धान नहीं बेचना चाहते किसान

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के किसान इस पशोपेश में हैं कि वे आखिर क्या करें? राज्य में संभवत: यह पहली बार देखने को मिला है, जब किसान समर्थन मूल्य पर भी धान बेचने से कतरा रहे हैं. इसके पीछे कमजोर फसल या कम उत्पादन जिम्मेदार नहीं है.

दरअसल, यह स्थिति राजनीतिक कारणों से उत्पन्न हुई है. कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने अपनी-अपनी सरकार के गठन के साथ ही धान की कीमतें ज्यादा देने का वायदा किसानों से किया है, जिसकी वजह से किसान अधिक मुनाफे की आस में अपनी फसल नहीं बेच रहे हैं.


उल्लेखनीय है कि चुनावी वर्ष होने के कारण कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने इस साल से किसानों को समर्थन मूल्य से ज्यादा धान की कीमत देने का वायदा किया है. भाजपा ने 2,100 तो कांग्रेस ने 2,000 रुपये प्रति क्विंटल मूल्य चुकाने का वायदा किया है.

इसी के साथ कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने किसानों से अपील भी की थी कि वे चुनाव के बाद धान बेचें, उनकी फसल के लिए समर्थन मूल्य से ज्यादा भुगतान किया जाएगा. लिहाजा, किसानों ने भी नतीजों के बाद ही धान बेचने का निर्णय किया है, मंडियों की ताजा स्थिति को देखते हुए तो ऐसा ही प्रतीत होता है.

बहरहाल, प्रदेश में 21 अक्टूबर से जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बिक्री के बाद भी बिक्री केंद्रों में वीरानी छाई हुई है. मतदान निपटते ही अब नई सरकार के गठन के साथ ही धान की बिक्री में तेजी आने की संभावना है.

जानकारों का कहना है कि नई सरकार के गठन के तुरंत बाद किसानों को समर्थन मूल्य की नई दर देना संभव नहीं हो पाएगा. समर्थन मूल्य तय करने वाली केंद्र की समिति जब नई दरों की अनुशंसा करेगी तभी यह संभव हो पाएगा.

इस प्रक्रिया में देरी से किसानों पर संकट आने की संभावना है. फिलहाल धान खरीदी की प्रक्रिया अत्यंत धीमी है, तो बहुत सारे केंद्रों में इसकी शुरुआत ही नहीं हो पाई है.

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