छत्तीसगढ़: कोलमाइन का अवैध विस्तार

रायपुर | समाचार डेस्क: छत्तीसगढ़ अदानी के कोलमाइन का अवैध विस्तार किया जा रहा है. इस सिलसिले में जनसुनवाई भी आयोजित की जा रही है. छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सुप्रीम कोर्ट तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को धता बताकर अदानी के कोल माइन का विस्तार किया जा रहा है. 11 सितंबर 2016 को पर्सा ईस्ट केते बासन कोल माइन में अदानी द्वारा संचालित राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की खदान की क्षमता 10 एमटीपीए से बढ़ाकर 15 एमटीपीए किये जाने के सम्बन्ध में यह जनसुनवाई के लिये नोटिस जारी कर दिया गया है.

छत्तीसगढ़ बचाओं आंदोलन ने इस जनसुनवाई को रद्द करने की मांग की है. उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2014 को इस कोल माइन में केवल खनन के कार्य को जारी रखने की अनुमति दी थी परन्तु उसे नजरअंदाज कर इसके क्षमता के विस्तार की कोशिश की जा रही है.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 23 मार्च 2014 को पर्सा ईस्ट केते बासन खदान की वन भूमि डायवर्सन की स्वीकृति को निरस्त कर दिया था और आदेश दिया था की पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति इस परियोजना की पुनः जांच करे और एक समग्र अध्ययन करें कि क्या यह क्षेत्र पर्यावरण और जैव विविधता की दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण है कि कोयला खनन के लिए इसका विनाश नहीं किया जा सकता.

गौरतलब है कि NGT ने अपने फैसले में इस बात का विशेष उल्लेख किया था कि वन सलाहकार समिति लगातार इस क्षेत्र के संरक्षण के लिए कोयला खनन का विरोध करती रही है और इस सलाह के विपरीत जाकर परियोजना को मिली वन डायवर्सन की स्वीकृति ना सिर्फ गैर-कानूनी है परन्तु इससे कई अहम् सवालों की अनदेखी की गयी है.

NGT ने कहा था की इस क्षेत्र में भरपूर जैव विविधता, दुर्लभ पशु-पक्षी, तथा हाथी कॉरीडोर होने की जानकारी के चलते खनन स्वीकृति से पूर्व इसका सम्पूर्ण समग्र अध्ययन अत्यंत आवश्यक है.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2014 को निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक और पर्यावरण मंत्रालय की जांच पश्चात नये निर्देश आने तक मौजूदा खनन कार्य जारी रह सकता है. परन्तु सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी प्रक्रिया को नज़रन्दाज़ कर और पर्यावरण मंत्रालय के वन सलाहकार समिति के किसी अध्ययन एवं अंतिम निर्देश के पूर्व ही इस खनन परियोजना के विस्तार की कार्यवाही की जा रही है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय से पूर्व इस परियोजना का कोई विस्तार ना किया जाये अन्यथा इस क्षेत्र के पर्यावरण, जैव विविधता और आदिवासी संस्कृति का विनाश हो जायेगा.

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