माकपा के लिए मुश्किल दौर

क्या माकपा सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों को एक साथ लाकर अर्ध-फासीवाद से लड़ने में कामयाब होगी? कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्क्सवादी यानी माकपा का 22वां सम्मेलन हैदराबाद में 18 से 22 अप्रैल के बीच हुआ. इस सम्मेलन में जितना आत्मविश्वास दिखा उतना 2012 और 2015 के सम्मेलन में नहीं दिखा था. एक ऐसे समय में जब मार्क्स के दास कैपिटल के 150 साल 2017 में पूरे हुए हैं और 5 मई, 2018 को मार्क्स के 200 साल पूरे होंगे तो उनकी तस्वीर मंच के एक बैनर पर लगाने वाली माकपा से उम्मीद है कि वह क्रांतिकारी रास्ता अपनाए. मार्क्स संभवतः अपने कामरेडों को यह संदेश दे रहे होंगे कि बगैर क्रांतिकारी तत्व के उनके विचार का कोई मोल नहीं है. क्या ये इस पर विचार करेंगे?

अगर भारतीय जनता पार्टी फिर से 2019 में सत्ता में आ जाती है तो अर्ध-फासीवाद स्थापित होने का डर है और माकपा ने भाजपा और उसकी सहयोगियों को हराने के सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों को एक साथ लाने का संकल्प लिया है. इसके लिए कांग्रेस पार्टी से रणनीतिक समझौता करने पर भी सहमति बनी है. राजनीतिक प्रस्ताव में संयुक्त कार्रवाई, संयुक्त संघर्ष, संयुक्त अभियान, सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों की व्यापक गोलबंदी, जमीनी स्तर पर सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए लोगों को एकजुट करना, एकजुट होकर लोकतांत्रिक अधिकारियों पर प्रहार करने वालों के खिलाफ लड़ना और भाजपा विरोधी मतों को अपनी तरफ लाने के लिए जरूरी चुनावी रणनीति अपनाने जैसी बातें शामिल हैं.


मीडिया ने इसे खेमेबाजी के तौर पर दिखाया. एक खेमा पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी का दिखाया गया. बताया गया कि 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए यह खेमा कांग्रेस के साथ चुनावी गठजोड़ का पक्षधर है. दूसरा खेमा पूर्व महासचिव प्रकाश करात का बताया गया. जो किसी गठबंधन के खिलाफ है. करात को मीडिया ने कांग्रेस विरोधी खेमे का नेता बताया. जबकि यह सच नहीं है. करात कांग्रेस के साथ किसी चुनाव पूर्व गठबंधन के खिलाफ हैं. निश्चित तौर पर वे चुनाव के बाद किसी गठबंधन के लिए खुले होंगे. जैसा कि 2004 में हुआ था. हालांकि, करात ने यह लचीलापन दिखाया कि जिस संसदीय क्षेत्र में जो उम्मीदवार भाजपा को हराने में सक्षम दिखेगा, उसका साथ देना चाहिए. कर्नाटक में 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव में केंद्रीय समिति ने यह अपील की है कि जो उम्मीदवार भाजपा और उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवार को हराने में सक्षम दिखे, उसके पक्ष में मतदान करना चाहिए.

माकपा ने ठीक ही कहा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में नव-उदारवादी पूंजीवादी शोषण बढ़ा है और संविधान का धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हुआ है. भारत अमेरिकी साम्राज्यवादी कोशिशों में जूनियर साझीदार बन गया है. हालांकि, भारत में कांग्रेस पार्टी ने नव-उदारवादी एजेंडा को अपनाया था और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध स्थापित किए थे. मुख्य विपक्ष पार्टी के तौर पर अब भी कांग्रेस इन नीतियों की पक्षधर है. भाजपा को हराने के लिए माकपा इसी कांग्रेस पार्टी के साथ चलना चाहती है. जहां तक स्थानीय दलों का सवाल है तो वे अवसरवादी हैं और भाजपा और कांग्रेस के साथ रहकर सत्ता में बने रहना चाहती हैं. लेकिन अगर कोई ऐसी पार्टी भाजपा के साथ नहीं है तो माकपा उन्हें ‘धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शक्ति’ कहती है.

जाहिर है कि इस तरह का तालमेल माकपा के लिए नया नहीं है. भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अलग-थलग रखने के लिए पार्टी ने 1991 से 2008 तक इस तरह के निर्णय कई बार लिए हैं. लेकिन इसके बावजूद न सिर्फ 2014 में केंद्र की सत्ता में भाजपा अपने बूते आई बल्कि देश के 29 राज्यों में से 21 राज्यों में वह सरकार चला रही है. लोकसभा में माकपा के सिर्फ नौ सांसद हैं और उसकी सहयोगी भाकपा के सिर्फ एक. पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी पार्टी की बुरी हार हुई है. 2016 में पश्चिम बंगाल में पार्टी हारी, वह भी तब जब उसने कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया था. पश्चिम बंगाल के लोग यह नहीं भूले कि वाम दलों की सरकार ने पुलिस और अपने कैडर के जरिए बड़े कारोबारियों के लिए जमीन हड़पने का काम किया था. माकपा एक तरफ तो अफ्सपा का विरोध करती है लेकिन जब वह त्रिपुरा में सत्ता में थी तो यह कानून वहां लागू किया था. मई, 2015 में वहां के अलगाववाद के दमन के काफी समय बाद इसे माकपा सरकार ने हटाया.

भाजपा के अर्ध-फासीवादी खतरों के बावजूद इसकी उम्मीद कम ही लगती है कि आत्मविश्वासी और उत्साही माकपा मार्क्सवाद की मूल भावना के हिसाब से क्रांतिकारी रुख अपनाएगी.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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