परंपरागत खेलों को भूल गये बच्चे

कोरबा | संवाददाता: शाम ढलते ही गली मोहल्ले में बच्चों की टोली छु-छुवाल, लुका-छिपी, डण्डा पचरंगा, नदी-पहाड़, जैसे खेल खेलते हुए नजर आती थी. अब मोहल्ला वीरान रहता है. बच्चे टीवी, विडियो गेम, कम्प्यूटर में खेले जाने वाले खेल खेलते नजर आते हैं. बच्चे अब इन खेलों के नाम से भी परिचित नहीं हैं.

कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ दशक पहले तक खेले जाने वाले बच्चों का खेल अब किस्से कहानियों का हिस्सा बनकर रह गया है. आज संचार क्रांति ने पूरे विश्व को एक ग्लोबल विलेज बना दिया है. पश्चिमी खेलों से तो हम परिचित और प्रभावित हो गए हैं, लेकिन अपने पारंपरिक खेलों को भूल गए. नदी पहाड़ लोहा लक्खड़, पिठ्ठूल, डण्डा पचरंगा,लुका-छिपी, छु -छुवाल जैसे परम्परागत खेल से आज के बच्चे अपरिचित हैं. बच्चे इसके नाम तक नहीं जानते.


गर्मी के दिनों में दोपहर में घर में ही रह कर खेले जाने वाले खेल जैसे सांप-सीढ़ी ,लूडो, व्यापार, इमली की बीज से खेले जाने वाले खेल पच्चीसा, चाल-गोटी अब बच्चे नहीं खेलते. इन खेलों के विलुप्ति के पीछे बहुत हद तक टीवी, विडियो गेम, मोबाइल गेम कारण है. आज के बच्चों के खेल आपसी सौहाद्र और परस्पर से मेल-जोल नहीं सिखाते हैं, क्योंकि आज का खेल एकल खेल है.

मोबाइल गेम, विडियो गेम जैसे खेलों को अकेले ही खेला जा सकता है और प्राय: अकेले ही खेलते हैं. पारंपरिक खेल एक अधिक लोगों द्वारा खेला जा सकता है. बच्चों में मेलजोल, भाई-चारा पैदा करते थे. बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होते थे. लूडो और सांप सीढ़ी, व्यापार जैसे खेलों से बच्चों का मानसिक विकास होता था, वहीं लुका-छिपी, डण्डा पचरंगा, खेलों से शारीरिक विकास होता था. बच्चे एक दूसरे के घरों में नि:संकोच आया-जाया करते थे, जिससे सामाजिक समरसता बनी रहती थी, लेकिन आज के बच्चों के खेलों में ऐसी बात नजर नहीं आती.

समय के साथ बच्चे एडवांस जरूर हुए हैं, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारी, सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना उनसे विलुप्त होती जा रही है. घण्टों टीवी पर कार्टून देखना या विडियो गेम खेलना प्राय: आज के बच्चों का गर्मी की छुट्टियां बिताने का मुख्य तरीका बन कर रह गया है. आने वाले समय में पारंपरिक खेल हो सकता है इतिहास बनकर रह जाए. कुछ खेलों को धार्मिक त्योहारों ने जिंदा रखा है. इनमें पतंग उड़ाना ऐसा ही खेल है.

बढ़ते ट्रैफिक के कारण बच्चे सडक़ में नहीं खेल सकते. मोहल्ले में कोई मैदान नहीं बचा, जहां बच्चे खेलें. मैदान की कमी भी एक कारण है कि बच्चे परंपरागत खेल नहीं खेल पा रहे हैं. इसके अलावा पहले व वर्तमान की शिक्षा पद्घति में काफी अंतर आ गया है. कठिन पाठ्यक्रम व संचार क्रांति के फेर में बच्चे परंपरागत खेलों से अनभिज्ञ है. स्कूलों में भी बच्चों को संचार क्रांति से जुड़े खेलों को खिलाया जाता है. पाठशाला से लेकर घर तक बच्चे कम्प्यूटर व वीडियो गेम सहित आधुनिक खेलों में मशगुल रहते हैं. जबकि मैदान की कमी व बच्चों को परंपरागत खेलों से न जोड़े जाने की पहल के कारण आज के बच्चे परंपरागत खेलों को भूल चुके हैं.

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