गांधी आज ज्यादा जरुरी हैं

तुषार गांधी
अंधेरा जब सबसे ज्यादा होता है, तभी दीये का महत्व सबसे ज्यादा समझ में आता है. भले ही कमजोर लौ क्यों न हो, वह एक आशा की उम्मीद जगाता है. मुझे यह लगता है कि सबसे ज्यादा विपरीत परिस्थितियां जब बनती हैं तभी जाकर हमको गांधी जैसे लोग और उनका जो पूरा दर्शन है, उसके अन्दर जाकर कहीं न कहीं जाकर कुछ आसरा मिलता है, एक उम्मीद जगती है. गांधी का होना असल में केवल 19वीं शताब्दी का मामला भर नहीं है. गांधी मानव जाति की एक ऐसी उम्मीद रहे हैं, जिसकी जरुरत हमेशा बनी रहेगी. यही कारण है कि आज जब पूरी दुनिया में हिंसा और युद्ध की बातें हो रही हैं, तब एक छोटा तबका ही सही, शांति, प्रेम व भाईचारे की तरफ मुड़ने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है.

जाहिर है, मन में यह भाव आता है कि आखिर गांधी के देश में भी जहां उन्होंने सर्वाधिक समय दिया, वहां हिंसा के लिए इतनी जगह क्यों बन गई? इसका एक कारण तो बहुत साफ समझ में आता है कि भारत में व्यक्तिपूजक व मूर्तिपूजक संस्कृति रही है, इसलिए हमने व्यक्ति और मूर्ति की पूजा की. हमने कभी गांधी के दर्शन और उनके काम को अपनाने की कोशिश की.


ठीक-ठीक कहा जाये तो हमने कभी गांधी के दर्शन को समझने की भी कोशिश नहीं की. हम जब गांधी की पूजा या भक्ति करते हैं, तो वहां भी यह बात बहुत साफ-साफ नज़र आती है कि हमारी पूजा और भक्ति में भी एक दंभ है. गांधी की फोटो के सामने हम खड़े हो गए और हमने अपने आपको उनका भक्त समझ लिया. लेकिन जो चीजें गांधी को महान बनाती हैं, उन चीज़ों की तरफ हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता. जब हमारी भक्ति में ही खोट है तो फिर कहां से हम वह तत्व अपनी जिन्दगी में उतार सकते हैं? गांधी को जगह-जगह और चौराहों में सिर्फ मूर्ति बना कर छोड़ दिया गया है.

बापू की जो छवि है, उससे यदि प्रेरणा व सीख हम लेते तो सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार नहीं होते, ईमानदारी होती लेकिन दफ्तरों की दीवारों में बापू की तस्वीर भर टंगी रहती है जिसका कोई प्रभाव नहीं दिखता. ठीक वैसे ही चौराहों में बापू को छोड़ दिया है ताकि आते-जाते लोगों को लगे कि हम बापू के भक्त हैं. इस देश में कौवों के लिये बैठने के लिये पेड़ों के बाद सबसे अधिक जो जगह इस्तेमाल होती होगी, वो शायद ऐसी मूर्तियां ही होंगी, जिसकी संख्या हम लगातार बढ़ाते जा रहे हैं. आखिर रास्ता किधर है? रास्ता वही है जिस पर कभी बुद्ध और बापू चले थे. अगर तरक्की व शांति से उम्दा जीवन जीना है तो उसी रास्ते पर चलना होगा, नहीं तो वह ज्ञान और समझ आने में देरी होगी.

फिलहाल मुझे अपने देश में तो ऐसा नहीं दिख रहा कि लोग बापू के रास्ते पर चलेंगे, लेकिन विदेशों में यह दिखने लगा है कि वहां के लोग बापू के रास्ते पर चलेंगे. इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि जिन्हें हम भौतिकवादी देश कह कर बहुत हिकारत से देखते हैं, उन जगहों में लोग व्यक्ति के बदले व्यक्ति के कार्यों को महत्व देते हैं, इसलिए विदेशों में बापू के मार्ग पर चलने की उम्मीद ज्यादा दिख रही है. मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि जिस तरह बापू अपनी जिन्दगी में कुछ बनकर विदेश से भारत में आए थे, ठीक उसी तरह भविष्य में बापू का दर्शन व उनके कार्यों की प्रेरणा विदेश से हिन्दुस्तान आए. भले ही इस पूरी प्रक्रिया में देर होगी लेकिन इस देरी के कारण भी तो हम ही हैं, इसमें और किसी का दोष नहीं.

बापू को जो करना था वो कर के चले गए, अब उनकी जिम्मेदारी नहीं है. हम इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते तो नतीजा भुगतना पड़ेगा और सच कहें तो लगातार भुगत भी रहे हैं. भुगतना क्या पड़ेगा, भुगत रहे हैं. हम एक विशाल और मिली जुली संस्कृति वाला देश कहलाते हैं, एक मिली-जुली तहजीब का हिस्सा बतलाते हैं, लेकिन जाने किन-किन कारणों से हमारे बीच दरारें व फूट हैं. हम लगातार बंटते जा रहे हैं, धर्म के नाम पर, भाषा के नाम पर, संस्कृति के नाम पर और ऐसे कारणों को ढूंढ ढूंढ कर सामने लाते चले जाते हैं, जिससे समाज में हिंसा की जगह और बढ़ती चली जाये.

लेकिन मैं ऐसी परिस्थितियों में भी निराश नहीं होता. रही बात सरकारों से उम्मीद की तो तमाम तरह की निराशा के बाद भी मुझे लगता है कि शायद कोई बदलाव आये. वैसे, बापू के वंशज कहलाने वालों की सरकार हो या गोड़सेवादी सरकार; इन्होंने अब तो कम से कम बापू के सपनों के हिंदूस्तान के लिये कभी काम नहीं किया. बापू कहते थे कि हमारा देश गांवों में बसता है लेकिन गांवों की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है. हमने गांवों को एक उपनिवेश में बदल दिया. आज हमारे देश में विकास के लिये गरीब की नहीं, मुंबई के स्टॉक एक्सचेंज की परवाह की जाती है. इससे तो देश बदलने वाला नहीं है.

बापू को प्रतीक के लिये इस्तेमाल करने से भी देश नहीं बदलेगा. बापू जब स्वच्छता की बात करते थे तो उनकी स्वच्छता का मतलब केवल बाहरी सफाई भर नहीं थी. उनकी स्वच्छता का मतलब आचार-विचार, व्यवहार और आत्मशुद्धि का तत्व था. लेकिन आज ऐसा नहीं है. गांधी की स्वच्छता का हवाला दे कर जो कुछ चल रहा है, वह केवल मीडिया में बने रहने की होड़ का हिस्सा है. इसका गांधी के विचारों से कोई लेना-देना नहीं है.

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