तीसरे मोर्चे की चुनौतियां

दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में विधानसभा के लिए नवंबर में होने वाले चुनाव में क्या तीसरा मोर्चा कोई गुल खिला पाएगा? मोर्चे की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कठिन प्रतीत होता है. हालांकि राज्य में वह एक ताकत बनकर जरुर उभरा है. मोर्चे के गठन के लिए प्रारंभ में 9 राजनीतिक दलों ने आपस में बातचीत शुरु की थी लेकिन अंतत: उसे शक्ल सिर्फ 5 पार्टियों के चुनावी गठजोड़ से मिली. मोर्चे से हाल ही में अलग हुई पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी है, जो क्षेत्रीय दलों से तालमेल करने के बजाए राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के साथ गठबंधन की पक्षधर है.

गोंगपा के अलावा अलग राह पकडऩे वाली अन्य पार्टियां हैं- माकपा, एनसीपी तथा एनपीपी. अब कथित तीसरे मोर्चे के केवल पांच सहयोगी दल हैं – छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा तथा जनता दल यूनाइटेड. इनमें से कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसका पूरे प्रदेश में जनाधार हो. चूंकि ये क्षेत्र विशेष तक सीमित है अत: वे अपने – अपने प्रभाव क्षेत्रों में चुनाव परिणामों को कुछ हद तक प्रभावित कर सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी, नेशनलिस्ट पीपुल्स पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस यद्यपि मोर्चे में शामिल नहीं हैं और सभी 90 सीटों पर चुनाव लडऩे का इरादा रखती हैं लेकिन इनमें से केवल बसपा से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है. पिछले चुनाव में यद्यपि बसपा के दो ही प्रत्याशी चुनकर आए थे लेकिन उसने 6.1 प्रतिशत वोट हासिल करके चंद सीटों पर चुनाव नतीजे बदल दिए थे. यानी मौजूदा स्थिति में स्वाभिमान मंच एवं बसपा ही ऐसी पार्टियां हैं, जो नई विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकती है.

दरअसल राज्य की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा को छोड़ तीसरी पार्टी के लिए अभी तक कोई जगह नहीं बन पाई है. हालांकि कुछ राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दल मसलन वामपंथी पार्टियां, राकांपा, बसपा, जनता दल, सपा, गोंगंपा, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा व छत्तीसगढ़ समाज पार्टी राज्य में वर्षों से अपनी जमीन तलाश रही हैं किंतु चुनाव में मौजूदगी दर्ज करने के अलावा उन्हें कुछ विशेष हासिल नहीं हुआ है. केवल बसपा एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ही ऐसी पार्टियां हैं जो विधानसभा में दस्तक दे सकी है.

सन् 2003 के चुनाव में बसपा के दो एवं एनसीपी का एक विधायक चुनकर आया था, जबकि 2008 के चुनाव में भी बसपा के दो ही प्रत्याशी जीत सके थे. 2008 के चुनाव में इन दलों ने कांग्रेस एवं भाजपा के किले में कोई सेंध नहीं लगाई अलबत्ता सन् 2003 के चुनाव में एनसीपी की मौजदूगी से समूचा परिदृश्य बदल गया.

एनसीपी ने 6.79 प्रतिशत वोट हासिल करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया तथा उसकी मौजूदगी का फायदा भाजपा को मिला. यदि विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस से बगावत करके एनसीपी में न जाते तो पार्टी को इतने वोट नहीं मिलते. विद्याचरण शुक्ल ने प्रदेश में पार्टी को खड़ा किया तथा जोगी विरोधी लहर पर सवार होकर कांग्रेस की संभावनाएं खत्म कर दीं.

यद्यपि पार्टी का केवल एक विधायक चुनकर आया था किंतु उसने कम से कम 20 सीटों पर चुनाव परिणामों को प्रभावित किया. पार्टी ने पिछले चुनाव में मनेंद्रगढ़ एवं चंद्रपुर में भी अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन शेष सीटों पर उसकी उपस्थिति नगण्य रही. फिर भी पृथक राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ के 13 साल के राजनीतिक इतिहास में केवल एनसीपी ही एक मात्र ऐसी पार्टी हैं जिसने चुनावी समीकरण बदल दिए. लेकिन अब यहीं पार्टी अंतिम सांसें गिन रही है.

