भारत गुरु, तिब्बत चेला

रायपुर: तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा है कि भारत शिक्षा, ज्ञान और अध्यात्म के आधार पर तिब्बत का गुरू रहा है. उन्होंने कहा कि वे पिछले 54 वर्षों से भारत की भूमि पर निवास कर रहे हैं और भारत और भारतीयता ने उनके शरीर और मन दोनों को गहराई से प्रभावित किया है.

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में बोलते हुये दलाई लामा ने कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें आधुनिक-पश्चिमी शिक्षा और परम्परागत भारतीय ज्ञान दोनों का समन्वय हो. आधुनिक पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से भौतिक विकास तो संभव है, लेकिन यह आंतरिक या मानसिक शांति के लिए पर्याप्त नहीं है.

दलाई लामा ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी अब यह साबित हो गया है कि केवल भौतिक विकास, मानव जीवन को सुखी बनाने की कुंजी नहीं है. आंतरिक शांति के लिये परम्परागत तथा अध्यात्मिक ज्ञान भी जरूरी है. दलाई लामा ने अहंकाररूपी ‘मैं, मेरा और मुझे’ जैसी भावनाओं से भी बाहर निकलने का भी आह्वान किया और कहा कि ऐसी भावनाओं की प्रधानता हृदयघात जैसी बीमारियों को बढ़ावा देती है.

दलाई लामा ने कहा कि वे पिछले 54 वर्षों से भारत की भूमि पर निवास कर रहे हैं और भारत और भारतीयता ने उनके शरीर और मन दोनों को गहराई से प्रभावित किया है. दलाई लामा ने कहा कि जब वे 7-8 वर्षों के थे, तब से सुप्रसिद्ध बौद्ध चिंतक एवं भिक्षु नागार्जुन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया है. नागार्जुन का मानना था कि किसी भी अवधारणा के प्रति अपना ज्ञान और समझ बढ़ाओ और तभी उसे अपनाओं.

दलाई लामा ने कहा कि आज जब वे छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध स्थल सिरपुर गये तो उन्हें एक पुरातत्ववेत्ता ने सिरपुर से 6 किलोमीटर दूर नागार्जुन गुफा होने की जानकारी दी. श्री दलाई लामा ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ के अगले प्रवास में उस गुफा में जाना चाहते हैं और कुछ समय वहां ध्यान भी करना चाहते हैं.

दीक्षांत समारोह को राज्यपाल शेखर दत्त, मुख्यमंत्री रमन सिंह, उच्च शिक्षा मंत्री रामविचार नेताम, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने भी संबोधित किया.

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