाद, आतंकवाद की समस्या से निपटने राष्ट्रीय नीति तैयार की जाएगी लेकिन माओवादी हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में फौरन कार्रवाई शुरू कर दी गई है.

राज्य सरकार को अर्द्ध सैनिक बलों की अतिरिक्त बटालियनों, हेलीकाप्टर एवं अन्य संसाधन उपलब्ध कराने का फैसला इसका प्रमाण है. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा भी है कि बस्तर में वामपंथी उग्रवाद के समूल नाश के लिए सुरक्षा और विकास की छत्तीसगढ़ की नीति को केन्द्र सरकार का पूरा समर्थन है. यानी माओवाद से निपटने के लिए राज्य सरकार को फ्री हैंड दे दिया गया है.

राज्य शासन ने 16 जून को इस सिलसिले में चर्चा के लिए राजधानी रायपुर में यूनिफाइड कमांड की बैठक बुलाई है, जिसमें पुलिस के आला अफसरों के अलावा राज्य में तैनात अर्द्धसैनिक बलों के उच्चाधिकारी भी भाग लेंगे. देश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में क्या यह माना जाए कि केन्द्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार माओवादी मुददे पर ज्यादा गंभीर हुई है?

यों पूर्ववर्ती कांग्रेस गठबंधन सरकार ने माओवाद प्रभावित राज्यों को मदद के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया बल्कि सरकार ने इसे राष्ट्रीय समस्या मानते हुए गंभीर प्रयास किए और तदनुसार नीतियां भी बनाईं लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि वह माओवादियों के खिलाफ सख्ती से पेश नहीं आती और उसमें इच्छा शक्ति का अभाव दिखता है.

इस सन्दर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि माओवाद प्रभावित अन्य राज्यों बिहार, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, झारखंड आदि की तुलना में बीते वर्षों में माओवादी वारदातें छत्तीसगढ़ में अधिक हुई है और उसमें बड़ी संख्या में पुलिस जवानों के अलावा नागरिक मारे गए हैं. पिछले वर्ष मई में जीरम घाटी में कांग्रेस काफिले पर माओवादी हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला था जिसमे विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा, नंदकुमार पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं सहित 31 लोग मारे गए थे.

यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ माओवादियों की अत्यंत सुरक्षित शरणस्थली है. राज्य में सीपीआई माओवादी से जुड़े 40 से अधिक सक्रिय संगठन है, जिसमें करीब हजारों सशस्त्र माओवादी हैं. बस्तर में इतनी बड़ी संख्या में उनकी उपस्थिति और हिंसात्मक गतिविधियां चिंताजनक है. माओवादी हिंसा के सन्दर्भ में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ठीक ही कहा है कि अगर देश से उग्रवाद को समाप्त करना है तो उसके लिए सबसे बड़ी लड़ाई बस्तर में लड़नी होगी.

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर हम बस्तर के सभी हिस्सों में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, रोजगार और अधोसंरचना का जाल फैलाने में कामयाब हो गए तो माओवादी आम लोगों को गुमराह नहीं कर पाएंगे और इस समस्या का हल निकाला जा सकेगा. माओवादी मुददे पर केन्द्र एवं राज्य की नीति माओवादियों को खदेड़ने अथवा मार गिराने के साथ-साथ क्षेत्र के विकास की भी है. जहां तक माओवादियों को पीछे ढकेलने या बस्तर से हकालने का सवाल है, पुलिस बुरी तरह नाकाम रही है. चूंकि क्षेत्र माओवादियों से खाली नहीं कराए जा सके इसलिए वहां विकास कार्य भी नहीं हुए.

माओवादियों ने ऐसी कोशिशों पर तेज हमले किए तथा भय व आतंक का ऐसा वातावरण निर्मित किया कि शासकीय-अशासकीय विकास एजेंसियों ने तौबा कर ली. बस्तर में अनेक परियोजनाएं इसीलिए वर्षों से लटकी हुई हैं अथवा आधी-अधूरी हैं. केन्द के समर्थन से उत्साहित रमनसिंह अब माओवादियों पर चौतरफा हमले के साथ-साथ विकास कार्यों को आगे बढ़ाना चाहते हैं लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? सड़कों पुल-पुलियों, स्कूल भवनों एवं अन्य सिविल कार्यों के लिए दो हजार दक्ष इंजीनियरों की भर्ती से विकास के पहिए घूमने लग जाएंगे? क्या वे माओवादी खौफ से आजाद रहेंगे? क्या इस बात की कोई गारंटी है कि माओवादी नवनिर्मित सड़कें, स्कूल भवन पुन: ध्वस्त नहीं करेंगे जैसा कि वे करते रहे हैं? क्या बस्तर से माओवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने का मूलमंत्र शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार की उपलब्धता है? क्या इससे जागृति फैलेगी और आदिवासी माओवादियों को पनाह देना बंद कर देंगे? क्या गांव-देहातों से उनका खौफ जाता रहेगा? और क्या अर्द्धसैनिक बलों की छापामार कार्रवाई माओवादियों को बस्तर से पलायन के लिए मजबूर कर देगी?

ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनमें से कुछ का जवाब हां या ना में है. दरअसल केन्द्र एवं राज्य सरकार के स्तर पर माओवाद के खात्मे के लिए हर युक्ति अपनायी जा चुकी है. बस्तर में अर्द्धसैनिक बलों की भारी तैनाती, अत्याधुनिक हथियार, संचार की नवीनतम सुविधाएं, सुरक्षा बलों की देखरेख में विकास कार्य, सघन गश्त और अनेक मुडभेड़ों में माओवादियों के मारे जाने अथवा उनकी गिरफ्तारी के बावजूद बस्तर में उनकी गतिविधियां कम होने के बजाए बढ़ी ही हैं. इसीलिए केवल सर्वांगीण विकास समस्या का एकमात्र हल नहीं है. फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं आधारभूत संरचनाओं के लिए लंबा वक्त चाहिए.

जनजागृति एक दिन में नहीं आएगी जिसके डर से माओवादी भाग खड़े होंगे. दरअसल पहली जरुरत है आदिवासियों को उनका हक देने की, उन्हे शोषण मुक्त करने की, उन्हें मुख्यधारा में लाने की, उनकी पहचान कायम रखने की, उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं से छेड़छाड़ न करने की और उन्हें उनके अधिकारों का अहसास दिलाने की. इसके साथ ही उनके गांवों, कस्बों का सम्यक विकास.

विकास कार्यों के अलावा बड़ी जरुरत है माओवादियों के साथ वार्ता के लिए वातावरण बनाने की. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह माओवादियों के साथ वार्ता की वकालत तो करते हैं लेकिन वातावरण बनाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाते. यह तो तय है विकास और अर्द्धसैनिक बलों के दबाव के बावजूद बस्तर में माओवादी हिंसा नहीं रूकेगी. अत: जब तक इन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम नहीं होगा, समस्या का निदान भी संभव नहीं है. केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार माओवाद के खिलाफ कितनी भी फूल-प्रूफ रणनीति क्यों न बनाए, वार्ता के पक्ष की उपेक्षा भारी पड़ेगी. अत: जरूरी है देश के प्रखर माओवादी विचारकों को इस मुहिम से जोड़ा जाए. चूंकि छत्तीसगढ़ सर्वाधिक माओवाद प्रभावित राज्य है अत: इस दिशा में उसे ही पहल करनी चाहिए. क्या रमन सिंह ऐसा करेंगे?
* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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