दंतेवाड़ा ज़मीन घोटाला : ज़मीन के बदले नहीं मिली ज़मीन

रायपुर | संवाददाता : दंतेवाड़ा ज़मीन घोटाला में सरकारी अफ़सरों के जाल में फंसे मोहम्मद साहुल हमीद का दावा है कि वे मामले के सबसे बड़े पीड़ित हैं. उनका कहना है कि सरकारी अफ़सरों के चक्कर में न वे घर के रहे, न घाट के.

उनका कहना है कि उनके परिवार और मित्र, अदालतों के चक्कर काटने के लिये मज़बूर हैं, जबकि ज़िम्मेवार अफसर मज़े से नौकरी कर रहे हैं या चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.


गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी ने एक पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया था कि जिला पंचायत दन्तेवाड़ा के पास बैजनाथ नामक एक किसान की निजी कृषि 3.67 एकड़ जमीन थी.

इस जमीन को चार लोगों ने खरीदा. बाद में इस जमीन को विकास भवन के नाम पर सरकार ने लेकर दंतेवाड़ा में बस स्टैंड के पास करोड़ों की व्यावसायिक के साथ कृषि जमीन की अदला बदली कर ली.

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इस मामले में आप पार्टी ने हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुये इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर और आज के भाजपा नेता ओपी चौधरी को जिम्मेवार बताया था.

हम हैं असली पीड़ित

लेकिन जमीन घोटाले के आरोपियों का दावा है कि वे अफसरों की साजिश का शिकार हुये हैं. इनका कहना है कि न तो उन्हें ज़मीन के बदले ज़मीन मिली और ना ही पैसे. उल्टे अदालतों के चक्कर उन्हें लगाने पड़ रहे हैं.

दंतेवाड़ा ज़मीन घोटाला को लेकर प्रशांत अग्रवाल, मुकेश शर्मा, मोहम्मद साहुल हमीद और गुप्त कैलाश मिश्रा का दावा है कि सरकार ने उनसे ज़मीन तो ले ली लेकिन हमें छह साल बाद भी बदले में ज़मीन नहीं मिली.

इन चारों ने बस्तर संभाग के आयुक्त को पत्र लिख कर दावा किया है कि उन्हें आंवराभाटा में 1.001 हेक्टेयर और 0.607 हेक्टेयर ज़मीन सरकार ने दी थी लेकिन दोनों ज़मीन पर स्थानीय किसानों का कब्जा है और वे उस पर खेती कर रहे हैं.

इसी तरह दंतेवाड़ा के खसरा नंबर 384-3 पर कांता झाड़ी का कब्जा है और खसरा 375-2 पर धीरेंद्र प्रताप सिंह काबिज हैं.

इन चारों का दावा है कि 15 सितंबर 2016 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इन्हें ही जमीन सौंपने का फैसला सुनाया था. लेकिन सरकार ने बार-बार की चिट्ठी के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की.

इस संबंध में कमिश्नर ने 11 जुलाई 2018 को इन चारों को संबंधित ज़मीन का कब्जा सौंपने से संबंधित पत्र को कलेक्टर को कार्रवाई के लिये भेजा था. लेकिन अब तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई है.

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