तीसरे मोर्चे में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच प्रमुख है. स्वाभिमान मंच भाजपा के कभी कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय ताराचंद साहू की पार्टी है, जिसने दुर्ग, भिलाई एवं राजनांदगांव नगर निगम चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की. विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में भी स्वाभिमान मंच ने अपना प्रभाव छोड़ा. जिस तरह बसपा का मूलआधार जातिगत हैं उसकी तरह स्वाभिमान मंच भी जातीय समीकरण का परिणाम है. इस बार स्वाभिमान मंच अपने हिस्से की लगभग 43 सीटों पर चुनाव लडऩा चाहता है. 14 सीटों पर उसने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिए है.

उसके टारगेट में मुख्यत: दुर्ग, राजनांदगांव एवं कबीरधाम जिले की सीटें है. खासकर दुर्ग में उसने अपना ध्यान केंद्रित कर रखा है. मंच को जिले की नवागढ़, अहिवारा, दुर्ग शहर, दुर्ग ग्रामीण, पाटन तथा गुंडरदेही से बड़ी उम्मीद है. रायपुर जिले की आरंग, कांकेर की भानुप्रतापपुर तथा सरगुजा की सामरी सीट से भी उसने उम्मीद पाल रखी है. तानाखार (गोंगपा), दंतेवाड़ा, कोंटा (सीपीआई) तथा सरगुजा की लुंड्रा सीट भी वे जीती हुई मानते हैं.

स्वाभिमान मंच के प्रवक्ता राजकुमार गुप्ता का दावा है कि मोर्चा कम से कम 8 से 10 सीटें जीतेगा. दुर्ग जिले से उन्हें 4 – 5 सीटों की उम्मीद है. गुप्ता का मानना है कि पिछले चुनाव में 22 प्रतिशत मतदाताओं ने कांगेस-भाजपा को वोट नहीं दिया था. इन गैरकांग्रेसी और गैर भाजपाई वोटों पर मोर्चे की नजर है. यदि इनमें से आधे वोट भी मोर्चा को मिलते हैं तो सत्ता की चाबी उसके हाथ में आ जाएगी. यह दावा अतिरेक प्रतीत होता है कि किंतु यह सच है कि सिर्फ चार वर्ष पुरानी पार्टी की ताकत में इजाफा हुआ है पर उसे जीतने लायक वोट मिल पाएंगे, ये कहना मुश्किल है. फिर भी इतना तय है कि मंच इन जिलों में कांग्रेस एवं भाजपा दोनों का टक्कर देने की स्थिति में है.

तीसरे मोर्चे के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम नेशनलिस्ट पीपुल्स पार्टी (एनसीपी) एक और राजनीतिक पार्टी है, जो राज्य में पहली बार चुनाव मैदान में उतर रही है. इसका नेतृत्व कभी केंद्र में मंत्री रहे अरविंद नेताम कर रहे हैं, जिन्होंने कांग्रेस से नाराज होकर पी.ए. संगमा की एनपीपी का दामन पकड़ा है.

एनपीपी का ध्यान आदिवासी क्षेत्रों पर हैं पर उसका सांगठनिक ढांचा इतना कमजोर है कि वह कोई असर नहीं डाल पाएगी. बसपा एवं स्वाभिमान मंच के बाद गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने-अपने क्षेत्रों मसलन बिलासपुर, सरगुजा एवं बस्तर संभाग की कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकती है. नक्सल प्रभावित बस्तर में भी कम्युनिस्ट पार्टियां ऐसा ही दम रखती है. इस बार उसके लिए संभावना बनती दिख रही है.

सन् 2008 के चुनाव में भाजपा ने 40.33 प्रतिशत वोट लेकर सत्ता में वापसी की थी जबकि कांग्रेस को 38.33 प्रतिशत वोट मिले थे. राष्ट्रीयकृत विपक्षी पार्टियां चुनाव में महज 8 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई थीं. यद्यपि तीसरे मोर्चे की संभावना पर फिलहाल कोई राय कायम नहीं की जा सकती किंतु इतना जरुर कहा जा सकता है कि 2008 के चुनाव की तुलना में 2013 में मोर्चे का प्रदर्शन बेहतर रहेगा. कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि संयुक्त विपक्ष 6-7 सीटें भी हासिल कर लेता है तो वह सौदेबाजी की स्थिति में आ जाएगा. लेकिन सत्ता की चाबी उसके हाथ में आ पाएगी अथवा नहीं, यह कांग्रेस तथा भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर है.

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