बुंदेलखंड में ‘लाल सलाम’ की दस्तक!

बांदा | एजेंसी: नब्बे के दशक तक अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी की बदौलत बुंदेलखंड ‘लाल सलाम’ का गढ़ रहा है. यहां से कम्युनिस्टी सांसद और विधायक भी चुने गए. लेकिन बहुजन समाज पार्टी के उदय के साथ ही वामपंथियों का यह किला ढह गया. आगामी लोकसभा चुनाव में भी यहां वामपंथियों के लिए कोई संभावना नहीं दिख रही है. लेकिन चित्रकूट जिले के गढ़चपा जंगल में ‘लाल सलाम’ के झंडे के साथ जनजातियों ने जंगल पर कब्जा करने की कोशिश की है.

वन विभाग जहां इस घटना को नक्सलवाद से जोड़ कर देख रहा है, वहीं मामले में आरोपी बनाए गए जनजाति समुदाय के एक व्यक्ति ने नक्सलियों से किसी तरह का संबंध होने से इंकार किया है. एक वयोवृद्ध वामपंथी विचारक ने इस घटना को हक के लिए जनजातियों, मजदूरों का जागना बताया है.


उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में वर्ष 1990 से पूर्व के तीन दशक तक ‘कम्युनिस्टी राजनीति’ हावी थी. कामरेड जागेश्वर यादव और कामरेड रामसजीवन सिंह जहां बांदा लोकसभा सीट से बारी-बारी से सांसद चुने गए, वहीं कामरेड दुर्जन बाबा, कामरेड देवकुमार यादव और कामरेड रामप्रसाद कई बार विधायक भी बने.

तब सामंतवाद के खिलाफ अनुसूचित और पिछड़े वर्ग का मजबूत गठजोड़ हुआ करता था और वामपंथ का ‘धन व धरती बंट कर रहेगी’ का नारा बुलंद था. नब्बे के दशक में बहुजन समाज पार्टी के उदय के साथ ही वामपंथ का ‘लाल सलाम’ दफन हो गया. आगामी लोकसभा चुनाव में भी वामपंथी राजनीति के उभार के कोई संकेत नहीं हैं. लेकिन लाल सलाम का यह झंडा प्रशासन के लिए चिंता का विषय जरूर बन गया है.

चित्रकूट जिले में तीन जनवरी को तीन सैकड़ा से अधिक जनजाति समुदाय के लोगों ने तीर-कमान, कुल्हाड़ी व धारदार हथियारों के साथ गढ़चपा जंगल में धावा बोला और सैकड़ों पेड़ काट कर वहां ‘लाल सलाम’ का झंडा गाड़ दिया. जनजातियों ने वनकर्मियों पर जिस तरह हमला बोला, उस आधार पर वन अधिकारी उन्हें नक्सली बता रहे हैं.

क्षेत्रीय वन अधिकारी ललित कुमार गिरि ने बताया, “जंगल में कब्जा करने वाले लोग नक्सल प्रभावित क्षेत्र से जुड़े हैं. उन्हें गाइड करने के लिए कुछ लोग सोनभद्र से भी आए थे.”

गिरि ने बताया, “लाठी-डंडा, कुल्हाड़ी, हसिया, और तीर-कमान लेकर करीब तीन सौ जनजातीय समुदाय के महिला-पुरुषों ने दो हेक्टेअर जंगल साफ कर दिए और वहां लाल झंडा गाड़ दिया.”

गिरि ने बताया, “वनकर्मी गए तो जनजातियों ने तीर-कमान से हमला कर दौड़ा लिया. गढ़चपा रेंज रैपुरा के वन दरोगा रामदयाल की तहरीर पर 18 नामजद और 130 अज्ञात जनजातियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.” गढ़चपा के जंगल में घटी यह दूसरी घटना है, इससे पहले रानीपुर वन्य जीव बिहार के जंगल में भी ऐसा ही हुआ था.

चित्रकूट जिले के अपर पुलिस अधीक्षक आर.डी. चौरसिया ने कहा, “लाल सलाम की इस घटना को प्रशासन गंभीरता से ले रहा है. यह आन्दोलन कोई दूसरा रास्ता न पकड़े, इसके लिए विभिन्न पहलुओं से जांच कराई जा रही है.”

इस बीच, जंगल पर कब्जा करने के मामले में आरोपी बनाए गए रहिसवा कोल ने नक्सलियों से किसी तरह का संबंध होने से इंकार किया है. कोल ने कहा, “किसी भी सरकार ने जनजातियों की समस्या का हल निकालने का प्रयास नहीं किया. हमें भी आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीविकोपार्जन के संसाधनों की जरूरत है.”

कभी वामपंथी आंदोलन के अगुआ रहे बांदा के बुजुर्ग अधिवक्ता रणवीर सिंह चौहान कहते हैं कि “चित्रकूट की घटना को प्रशासन भले ही नक्सली आंदोलन से जोड़ कर देखे, लेकिन सच यह है कि अब आदिवासी और मजदूर वर्ग अपने हक के लिए खड़ा हुआ है. यह आंदोलन कोई दूसरा रास्ता अख्तियार करे, इसके पहले प्रशासन को आदिवासियों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.”

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