जहं जहं चरण पड़े सनतन के

कनक तिवारी
चुनाव छमाही शुरू हो गई है और पांच विधानसभाओं के पहले चरण के चुनाव के बाद अगली छमाही में लोकसभा के अंतिम दौर के चुनाव भी हो जाएंगे. राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक माहौल में भारी गहमागहमी है. कुछ पेशेवर साधु संतों ने चुनाव पर्व की प्रतीक्षा करते अपनी निर्णायक भूमिका की खुद ही रेकी की थी.

बाबा रामदेव जैसे विवादग्रस्त साधु योगाभ्यास सिखाते, दवाइयां बेचते, सैकड़ों करोड़ों रुपयों की मिल्कियत खड़ी करते खुद को देश में कुर्बानी का नया ईसा मसीह प्रचारित करने लगे थे. उनकी आवाज़ पर राजनीति के तेवर कुतुबनुमा की सुई की तरह घूम जाएंगे-ऐसी उनको उम्मीद थी. अपने अधकचरे धार्मिक और शास्त्रीय ज्ञान को बाबा रामदेव केवल ऐसे भक्तों के सामने परोसते हैं, जो मोटे तौर पर अर्धशिक्षित,पारंपरिक और संकीर्ण विचारों के होते हैं.


रामदेव ने कुछ शुरुआती सभाएं योग और संतसमागम की आड़ में लीं. इनमें खुले आम भाजपा का प्रचार किया गया. उन्हें और आयोजकों को अंदाज़ नहीं था कि ऐसे आयोजनों में होने वाले खर्च को चुनाव आयोग पार्टियों और उम्मीदवारों के चुनाव व्यय में जोड़ सकता है. इसके बाद बाबा रामदेव मैदान से बाहर हो गए. अब वे अगली खेप का इंतज़ार कर रहे होंगे.

मौज़ूदा चुनाव के संदर्भ में तथाकथित संत आसाराम की दक्षिणपंथी समर्थक भूमिका अवश्य रेखांकित हो सकती थी. परंतु एक नाबालिग बच्ची के यौन संबंधों के आरोपों के कारण आसाराम सुरक्षित ढंग से जेल में बंद हैं. उनके ऊपर कुछ पूरक आरोप भी उसी मर्दानगी प्रकृति के दुरुपयोग के लगे हैं, जिसे संतों का आचरण नहीं कहा जा सकता. अलग अलग प्रदेशों में सरकारी भूमियों पर बलात कब्ज़ा किए हुए आसाराम के आश्रम स्थानीय प्रशासन द्वारा तोड़े जा रहे हैं. लेकिन जिन गरीब निजी व्यक्तियों की ज़मीनों पर कब्ज़ा कर आसाराम ने आश्रम बनवाए हैं, सरकारें उन बेचारों की मदद नहीं कर रही हैं.

चुनाव के संदर्भ में आसाराम के पोस्टर, नारे, भजन कीर्तन, समागम सब अप्रासंगिक हो गए हैं. उनका बेटा नारायण साईं पिता के चरण चिन्हों पर चलकर यौन अपराधों के चलते फरार है. उसने कथित तौर पर एक राजनीतिक पार्टी बना ली है. हालांकि यह एक महज़ शोशा है. भारत के नए गौरव बनने का सपना संजोए नरेन्द्र मोदी की गुजरात पुलिस नारायण साईं को ढूंढ़ ही नहीं पा रही है. ऐसे में यह सवाल पूछा जा सकता है कि यदि गुजरात में आतंकवादी छिपे होंगे, जिनसे प्रचारित तौर पर नरेन्द्र मोदी को खतरा है, तो उन्हें गुजरात पुलिस कैसे ढूंढ़ेगी.

आध्यात्मिक गुरु श्री श्रीरविशंकर ने आसाराम पर लगाए आरोपों को सतही समझते हुए यह कह दिया था कि आसाराम यदि माफी मांग लें तो बलात्कार का मामला लोकदृष्टि में भी रफादफा हो सकता है. यह कैसा सुझाव था? बाद में रविशंकर संभल गए. रामदेव के भाई पर भी अपहरण का आरोप लगा है और उनके सहायक बालकृष्ण पर नेपाल में पैदा होने के बावजूद भारत की झूठी नागरिकता का. रामदेव की संपत्ति को लेकर तरह तरह की आर्थिक जांच चल रही है.

इसी बीच उत्तरप्रदेश के उन्नाव के एक साधु शोभन सरकार ने जमीन के नीचे एक हजार टन सोना उपलब्ध होने की सनसनी फैला दी. भारतीय पुरातत्व विभाग और भूगर्भ विभाग ने प्राथमिक जांच कर खुदाई भी शुरू कर दी. इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़े गए. हड्डियां तक नहीं मिलीं. पूरी दुनिया में जगहंसाई हुई. संभावित प्रधानमंत्री की मुद्रा बनाकर मोदी ने सहमते सहमते शोभन सरकार पर हल्का सा कटाक्ष किया कि सपनों में सोना मिलने की बात को सच कैसे माना जा सकता है. शोभन सरकार क्रोधित हो गए तो मोदी जैसे हिन्दू राष्ट्रवीर की घिग्गी बंध गई. सोना न जाने कहां सो गया.

दूरदर्शन के कई चैनलों पर तरह तरह के साधु संत शारीरिक, दिमागी और धार्मिक वर्जिशें करते दिखाई देते हैं सबका मकसद जनता की आस्था से पैसा ऐंठना है. कुछ अरसा तक निर्मल बाबा का दरबार खूब फला फूला. इन्कम टैक्स विभाग, पुलिस और नागरिक पीछे पड़ गए तो टी.वी. चैनलों पर ब्लैकआउट हो गया. फिर धीरे से धार्मिक चोचलेपन के फन कुचले हुए सांप ने टी.वी. चैनलों के बिल में अपनी जगह ढूंढ़नी शुरू कर दी है.

कई बाबा, पादरी और मुल्ला मौलवी चीख चीखकर भले नागरिकों की सुबहें खराब किए हुए हैं. कहीं शास्त्रीय संगीत, मीरा और कबीर के भजन, तुलसीदास का रामचरितमानस, भीमसेन जोगी का गायन या रविशंकर का सितार वगैरह सुनने को नहीं मिलता. यह सारा स्पेस बाबाओं, साधु और कसरती संतों ने हथिया लिया है.

एक चैनल पर तिरुपति देवालय की प्रातः पूजाएं घनघनाती रहती हैं. भारत के इस सबसे अमीर मंदिर में ईश्वर के दर्शन हेतु गरीबों को घंटों पंक्तियों में खड़े रहने के बावजूद धकियाया जाता है. वहां वी.आई.पी. किस्म के लोगों, फिल्मी सितारों, क्रिकेट खिलाड़ियों, राजनेताओं, पुलिस के अधिकारियों वगैरह को ईश्वर विशेष दर्शन देते हैं. भले ही ऐसे लोगों के लिए भगवान का दर्शन करना पारिवारिक पिकनिकवृत्ति हो.

सैकड़ों बल्कि हज़ारों की संख्या में वैज्ञानिक खेती के उत्पाद की तरह लहलहाते साधु संतों की फौज को ईश्वर ने ही उत्तराखंड की केदार घाटी में नहीं बख्शा. उनके चक्कर में गए लाखों भक्तों का न जाने क्या क्या नुकसान हुआ. देश के धार्मिक और तीर्थ स्थान गंदगी, भ्रष्टाचार,प्रदूषण, अन्याक्रांति और तरह तरह के व्यभिचार का अड्डा भी बन गए हैं. अधिकांश पुजारियों को देखकर या तो घिन आती है, या डर लगता है. उनकी निगाहों में स्त्रियों के लिए यौन हिंसा की भावना साफ साफ पढ़ी जा सकती है.

ऐसे बाबा समुदाय के लोग कोई धार्मिक या परोपकार की संस्थाएं जनता के लिए धन से निस्पृह होकर नहीं चलाते. भारतीय कानूनों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर जितने भी धर्मादा ट्रस्ट बनते हैं, सब पर अप्रत्यक्ष रूप से बाबाओं का ही कब्ज़ा रहता है. उनके आश्रम सुरक्षित किलों की तरह होते हैं. वहां पुलिस और इन्कम टैक्स के अधिकारी भी भक्तों की तरह ही जा पाते हैं. इसलिए ऐसे आश्रमों में व्यापारियों और उद्योगपतियों का काला धन आसानी से खपाया जा सकता है. उसे हवाला प्रबंधन के ज़रिए भी अंतर्राष्ट्रीय बनाया जा सकता है. महेश योगी और रजनीश की अकूत संपत्ति के विदेशी भी होने का यही तो तिलिस्म था. हाल में दिग्विजय सिंह, अरविंद केजरीवाल और तारिक अनवर ऐसे मौलवी के इजलास में चले गए थे, जिसने बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन के सफाए का फतवा जारी किया था.

राजनीति में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, करपात्रीजी जैसे पवित्र नेता भी आए थे. सतपाल महाराज, योगी आदित्यनाथ और स्वामी अग्निवेश कभी कभी विवादों को जन्म देने के बावजूद सामाजिकताओं से सरोकार तो रखते हैं. लेकिन कभी चंद्रास्वामी और एक ब्रह्मचारी का कांग्रेस की राजनीति में बेहद दबदबा था. वे नेताओं को योग सिखाने या तांत्रिक साधना करने के नाम पर धन, दौलत और राजनीतिक अनुयायी कबाड़ते रहते थे.

चंद्रास्वामी अपनी कुख्याति के अनुसार विदेशी शस्त्र निर्माताओं से व्यापारिक सांठगांठ रखने के आरोपी भी बनाए गए. उनकी तथाकथित तांत्रिक शक्ति ने खुद उनका भला नहीं किया. वे दूसरों का भला क्या खाक करते. यही हाल कई चैनलों पर पसरे छुटभैये ज्योतिषियों का है. वे करोड़ों भारतीयों को सवाल जवाब के जरिए बेवकूफ बनाते रहते हैं. जनता भी महान है. वह खुद होकर इनके चंगुल में फंसती रहती है. इक्कीसवीं सदी में ज्ञान की कई नई विधाएं खुलती और परिपक्व होती जा रही हैं.

भारत में जब यूरोपीय आक्रमण हुए थे तब इस देश को कई यायावरों ने साधुओं, तांत्रिकों, जादूगरों, टोनहियों, ज्योतिषियों और अंधविश्वासियों का देश भी कहा था. चार सौ बरस हो रहे हैं. फिर भी कूपमंडूकता का दौर खत्म नहीं हो रहा है. आंकड़ों और सांख्यिकी के आधार पर कई ज्योतिषी उम्मीदवारों का भविष्य बता रहे हैं.

सभी पार्टियों के तीसमारखां नेता अधकचरे ज्योतिषियों से पूछपूछकर उम्मीदवारी का पर्चा भरने का मुहूर्त निकाल रहे हैं. छींकने या बिल्ली का रास्ता काट देने के अपशकुनों से बच रहे हैं. शुभ पर्वों पर विधवा स्त्रियों को देखना गुनाह समझा जा रहा है. ऐसे पाखंड से जब तक देश नहीं बचेगा तब तक लोकतंत्र में चुनाव के जरिए बेहतर उम्मीदवारों को चुनने का वैज्ञानिक प्रतिफलन कैसे होगा.

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