दलाई लामा, शरणार्थी और घर वापसी

रायपुर: अपनी रायपुर यात्रा के दौरान दलाई लामा की तिब्बती शरणार्थियों के साथ बैठक के कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं. सरगुजा के मैनपाट में रहने वाले लगभग 700 तिब्बती शरणार्थियों का दल अपने धर्मगुरु से मिलने पहुंचा था. उसके बाद दलाई लामा के साथ इन तिब्बती शरणार्थियों की बंद कमरे में मुलाकात को लेकर कई कयास हैं.

हालांकि यह हजारों-लाखों तिब्बतियों के साथ दलाई लामा की बैठक नहीं होने के बाद भी चीन के वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है. इस बैठक में किसी रणनीति का भी संकेत नहीं है लेकिन दलाई लामा उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, वहां मैनपाट के तिब्बती सूत्र में ही सही, अपने लिये किसी आदेश की प्रतीक्षा जरुर करते रहे हैं.


जिस वक्त दलाई लामा बतौर शरणार्थी भारत आये थे तब के चीन और आज के चीन में नेतृत्व के अलावा वैचारिक बदलाव भी आया है. मैनपाट में रहने वाले शरणार्थियों की भी यह दूसरी पीढी है. वे अपने मूल देश यानी चीन जरुर जाना चाहते हैं. दलाई लामा भी अपने वतन लौटना चाहते हैं. लेकिन हर बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि उम्मीदें धरी की धरी रह जाती हैं.

जिस वक्त दलाई लामा अपने समर्थकों के साथ भारत आये थे, उस वक्त चीन में माओ जे दुंग तथा लिन पिआओ का बोलबाला था. आज वहां नया नेतृत्व सत्ता पर विराजमान है. उसकी तिब्बत पर क्या सोच है, यह आज का महत्वपूर्ण प्रश्न है.

माओ के बाद आये देंग जिआओ पिंग ने पूंजीवादी व्यवस्था को चीनी परिस्थितियों के अनुसार चीन में लागू किया पर सत्ता मूल से चीन की साम्यवादी पार्टी के पास ही है. पिछले वर्ष ही कट्टरपंथी पोलित ब्यूरो के सदस्य बो जियालाई को पद से हटा दिया गया है, जो इस बात का घोतक है कि नीतियों में बदलाव आया है.

ऐसे में दलाई लामा के अनुयाई अवश्य चाहेंगे कि यदि उन्हें तिब्बत वापस आने की इजाजत दी जाये तो वे भी अपने वतन लौट सकते हैं.

हालांकि देंग ने तिब्बत पर पुरानी नीतियों को नहीं बदला था पर नेतृत्व परिवर्तन के साथ नीतियों में परिवर्तन की उम्मीद तो की ही जा सकती है. अभी-अभी हुई चीन के साम्यवादी पार्टी के कांग्रेस में नये आर्थिक नीतियों के साथ-साथ खुलेपन को भी स्वीकार किया है.

ऐसे में यदि दलाई लामा तथा उनके अनुयाई अपने वतन वापसी की उम्मीद रखते हैं तो इसे स्वाभाविक माना जाना चाहिये. सारी दुनिया में हो रहे राजनीतिक परिवर्तन तिब्बती युवाओं को भी आशा की किरण दिखा रहे हैं. चीनी नेतृत्व ने भी बो जिअलाई के चोंग्किंग मॉडल के स्थान पर ग्वांगडोंग मॉडल को अपनाया है, जो कट्टरपंथ के बजाये खुले बाज़ार पर भरोसा करता है. बो की विदाई एक नये युग का संकेत देता है. इस पृष्ठभूमि में रायपुर में दलाई लामा के साथ की बैठक के कई निहितार्थ हो सकते हैं.

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