पोटा केबिन निर्माण में घटिया सामग्री

सुरेश महापात्र
राज्य सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अभियान चला रही है. इसके लिए स्कूलों की आन लाइन ग्रेडिंग का काम पूरा हो चुका है. इस अभियान की निगरानी प्रदेश सरकार अपने हाथों में लेकर काम कर रही है. दक्षिण बस्तर में शिक्षा अभियान के नेस्तनाबूत होने के पक्के सबूत देखने को मिल जाएंगे. आप ​सोच भी नहीं सकते जहां ना तो शिक्षक—विद्यार्थी बैठ सकते हैं और ना ही कुछ और काम किया जा सकता है ऐसा निर्माण जिला निर्माण समिति के अधीन नोडल एजेंसी लोक निर्माण विभाग ने कर दिखाया है.

रामाशि मिशन के तहत निर्माण…
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा मिशन के तहत जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर गदापाल गांव के ठोठा पारा में 46 लाख रुपए की लागत से पोटाकेबिन भवन का निर्माण किया गया है. इस भवन में उपर का हिस्सा बांस की टाट से निर्मित है और नीचे पक्का निर्माण किया गया है. करीब 25 डिग्री नीचे की ओर झुका हुआ यह भवन अपने निर्माण के बाद ना तो बैठने के लायक है और ना ही अन्य किसी उपयोग के लिए उपयुक्त माना जा सकता है.


भवन की कमी की शिकायत से उठा पर्दा…
आज जब एक ग्रामीण ने शिकायत की कि हाईस्कूल की बिल्डिंग नहीं होने के कारण बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है तो इस निर्माण की सच्चाई से पर्दा उठ सका. बड़ी बात यह है कि इस भवन के निर्माण में किस तकनीक का प्रयोग लोक निर्माण विभाग ने किया है यह बता पाना कठिन है. वैसे देखा जाए तो लोक निर्माण विभाग दंतेवाड़ा संभाग के अंतर्गत दंतेवाड़ा अनुविभाग के अंतर्गत गदापाल गांव आता है.

क्या कहते हैं अधिकारी
राजीव गांधी शिक्षा मिशन के एपीसी वित्त हरीश गौतम ने बताया कि माध्यमिक शिक्षा मिशन के तहत निर्माण की जिम्मेदारी जिला निर्माण समिति ने लोक निर्माण विभाग को सौंप दी थी. लोक निर्माण विभाग को अपनी देख रेख में नियंत्रण में इस निर्माण को पूरा करवाया जाना था. जिसके संबंध में लोनिवि के अधिकारी ही सही जानकारी दे सकेंगे.

शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
बड़ी बात यह है कि इस निर्माण में अनियमितता की शिकायत पूर्व में भी किए जाने की बात ग्रामीण कह रहे हैं. इस शाला भवन के पीछे लस्सू पिता जोगा का घर है. छोटी पहाड़ी नुमा टेकरी में उसका मकान है. इसी टेकरी में उपर से नीचे की ओर करीब 25 डिग्री झुका हुआ पोटा केबिन शाला भवन बनकर तैयार है. शिक्षकों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि इस भवन को हैंड ओव्हर के लिए कहा गया. देखने के बाद इसे शाला भवन संचालन के योग्य नहीं पाया गया. इसमें कुर्सी लगाकर बैठना संभव नहीं है.

बड़ा सवाल
1. शिक्षा विभाग के तहत इस निर्माण के लिए जिस निर्माण समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई थी क्या उसने मौका मुआयना करने के बाद स्थल चयन को स्वीकृति प्रदान की थी?
2. क्या इस निर्माण के प्लींथ को डीपीसी लेबल तक लाने के बाद लोक निर्माण विभाग के संबंधित उपयंत्री ने अपनी आंखो से देखा और माप लिया था?
3. अगर उपयंत्री ने इस स्थल को देखने के बाद माप लिया था तो अनुविभागीय अभियंता ने क्या बिना मौका मुआयना किए माप पुस्तिका पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे?
4. क्या इस निर्माण की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए जिला निर्माण समिति ने कभी झांककर देखना उचित समझा?
5. शिक्षा गुणवत्ता बढ़ाने के प्रयासों को इस तरह के निर्माण से दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है?

हमारी राय
इन सभी सवालों का जवाब निश्चित तौर पर सिस्टम की खामियों की ओर उंगली उठाता है. जिला निर्माण समिति के माध्यम से जिले में करोड़ों रुपए के निर्माण कार्य करवाए गए हैं. अफसर बताते हैं कि इसमें टेंडर की प्रक्रिया का पालन किया जाता है. निर्माण समिति के नोडल अफसर द्वारा निर्माण के लिए नोडल एजेंसी तक कर उसे जिम्मेदारी सौंपी जाती है. इसके बाद भी इस तरह की गंभीर चूक का मतलब निर्माण समिति जैसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है.

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