कहां गये खरगोश ?

बैकुंठपुर | संवाददाता: बचपन में सुनी कहानियों में खरगोश, कछुए से पिछड़ गया था, ठीक उसी प्रकार छत्तीसगढ़ सरकार की खरगोश पालन योजना बाकी सभी पशुओं से पिछड़ गयी है. इतना ही नहीं, अब सरकार इस योजना का नाम भूले से भी नही लेती है.

फरवरी 2010 में छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों तथा ग्रामीणों के लिये खरगोश पालन एवं विक्रय द्वारा अतिरिक्त आमदनी करने की महत्वाकांक्षी योजना शुरु की थी. लेकिन सितंबर 2012 में जब पालतू पशु पक्षियों की गणना शुरु की गई तो उस सूची से खरगोश का नाम नदारत था. मतलब ये कि छत्तीसगढ़ सरकार मान चुकी थी कि खरगोश पालन की योजना परवान नही चढ़ पाई. इस ठप्प योजना को केवल सरकारी दस्तावेजों में ही देखा जा सकता है.

छत्तीसगढ़ के गरीब किसानों और ग्रामीणों को खरगोश पालन के जरिए भी अतिरिक्त आमदनी प्राप्त करने की योजना बनाई गई. इसके तहत कोरिया जिले के बैकुण्ठपुर स्थित कुक्कुट पालन प्रक्षेत्र में शासकीय खरगोश पालन एवं प्रजनन इकाई की स्थापना हुई थी.

पशुधन विकास विभाग द्वारा स्थापित इस इकाई में राजस्थान के टोंक जिले स्थित केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान केन्द्र, अविकानगर से उन्नत किस्म की चार प्रजातियों के 56 खरगोशों को लाकर उनका संवर्धन किया जा रहा था. बताया गया था कि खरगोश पालन और प्रजनन इकाई में संवर्धित प्रजातियों के खरगोशों को पालने के लिए ग्रामीणजनों को उपलब्ध कराया जाएगा.

उस समय यह दावा किया गया था कि खरगोश पालन से किसान कम लागत में अधिक फायदा प्राप्त कर सकते हैं. खरगोशों के मांस और इनके चमड़े तथा ऊन से बनी वस्तुएं बाजारों में ऊंचे दामों पर बिकती हैं. खरगोश के मांस में उच्च रक्तचाप और हृदय रोगियों के लिए भी फायदेमंद औषधीय गुण होते हैं, जिससे वर्ष भर मांस के लिए इनकी मांग रहती है. छोटे गर्भकाल, कम रोगग्रस्तता के साथ-साथ छोटे स्थान और कम लागत में व्यवसाय शुरू होने के कारण छोटे किसान भी इसे व्यावसायिक तौर पर आसानी से अपना सकते हैं.

लेकिन सितंबर 2012 में जब पशु चिकित्सा संचालनालय के अधिकारियों द्वारा पशु गणना शुरु किया गया तब आश्चर्यजनक रूप से इस सूची से खरगोश का नाम नदारत था. गणना के दौरान राज्य के केवल गौवंशीय, भैंसवंशीय, भेड़, बकरी, सूअर प्रजातियों के पशुओं एवं गधे, घोड़े, ऊंट और कुत्तों की गणना की गई. मुर्गी, बतख, बटेर, टर्की और इमू जैसे पालतू पक्षियों और पशुपालन में उपयोग होने वाले यंत्रों की गणना भी इसके अंतर्गत हुई. गणना में से खरगोश गायब था.

कुक्कट पालन प्रक्षेत्र, बैकुंठपुर के प्रभारी डाक्टर ए के पांडेय का कहना है कि शासन की योजनानुसार वर्ष 2010 में 56 खरगोश लाये गये थे और 2011 में 361 तथा 2012 में 500 खरगोश ग्रामीणों को बांटे गये थे. लेकिन हमारे यहां कोई खास संसाधन उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में हम अपनी तरफ से केवल कोशिश कर सकते हैं. यह पूछे जाने पर कि बांटे गये खरगोशों का क्या हुआ ? डाक्टर पांडेय का कहना था कि लोग पालने के लिये ले गये थे. उसके बाद उनका क्या हुआ, इस बारे में उन्हें नहीं पता है.

One thought on “कहां गये खरगोश ?

  • June 23, 2013 at 20:34
    Permalink

    I am really glad to hear that the government hasn’t taken rabbit farming seriously … whatever the reason may be.. its really sad to such inhumane behavior against these cute little creatures just to satisfy your taste buds.. Shame on the states and other departments promoting cruelty like rabbit farming.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *