फेड के प्रोत्साहन से भारतीय बाजार चढ़े

मुंबई | एजेंसी: अमरीकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के द्वारा प्रोत्साहन जारी रखने के घोषणा के बाद भारतीय शेयर बाजार में तेजी देखी गई. दोपहर करीब 2.49 बजे बंबई स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 763.14 अंकों की तेजी के साथ 20,725.30 पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के संवेदी सूचकांक निफ्टी 241.40 अंकों की तेजी के साथ 6,140.85 पर कारोबार करते देखे गए.

बुधवार को फेडरल रिजर्व ने अमरीका की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए दिए जा रहे प्रोत्साहन को जारी रखने का फैसला किया. फेड के अध्यक्ष बेन एस. बर्नाके ने बुधवार को फेड के दो दिवसीय सम्मेलन के समाप्त होने के बाद यह जानकारी दी.


गौर तलब है कि फेड 2008 की मंदी के बाद से अमरीका की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने बाजार में तरलता का संचार करने के लिए हर माह 85 अरब डॉलर मूल्य के बांड की खरीदारी कर रहा था.

अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिलने के बाद पिछले कुछ महीने से फेड ने बांड की खरीदारी के स्तर को चरणबद्ध तरीके से कम करते हुए आखिर में बंद करने के मुद्दे पर विचार करना शुरू किया था. लेकिन बाजार के अनुमान के उलट फेड ने प्रोत्साहन को फिलहाल कम से कम अगले महीने तक या अगर जरूरी हो तो अगले साल तक जारी रखने का फैसला किया है.

फेड का यह फैसले से भारत तथा अन्य उभरते देशों की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. फेड के प्रोत्साहन वापसी के विचार से विदेशी संस्थागत निवेशकों ने उभरते बाजारों से पूंजी निकालनी शुरू कर दी थी, जिससे इन देशों की मुद्रा का अवमूल्यन हुआ है और शेयर बाजारों में भी काफी अस्थिरता देखी जा रही है.

फेड के फैसले से उभरते देशों में पूंजी का प्रवाह कुछ समय तक ही सही फिर से बनने की उम्मीद है, जिससे इन देशों की मुद्रा और अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा.

फेड क्या है

यह अमरीकी केन्द्रीय बैंक है जो देश की अर्थव्यवस्था को संचालित करता है. वर्तमान में इसके प्रमुख बेन एस. बर्नाके हैं. अमरीका की आर्थिक नीतिया तय करने में यह नेतृत्वकारी भूमिका का निबाह करता है. अमरीकी मुद्रा नीति फेड ही तय करता है.

2008 की मंदी

वर्ष 2008 में अमरीका भीषण रूप से मंदी की चपेट में आ गया था. जिसने सारी दुनिया के अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित किया था. इसका प्रभाव यूरोप में सबसे ज्यादा देखा गया था. इसके मूल में साखरहित कर्ज था. अमरीकी उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये तथा बिक्री को बनाये रखने के लिये जनता को खुलेआम कर्ज दिये गये थे. जब इन कर्जो को न चुकाया जा सका था तो अमरीकी बैंक बैठ गये थे. जिसे अमरीकी करदाताओं के पैसे से उबारा गया था.

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